भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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गीतावली ४१६ पुर-नर-नारि चतुर अति, धरमनिपुन, रत नीति। सहज सुभाय सकल उर श्रीरघुबर-पद-प्रीति॥ श्रीरामपद-जलजात सबके प्रीति अबिरल पावनी। जो चहत सुक-सनकादि, संभु-बिरंचि, मुनि-मन-भावनी॥ सबहीके सुंदर मंदिरांजिर,राउ-रंक न लखि परै। नाकेस-दुरलभ भोग लोग करहिं, न मन बिषयनि हरै ॥ १ ॥ सरयूनदीके तटपर अति सुहावनी अयोध्यापुरी है, जहाँके राजा महिपालमण्डली-मुकुटमणि महाराज राम हैं। नगरके सभी स्त्री-पुरुष बड़े चतुर, धर्मकुशल और नीतिपरायण हैं। उन सबके हृदयमें स्वभावसेही श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंमेंप्रीति है। श्रीरामचन्द्रजीके चरणसरोरुहमें उन सभीका अविच्छिन्न और पवित्र प्रेम है, जिसकी कि शुक, सनकादि, महादेव और ब्रह्मा आदि भी इच्छा करते हैं और जो मुनियोंके मनको भी प्रिय है। सभीके घर और आँगन बड़े सुन्दर हैं। उनमें राजा-रंककी कोई पहचान ही नहीं होती। जो भोग देवराजको भी दुर्लभ हैं, उन्हें वहाँके लोग भोगते हैं, तो भी उनका मन विषयोंके वशीभूत नहीं होता ॥ १ ॥ सब रितु सुखप्रद सो पुरी, पावस अति कमनीय। निरखत मनहि हरत हठि हरित अवनि रमनीय॥ बीरबहूटि बिराजही, दादुर-धुनि चहुँ ओर। मधुर गरजि घन बरषहिं, सुनि सुनि बोलत मोर॥ बोलत जो चातक-मोर, कोकिल-कीर पारावत घने। खग बिपुल पाले बालकनि कूजत, उड़ात सुहावने॥ बकराजि राजति गगन, हरिधनु, तड़ित दसदिसि सोहहीं। नभ-नगरको सोभा अतुल अवलोकि मुनि-मन मोहहीं॥ २ ॥