गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१५ उत्तरकाण्ड मोर, भौंरे, चकोर और चातकोंका शोर होरहा है ॥ ३ ॥ वह सुहावना समय देखकर रूप, गुण और यौवनकी सीमारूप बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ सोलहों शृंगार करके दल बाँधकर चलीं और उस हिंडोलेकी शोभा देख अपने आँचल फैला-फैलाकर राम और सीताको— उनका सुख-समाज देखकर—आशीर्वाद देने लगीं ॥ ४ ॥ फिर वे सूहो, गौंडमलार आदि राग गाती हुई बारी-बारीसे झूलने और झुलाने लगीं उस समय जो मंजीर, नूपुर और कंकणोंकी ध्वनि होती थी, वह कामदेवके हाथोंकी ताल-सी जान पड़ती थी [झूलते समय श्रमकी अधिकताके कारण] उनके मुखपर छायी हुई पसीनेकी बूंदें, बिखरे हुए बाल और उलझे हुए हार ऐसे जान पड़ते थे, मानो अन्धकार, बिजली, नक्षत्रगण, बालसूर्य और चन्द्रमा आकाशमें विहार कर रहे हों [यहाँ बिखरे हुए बाल अन्धकार हैं, अङ्गकी कान्ति बिजली है, पसीनेकी बूंदें नक्षत्रगण हैं, हार बालसूर्य हैं तथा मुख चन्द्रमा है] ॥ ५ ॥ इस तरह देवाङ्गनाएँ हृदयमें हर्षित हो फूलोंकी वर्षा कर [नजर न लग जाय, इसलिये] तिनका तोड़ती हुई यह सब लीला देख रही हैं। उनके नेत्रोंमें आनन्दाश्रु छाये हुए हैं, मन प्रसन्न है तथा सम्पूर्ण शरीर अत्यन्त पुलकित हो रहा है। वे सब यही कह रही हैं कि यह अत्यन्त कल्याण और मंगलमय राज्य सर्वदा अविचल रहे तथा तुलसीदासजीके जीवनमूल जानकीनाथ भगवान् राम संसारमें दीर्घजीवी हों ॥ ६ ॥ अयोध्याकी रमणीयता वर्षा-वर्णन राग सूहो [ १९ ] कोसलपुरी सुहावनी सरि सरजूके तीर । भूपावली-मुकुटमनि नृपति जहाँ रघुबीर ॥