गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१६ उत्तरकाण्ड प्रकार खूब झूला मचता है, झूलनेवाली नारियों की घुंघराली अलकें बिखर जाती हैं, जिससे उन रमणियों की सुन्दरता और भी बढ़ जाती है। हवा लगने से उनके वस्त्र उड़ने लगते हैं और आभूषण खिसक जाते हैं। इसपर अन्यान्य सखियाँ उन्हें हँस-हँसकर झुलाने लगती हैं ॥ ४ ॥
फिरि फिरि झूलहिं भामिनी अपनी अपनी बार। बिबुध-बिमान थकित भए देखत चरित अपार ॥ बरषि सुमन हरषहिं उर, बरनहिं हरिगुन-गाथ । पुनि पुनि प्रभुहि प्रसंसहीं 'जय जय जानकिनाथ' ॥ जय जानकीपति, बिसद कीरति सकल-लोक-मलापहा ॥ सुरबधू देंहि असीस, चिरजिव राम, सुख-संपत्ति महा ॥ पावस समय कछू अवध बन्नत सुनि अघौघ नसावहीं । रघुबीरके गुनगन नवल नित दास तुलसी गावहीं ॥ ५ ॥
सब सखियाँ अपनी-अपनी बारी से पुनः-पुनः झूलती हैं। इस अपार चरित को देवताओं के विमान थकित होकर देख रहे हैं। वे पुष्प बरसाकर हृदय में हर्षित हो श्रीहरि की गुणगाथा बखान करते हैं और 'जानकीनाथ की जय हो, जय हो' ऐसा कहते हुए बारंबार प्रभु की प्रशंसा करते हैं। जानकीनाथ की जय हो; उनकी विशद कीर्ति सम्पूर्ण कलि-कल्मषों को नष्ट करनेवाली है। इस प्रकार देवाङ्गनाएँ भी 'भगवान् राम चिरजीवी हों और उनका सुख और वैभव बढ़ता रहे' ऐसा कहती हुई उन्हें आशीर्वाद देती हैं। वर्षाकालीन अयोध्या- का वर्णन सुनने से सब पापसमूह नष्ट हो जाते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि रघुनाथजी के नित्य-नूतन गुणगण को दास सदा ही गाते रहते हैं ॥ ५ ॥