गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१७ उत्तरकाण्ड वह पुरी यों तो सभी ऋतुओंमें सुखदायिनी है, परन्तु वर्षा ऋतुमें तो वह बड़ी ही सुहावनी जान पड़ती है। उस समय वहाँकी हरो-भरी रमणीय भूमि देखते ही बलपूर्वक चित्तको हर लेती है। चारों ओर बीरबहूटियाँ सुशोभित होती हैं, मेढकोंकी ध्वनि सुनायी देती है तथा मेघ मन्द-मन्द गरजकर वर्षा करते हैं और उनका शब्द सुन-सुनकर मयूर बोलने लगते हैं। उस समय चातक, मोर, कोकिल शुक और कबूतर आदि बहुत-से पक्षी बोलते रहते हैं तथा बालकोंके पाले हुए अनेकों पक्षी कूजते और सुहावनी उड़ान भरते हैं। आकाशमें बगुलोंकी पंक्ति और इन्द्रधनुष तथा दशा दिशाओंमें बिजली शोभायमान होने लगती है। उस समय आकाश और नगरकी वह अतुलित शोभा देखकर मुनियोंके मन भी मोहित हो जाते हैं॥ २॥ गृह-गृह रचे हिडोलना, महि गच कांच सुढार। चित्र बिचित्र चहू दिसि परदा फटिक-पगार ॥ सरल बिसाल बिराजहीं बिद्रुम-खंभ सुजोर। चारु पाटि पटी पुरटकी झरकत मरकत भौर ॥ रकत भवँर डांडी कनक मनि-जटित दुति जगमगि रही। पटुली मनहु बिधि निपुनता निज प्रगट करि राखी सही ॥ बहुरंग लसत बितान मुकुतादाम-सहित मनोहरा। नव-सुमन-माल-सुगंध लोभे मंजु गुंजत मधुकरा ॥ ३ ॥ घर-घरमें हिंडोले, पृथ्वीपर कांचकी सुन्दर और सुढाल गच तथा चारों दिशाओंमें स्फटिककी भीतोंपर चित्र-विचित्र परदे लटक रहे हैं। मूंगेके सीधे, विशाल और सुदृढ़ खंभे सुशोभित हैं तथा सोनेसे मढ़ी हुई सुन्दर पटलियोंपर मरकतमणिके भौंरे (आंकड़े) झिलमिला गी० २६—