गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४२० दीपमालिका राग आसावरी [ २० ] साँझ समय रघुबीर-पुरीकी सोभा आजु बनी। ललित दीपमालिका बिलोकहिं हित करि अवधधनी ॥ १ ॥ फटिक-भीत-सिखरन-पर राजति कंचन-दीप-अनी। जनु अहिनाथ मिलन आयो मनि-सोभित सहसफनी ॥ २ ॥ प्रति मंदिर कलसनिपर भ्राजहिं मनिगन दुति अपनी। मानहुँ प्रगटि बिपुल लोहितपुर पठइ दिये अवनी ॥ ३ ॥ घर घर मंगलचार एकरस हरषित रंक-गनी। तुलसिदास कल कीरति गावहिं, जो कलिमल-समनी ॥ ४ ॥ आज सायंकालमें रघुनाथजीकी राजधानीकी खूब शोभा हो रही है। आयोध्यानाथ रामचन्द्रजी प्रीतिपूर्वक मनोहर दीपामालिका देख रहे हैं॥ १॥ स्फटिकमणिकी भीतोंके ऊपर सुवर्णमय दीपकोंकी पंक्ति ऐशी शोभायमान है मानो [रघुनाथजीसे] मिलनेके लिये मणिविभूषित सहस्रफणधारी शेषजी आये हों॥ २॥ प्रत्येक महलके कलशोंके ऊपर मणिगण अपनी कान्तिसे इस प्रकार शोभा पा रहे हैं मानो बहुत से मङ्गललोक उत्पन्न करके पृथ्वीपर भेद दिये गये हों॥ ३॥ घर-घरमें मङ्गलाचार हो रहा है तथा निर्धन और धनी सभी एक समान आनन्दित हैं। तुलसीदास भगवान्की पवित्र कीर्ति गाता है, जो कलियुगके पापों का नाश करनेवाली है॥ ४॥