गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४१८ रहे हैं। इस प्रकार हिंडोलोंमें मरकतमणिके भौंरे और सोनेकी मणि- जटित डंडियोंकी कान्ति जगमगा रही है और पटली तो ऐसी सुशोभित होती है मानो विधाताने सचमुच ही अपनी रचनाचातुरीको प्रकट करके रक्खा हो। उन हिंडोलोंमें मोतियोंकी लड़ियोंके सहित अनेकों रंग-बिरंगे मनोहर चँदोवे शोभायमान हो रहे हैं तथा उनमें लटकी हुई नवीन पुष्पोंकी मालाओंकी सुगन्धपर लुब्ध होकर भ्रमरगण मनोहर गुंजार कर रहे हैं ॥ ३ ॥ झुंड झुंड झूलन चलीं गजगामिनि वर नारि । कुसुंभी चीर तनु सोहहीं, भूषन बिबिध सँवारि ॥ पिकबयनी मृगलोचनी, सारद ससि सम तुंड । रामसुजस सब गावहीं सुसुर सुसारँग गुंड ॥ सारंग, गुंड-मलार, सोरठ, सुहव सुघरनि बाजहीं । बहु भाँति तान-तरंग सुनि गंधरब किंनर लाजहीं ॥ अति मचत, छूटत कुटिल कच, छबि अधिक सुंदरि पावहीं । पट उड़त, भूषन खसत, हँसि हँसि अपर सखी झुलावहीं ॥ ४ ॥ [उन हिंडोलेमें] झुंड-की-झुंड गजगामिनी सुन्दर नारियाँ झूलनेके लिये जा रही हैं। उनके शरीरपर कुसुंभी साड़ी तथा तरह- तरहसे सजाये हुए आभूषण शोभायमान हैं। उनके मुख शरदचन्द्रके समान हैं, वे कोकिलके समान स्वरवाली, मृगनयनी बालाएँ सुन्दर स्वरसे सारंग और गौंड रागमें भगवान् रामका सुयश गान कर रही हैं। इस प्रकार अयोध्याके सुन्दर घरोंमें सारंग, गौंडमलार, सोरठ और सूहो रागोंमें मनोहर बाजे बज रहे हैं। उनकी अनेक प्रकारकी तान- तरंगावली सुनकर गन्धर्व और किन्नर भी लज्जित हो जाते हैं। इस