भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 417

४११ उत्तरकाण्ड है, टखने गूढ़ (छिपे हुए) हैं तथा जंघाएँ कदलीस्तम्भको जीतनेवाली हैं ॥ ४ ॥ दोनों घुटने कामदेवके तरकसके निम्नभागके समान हैं, सुघड़ जाँघें हाथीकी सूँड़ और हाथीके बच्चेका मान मर्दन करनेवाली हैं। कमरमें सुवर्ण और मणियोंकी बनी हुई करधनी तथा उसपर कसा हुआ पीताम्बर सुशोभित हो रहा है ॥ ५ ॥ प्रभुकी नाभि मानो सरोवर है, उदरकी तीन रेखाएँ उसकी सीढ़ियाँ हैं तथा रोमावली सेवारकी छवि पाती है। हृदयमें जो मोतियोंकी मनोहर माला पड़ी हुई है वह मानो [उस नाभि- सरोवरपर] हंसोंकी पंक्तियां उड़-उड़कर आ रही हैं ॥ ६ ॥ भगवान्‌के वक्षःस्थलपर पदक तथा मनोहर भृगुलताका चिह्न है। उनकी लम्बी-लम्बी भुजाएँ घुटनोंतक लटकती हैं, उसमें सुवर्ण और मणियोंके सुन्दर बाजूबंद हैं तथा करकमलोंमें मनोहर पहुँचियाँ शोभायमान हैं ॥ ७ ॥ शुभ यव, शुभ रेखा, सुन्दर नख और मनोहर अँगुलियोंसे युक्त सुन्दर हाथोंमें अँगूठी शोभा पा रही है तथा अङ्गुलित्राण, धनुष और बाणोंकी छवि देवताओंको सुख देती है तथा असुरोंके हृदयमें शूल उत्पन्न करती है ॥ ८ ॥ मंजुल चन्दनचर्चित श्याम शरीरमें पीताम्बर बड़ा ही छविमय जान पड़ता है, मानो नील मेघपर चन्द्रमाकी चाँदनी देखकर बिजली छिपना छोड़कर (स्थिर हो) दमक रही हो ॥ ९ ॥ गलेमें पवित्र यज्ञोपवीत शोभायमान है, जत्रु (गलेकी धनुषाकार हड्डी) गूढ़ (छिपी हुई) है, कन्धे स्थूल और विस्तृत हैं, कृकाटिका (घांटी) सुघड़, पुष्ट एवं उन्नत है तथा शङ्खसदृश (त्रिरेखायुक्त) गलेकी शोभा मनको प्रिय जान पड़ती है ॥ १० ॥ शरत्कालीन कमलकुसुमोंकी