गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४१२ निन्दा करनेवालो मुखकी मनोहरता कुछ कहनेमें नहीं आती; उसे देखनेसे ही नेत्रोंको अनुपम सुख होता है। वह छवि अश्विनीकुमार, कामदेव और चन्द्रमाकी कान्तिका भी निरादर करती है ॥ ११ ॥ प्रभुके लाल-लाल ओठोंमें अनुपम दन्तावली शोभायमान है, उनकी मनोहर मुसकान मानो मनको खींचे लेती है। ऐसा जान पड़ता है, जैसे मूंगेके बने हुए विमानमें चढ़ी हुई देवताओंकी मण्डली पुष्पावली बरसा रही हो ॥ १२ ॥ सुन्दर ठोड़ी मनोहर हनुस्थल (डोड़ीके नीचेका भाग) तथा सुन्दर कपोल और नासिका—ये सब मनको मोहे लेते हैं। प्रभुके नेत्र कमलका मान मर्दन करनेवाले हैं तथा चितवन अति मनोहर अमृतमय जलकी वर्षा करती है ॥ १३ ॥ उनके सिरपर केश सुशोभित हैं, वचन बड़े ही सुन्दर और गम्भीर हैं तथा कानोंमें कुण्डलोंका हिलना हृदयको प्रफुल्लित करता है, मानो किसी नवीन नील मेघको देखकर और उसका शब्द सुनकर मोरोंकी मनोहर जोड़ी नाच रही हो ॥ १४ ॥ चन्द्रमाके श्याम चिह्नके समान [ भगवान्के मुखचन्द्रपर ] बाँकी भ्रुकुटियाँ और माथेपर कुंकुमकी मनोहर रेखाएं (तिलक) विराजमान हैं तथा सिरपर हीरे और मणियोंसे जड़े हुए सुवर्णमुकुटकी कान्ति सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करती है ॥ १५ ॥ श्रुति, शेष, शुकदेव, शंकर और सरस्वती आदि भी भगवान्के रूपका वर्णन करते-करते उसका पार नहीं पाते; फिर इस मूर्तिका, जो मन और वचनका विषय नहीं है, तुलसीदास किस प्रकार वर्णन कर सकता है ? ॥ १६ ॥