गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 414, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४०८ यज्ञोपवीत शोभायमान है॥ ५ ॥ इनकी ग्रीवा शंखके समान है। चिबुक, दन्तावली, अधर और कपोल मानो छबिकी सीमा ही हैं, वचन सब प्रकारके भयको दूर करनेवाले हैं, नासिका बड़ी सुघड़ है तथा नवीन अरुणकमल-से नेत्र कृपासे परिपूर्ण हैं ॥ ६ ॥ इनकी सुन्दर भ्रुकुटियाँ बड़ी बाँकी हैं माथेपर मनोहर तिलक है तथा कर्णभूषणों (कुण्डलों) की भी बड़ी ही सुन्दरता है, मानो महादेवजीने कामदेवको मारकर उसके निर्दोष धनुष-बाण और मकर चन्द्रमाको दे दिये हैं। [यहाँ भगवान्का मुख चन्द्रमा है, भ्रुकुटियाँ धनुष हैं, तिलक बाण हैं तथा कुण्डल मकर हैं] ॥ ७ ॥ प्रभुके कुञ्चित केश हैं, सिरपर सोनेका मुकुट है, जिसमें अनेक प्रकारकी कान्तिमयी मणियाँ जड़ी हुई हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, सूर्यकुलसूर्य भगवान् रामकी छवि, कोई कवि क्या, सुकदेव, महादेव और शेष आदि भी नहीं कह सकते ॥ ८ ॥ राग कान्हरा [ १७ ] देखो रघुपति-छबि अतुलित अति । जनु तिलोक-सुषमासकेलि बिधि राखी रुचिर अंग-अंगनि प्रति ॥ १ ॥ पदुमराग रुचि मृदु पदतल धुज-अंकुस कुलिस-कमल यहि सूरति रही आनि चहुँ बिधि भगतनिकी जनु अनुरागभरी अंतरगति ॥ २ ॥ सकल-सुचित्त सुजन सुखदायक,उरधरेख बिसेष बिराजति । मनहुँ भानु-मंडलहि सँवारत धरयो सूत बिधि-सुत बिचित्रमति । ३ । सुभग अँगुष्ठ, अंगुली अबिरल, कछुक अरुननख-ज्योति जगमगति । चरन-पीठ उन्नत नत पालक, गूढ़ गुलुफ, जंघा कदलीजति ॥ ४ ॥