भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

गीतावली ४२० दीपमालिका राग आसावरी [ २० ] साँझ समय रघुबीर-पुरीकी सोभा आजु बनी। ललित दीपमालिका बिलोकहिं हित करि अवधधनी ॥ १ ॥ फटिक-भीत-सिखरन-पर राजति कंचन-दीप-अनी। जनु अहिनाथ मिलन आयो मनि-सोभित सहसफनी ॥ २ ॥ प्रति मंदिर कलसनिपर भ्राजहिं मनिगन दुति अपनी। मानहुँ प्रगटि बिपुल लोहितपुर पठइ दिये अवनी ॥ ३ ॥ घर घर मंगलचार एकरस हरषित रंक-गनी। तुलसिदास कल कीरति गावहिं, जो कलिमल-समनी ॥ ४ ॥ आज सायंकालमें रघुनाथजीकी राजधानीकी खूब शोभा हो रही है। आयोध्यानाथ रामचन्द्रजी प्रीतिपूर्वक मनोहर दीपामालिका देख रहे हैं॥ १॥ स्फटिकमणिकी भीतोंके ऊपर सुवर्णमय दीपकोंकी पंक्ति ऐशी शोभायमान है मानो [रघुनाथजीसे] मिलनेके लिये मणिविभूषित सहस्रफणधारी शेषजी आये हों॥ २॥ प्रत्येक महलके कलशोंके ऊपर मणिगण अपनी कान्तिसे इस प्रकार शोभा पा रहे हैं मानो बहुत से मङ्गललोक उत्पन्न करके पृथ्वीपर भेद दिये गये हों॥ ३॥ घर-घरमें मङ्गलाचार हो रहा है तथा निर्धन और धनी सभी एक समान आनन्दित हैं। तुलसीदास भगवान्‌की पवित्र कीर्ति गाता है, जो कलियुगके पापों का नाश करनेवाली है॥ ४॥

४२१ उत्तरकाण्ड बसन्त बिहार राग गौरी [ २२ ] अवध नगर अति सुंदर बर सरिताके तीर । नीति-निपुन नर-तिय सबहिँ, धरम-धुरंधर, बीर ॥ १ ॥ सकल रितुन्ह सुखदायक, तामहँ अधिक बसंत । भूप-मौलि मनि जहँ बस नृपति जानकीकंत ॥ २ ॥ बन उपवन नव किसलय, कुसुमित नाना रंग । बोलत मधुर मुखर खग पिकबर, गुंजत भृंग ॥ ३ ॥ समय बिचारि कृपानिधि, देखि द्वार अति भीर । खेलहुँ मुदित नारि-नर, बिहँसि कहेउ रघुबीर ॥ ४ ॥ नगर-नारि-नर हरषित सब चले खेलन फागु । देखि राम-छबि अतुलित उमगतउर अनुरागु ॥ ५ ॥ स्याम-तमाल-जलदतनु निरमल पीत दुकूल । अरुन-कंज-दल-लोचन सदा दास अनुकूल ॥ ६ ॥ सिर किरीट श्रुति कुंडल, तिलक मनोहर भाल । कुंचित केस, कुटिल भ्रू, चितवनि भवन-कृपाल ॥ ७ ॥ कल कपोल, सुक नासिक, ललित अधर द्विज जोति । अरुन कंज महँ जनु जुग पाँति रुचिर गज-मोति ॥ ८ ॥ बर दर-ग्रीव अमितबल बाहु सुपीन बिसाल । कंकन-हार मनोहर, उरसि लसति बनमाल ॥ ६ ॥ उर भृगु-चरन बिराजत, द्विज-प्रिय चरित पुनीत । भगत हेतु नर बिग्रह सुरबर गुन-गोतीत ॥ १० ॥ उदर त्रिरेख मनोहर, सुंदर नाभि गँभीर । हाटक-घटित, जटित मनि कटितट रट मंजीर ॥ ११ ॥

गीतावली ४२२ उरु अरु जानु पीन, मृदु, मरकत खंभ समान। नूपुर मुनि-मन मोहत, करत सुकोमल गान ॥१२॥ अरुनबरन पदपंकज, नखदुति इंदु-प्रकास। जनक-सुता-करपल्लव-लालित बिपुल बिलास ॥१३॥ कंजकुलिस-धुज-अंकुस-रेख चरन सुभ चारि। जन-मन-मीन हरन कहँ बंसी रची सँवारि ॥१४॥ अंग अंग प्रति अतुलित सुषमा बरनि न जाइ। एहि सुख मगन होइ मन फिरि नहि अनत लोभाइ ॥१५॥ खेलत फागु, अवधपति, अनुज-सखा सब संग। बरषि सुमन सुर निरखहिं सोभा अमित अनंग ॥१६॥ ताल, मृदंग झाँझ, डफ बाजहिं पनव-निसान। सुघर सरल सहनाइन्ह गावहिं समय समान ॥१७॥ बीना-बेनु-मधुर-धुनि सुनि किंनर-गन्धर्ब। निज-गुन गरुअ ह्रदय अति मानहिं मन तजि गर्ब ॥१८॥ निज निज अटनि मनोहर गान करहिं पिकबैनि। मनहुँ हिमालय-सिखरनि लसहिं अमर-मृगनैनि ॥१९॥ धवल धामतें निकसहिं जहँ तहँ नारि-बरूथ। मानहुँ मथत पयोनिधि बिपुल अपसरा-जूथ ॥२०॥ किसुकबरन सुअंगक सुषमा सुखनि समेत। जनु बिधु-निबह रहे करि दामिनि-निकर निकेत ॥२१॥ कुंकुम सुरस अबीरनि भरहिं चतुर बर नारि। रितु सुभाय सुठि सोभित देहिं बिबिध बिधि गारि ॥२२॥ जो सुख जोग, जाग, जप, अरु तीरथतें दूरि। राम-कृपाते सोइ सुख अवध गलिन्ह रह्यो पूरि ॥२३॥ खेलि बसंत कियो प्रभु मज्जन सरजूनीर। बिबिध भाँति जाचक जन पाए भूषन चीर ॥२४॥

४२३ उत्तरकाण्ड तुलसिदास तेहि अवसर मांगी भगति अनूप । मृदु मुसुकाइ दीन्हि तब कृपादृष्टि रघुभूप ॥ २५ ॥ श्रेष्ठ नदी सरयूके तटपर बसा हुआ अयोध्या नगर बड़ा ही सुन्दर है। वहाँके सभी स्त्री-पुरुष नीति-निपुण, धर्मधुरन्धर और धैर्यशाली हैं॥ १॥ यों तो वह नगर जहाँ नृपतिशिरोमणि जानकीनाथ भगवान् राम निवास करते हैं, सभी ऋतुओंमें सुखदायक है, किन्तु बसन्त ऋतुमें उसकी शोभा अधिक बढ़ जाती है ॥ २ ॥ वहाँके वन और उपवनोंमें नवीन पत्ते और कई रंगके पुष्प खिले हुए हैं, चहचहाते हुए पक्षी और सुन्दर कोकिल सुमधुर बोली बोल रहे हैं तथा भौंरे गूंज रहे हैं ॥३॥ कृपानिधान भगवान् रामने अनुकूल समय समझकर और द्वारपर बहुत भीड़ लगी देखकर हँसते हुए कहा, 'सब स्त्री-पुरुष प्रसन्नतापूर्वक होली खेलो' ॥ ४ ॥ यह सुनकर नगरके सब नर नारी प्रसन्न होकर फाग खेलने चले । उस समय महाराज रामकी अनुपम छबि देखकर उनके हृदयमें अपार प्रेम उमड़ने लगा ॥ ५ ॥ भगवान् रामका शरीर श्याम-तमाल अथवा श्माम मेघके समान शोभायमान है। उसपर अति निर्मल पीताम्बर है। उनके नेत्र अरुण कमलदलके समान हैं और वे सदा ही अपने सेवकोंपर कृपादृष्टि रखते हैं ॥ ६ ॥ प्रभुके सिरपर किरीट, कानोंमें कुण्डल और मनोहर मस्तकपर तिलक सुशोभित है । उनकी अलकावली कुञ्चित, भ्रुकुटि बाँकी और चितवन भक्तोंपर कृपाकरने- वाली है ॥ ७ ॥ उनके कपोल बड़े सुन्दर हैं, नासिका तोतेकी चोंचके समान है तथा मनोहर ओठोंके बीचमें दाँतोंकी ज्योति इस प्रकार जगमगा रही है, मानो अरुण-कमलके बीचमें गजमुक्ताओंकी दो

गीतावली ४२४ मनोहर पंक्तियाँ हो ॥ ८ ॥ भगवान्‌की शंखके समान सुन्दर ग्रीवा है तथा उनकी स्थूल और लंबी-लंबी भुजाओंमें अपार बल है। प्रभु मनोहर कंकण और हार धारण किये हुए हैं तथा उनके वक्षःस्थलमें वनमाला विराज रही है ॥९॥ भगवान् ब्राह्मणप्रिय और पवित्रचरित्र हैं। उनके वक्षःस्थलमें भृगुजीके चरणका चिह्न सुशोभित है, वे गुण और इन्द्रियोंसे अतीत देवश्रेष्ठ अपने भक्तोंके लिये ही मनुष्यशरीर धारण करते हैं ॥ १० ॥ प्रभुके उदरदेशमें मनोहर त्रिवली और अति सुन्दर गम्भीर नाभि है। उनके कटिप्रदेशमें सोनेकी बनी हुई मणिजटित करधनी मनोहर शब्द कर रही है ॥ ११ ॥ उनके जंघा और जानु मरकतमणि खंभोंके समान स्थूल और मृदुल (चिकने) हैं तथा सुमधुर ध्वनि करते हुए नूपुर मुनियोंके मन मोह लेते हैं ॥१२॥ प्रभुके चरण-कमल अरुणवर्ण हैं, उनके नखोंकी कान्ति चन्द्रमा- के प्रकाशके समान है तथा वे श्रीजनकनन्दनीके पाणिपल्लवोंद्वारा बड़ी बिलासितासे ललित हो रहे हैं ॥ १३ ॥ उन चरणोंमें जो कमल, वज्र, ध्वजा और अंकुशकी चार शुभ रेखाएँ हैं, वे मानो भक्तोंके मनरूप मत्स्योंको पकड़नेके लिये सँवाकर बनायी हुई बंसी (मछली पकड़नेका काँटा) ही हैं ॥ १४ ॥ इस प्रकार प्रभुके अङ्ग-अङ्गकी अतुलित शोभा है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। मन इस सुखमें मग्न हो जानेपर फिर दूसरी जगह नहीं फँसता ॥ १५ ॥ जिस समय अयोध्यापति भगवान् राम अपने छोटे भाई और सखाओंके साथ फाग खेलते हैं, उस समय देवतालोग फूलों- की वर्षा करते हुए उनका अनन्त कामदेवोंके समान शोभा निहारते हैं ॥ १६ ॥ उस समय [नगरनिवासी] करताल, मृदंग

४२५ उत्तरकाण्ड झांझ, डफ, ढोल और दुन्दुभी आदि बाजे बजाते हैं तथा सुन्दर और सरस शहनाइयोंपर समयानुकूल गाना गाते हैं ॥ १७ ॥ वीणा और बाँसुरीकी सुमधुर ध्वनि सुनकर किन्नर और-गन्धर्वगण अपने बड़े गुणको भी, अभिमान छोड़कर मन-ही-मन अत्यन्त तुच्छ मानने लगते हैं ॥ १८ ॥ कोकिलभाषिणी कामिनियाँ अपनी-अपनी अटारियोंपर चढ़कर मनोहर गान कर रही हैं, मानो हिमालयके शिखरोंपर सुर-सुन्दरियाँ विराजमान हों ॥ १९ ॥ जहाँ-तहाँ अपने अपने उज्ज्वल भवनोंसे स्त्रियोंके झुण्ड निकलते हैं, मानो बहुत-सी अप्सराएँ मिलकर समुद्र-मन्थन कर रही हों ॥ २० ॥ वे सुन्दरता और आनन्दसहित बसन्ती साड़ी ओढ़े ऐसी जान पड़ती हैं, मानो चन्द्रमाओंके समूह बिजलियोंके घरोंमें बसे हुए हों ॥ २१ ॥ वे सुचतुर सुन्दरी स्त्रियाँ अबीर घोलकर कुंकुमोंमें भरती हैं तथा ऋतुके स्वभावानुसार तरह-तरहकी पवित्र और सुन्दर गालियाँ देती हैं॥२२॥ जो सुख, योग, यज्ञ, जप और तीर्थ आदिसे परे है वही श्रीरामचन्द्रजी की कृपासे अयोध्याकी गलियोंमें भरा हुआ है ॥ २३ ॥ इस प्रकार फाग खेलनेके अनन्तर भगवान्‌ने सरयू नदीके जलमें स्नान किया। तदनन्तर याचकोंको तरह-तरहके वस्त्र और आभूषण प्राप्त हुए ॥२४॥ उसी समय तुलसीदासने प्रभुकी अनुपम भक्ति माँगी, तब श्रीरघुनाथ- जीने मृदुल मुसकान करते हुए कृपादृष्टिपूर्वक वह दे दी ॥ २५ ॥ राग बसंत [ २२ ] खेलत बसंत राजाधिराज । देखत नभ कौतुक सुर-समाज ॥१॥ सोहैं सखा-अनुज रघुनाथ साथ । झोलिन्ह अबीर, पिचकारि हाथ२

गीतावली ४२६ बाजहिं मृदंग,डफ,ताल,बेनु । छिरकैं सुगंधभरे मलय-रेनु ॥ ३ ॥ उत जुवति-जूथ जानकी संग । पहिरे पट भूषन सरस रंग ॥ ४ ॥ लिये छरी बेंत सोंधैंविभाग । चांचरि झूमक कहैं सरस राग ॥ ५ ॥ नूपुर-किंकिनि-धुनि अति सोहाइ । ललना-गन जब जेहि धरइँधाइ ॥६ लोचन आँजहि फगुआ मनाइ । छाड़हिं नचाइ, हाहा कराइ ॥७॥ चढ़े खरनि बिदूषक-स्वाँग साजि । करें कूटि, निपट गइ लाज भाजि॥८॥ नर-नारि परस्पर गारि देत । सुनि हँसत रामभाइन समेत॥९॥ बरषत प्रसून बर-बिबुध-वृंद । जय-जय दिनकर-कुल-कुमुदचंद १० ब्रह्मादि प्रसंसत अवध बास । गावत कलकीरति तुलसिदास ॥११॥ राजाधिराज भगवान् राम फाग खेल रहे हैं, आकाशमें देवता लोग यह कौतुक देख रहे हैं ॥ १ ॥ रघुनाथजीके साथ उनके सखा और छोटे भाई शोभायमान हैं। उनकी झोलियोंमें अबीर है और हाथोंमें पिचकारियाँ ॥ २ ॥ इस समय मृदंग, डफ, करताल और बाँसुरी आदि बाजे बज रहे हैं तथा चन्दनकी रजसे मिला हुआ सुगन्धित जल छिटका जा रहा है ॥ ३ ॥ उधर जानकीजीके साथ रंगबिरंगे वस्त्र और आभूषण पहने युवतियोंका झुंड हाथमें बेंतकी छड़ी लिये रास्ता खोजता है और अत्यन्त सरस चाँचर और झूमक राग गा रहा है ॥ ४-५ ॥ जब वे स्त्रियाँ दौड़कर किसीको पकड़ती हैं तो उनके नूपुर और करधनीकी ध्वनि बड़ी ही मनोहर जान पड़ती है ॥ ३ ॥ वे जिसे पकड़ती हैं, उसके नेत्रोंमें अञ्जन लगा देती हैं तथा उससे फगुआ मनाकर और नाच नचाकर बहुत प्रार्थना करने- पर छोड़ती हैं ॥ ७ ॥ बहुत-से लोग मसखरेका स्वाँग रचकर गधों- पर चढ़े हुए हैं। वे तरह-तरहकी कूटोक्तियाँ बोलते हैं, इस

४२७ उत्तरकाण्ड समय उनकी लज्जा बिल्कुल चली गयी है ॥ ८ ॥ स्त्री-पुरुष आपसमें गालियाँ देते हैं, उन्हें सुन-सुनकर श्रीरामचन्द्रजी भाइयोंके सहित हँसते हैं ॥ ९ ॥ 'सूर्यकुल-कुमुदकलाधर भगवान् रामकी जय हो, जय हों' ऐसा कहते हुए देवतालोग फूलोंकी वर्षा कर रहे हैं ॥ १० ॥ अयोध्याके निवासकी ब्रह्मादिक भी प्रशंसा कर रहे हैं। तुलसीदास भी प्रभुकी पवित्र कीर्तिका गान करता है ॥ ११ ॥ अयोध्या का आनन्द राग केदारा [ २३ ] देखत अवधको आनन्द । हरषि बरषत सुमन दिन दिन देवतनिको वृंद ॥ १ ॥ नगर-रचना सिखनको विधि तकत बहु बिधि-वृंद । निपट लागत अगम, ज्यों जलचरहि गमन सुछंद ॥ २ ॥ मुदित सुरलोगनि सराहत निरखि सुषमाकंद । जिन्हके सुअलि-चख पियत राम-मुखारबिंद-मरंद ॥ ३ ॥ मध्य ब्योम बिलंबि चलत दिनेस-उडुगन-चंद । रामपुरी बिलोकि तुलसी मिटत सब दुख-द्वंद ॥ ४ ॥ अयोध्याका आनन्द देखकर देवतालोग हृदयमें हर्षित हो नित्य- प्रति फूलोंकी वर्षा करते हैं ॥ १ ॥ नगरकी रचना सीखनेके लिये ब्रह्माजी उसके तरह-तरहके भेद देखते हैं, परन्तु उन्हें यह इस प्रकार अत्यन्त दुर्गम जान पड़ती है जैसे जलचरको पृथ्वीपर स्वच्छन्द विचरना* ॥ २ ॥ जिनके नेत्ररूप भौंरे सुषमाकन्द भगवान् *क्योंकि ब्रह्माजी मायिक सृष्टिके अधिकारी हैं और यह दिव्य रचना है ।

गीतावली ४२८ रामको निहारकर उनके मुखकमलका मकरन्द पान करते हैं, उन अयोध्यावासियोंकी वे प्रसन्नतापूर्वक सराहना करते हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भगवान् रामकी पुरीको देखनेसे सारे दुःख और द्वन्द्व नष्ट हो जाते हैं, अतः सूर्य, तारे और चन्द्रमाभी उसे देखनेके लिये] मध्य आकाशमें कुछ ठहरकर चलते हैं ॥ ४ ॥ रामराज्य राग सोरठ [ २४ ] पालत राज यों राजीं राम धरमधुरींन । सावधान, सुजान, सब दिन रहत नय-लयलीन ॥ १ ॥ स्वान-खग-जति-न्याउ देख्यो आपु बैठि प्रबीन । नीचु हति महिदेव-बालक कियो मीचुबिहीन ॥ २ ॥ भरत ज्यों अनुकूल जग निरुपाधि नेह नवीन । सकल चाहत रामही, ज्यों जल अगाधहि मीन ॥ ३ ॥ गाइ राज-समाज जांचत बास तुलसी दीन । लेहु निज करि देहु निज-पद-प्रेमपावन पीन ॥ ४ ॥ इस प्रकार धर्मधुरन्धर महाराज राम अपने राज्यका पालन करते हैं । वे परम सुजान सर्वदा सावधान रहकर नीतिमें तत्पर रहते हैं ॥ १ ॥ प्रवीण रामचन्द्रजीने श्वान, पक्षी और यतिका न्याय स्वयं बैठाकर देखा तथा शूद्रको मारकर ब्राह्मणके बालकको जीवन दान दिया ॥ २ ॥ भरतजीके समान सारा संसार ही भगवान्से अहैतुक और नित्यनूतन प्रेम करता था। मछली जिस प्रकार अगाध जलको ही चाहती है उसी प्रकार सभी लोग रामचन्द्रजीको ही चाहते

४२६ बालकाण्ड थे ॥ ३ ॥ भगवान्‌के राजसमाजका वर्णन करके दीन तुलसीदास भी यही माँगता है कि मुझे अपनाकर अपने चरणोंका परम पवित्र और सुदृढ़ प्रेम दीजिये ॥ ४ ॥ सीता-बनवास [ २४ ] संकट सुकृतको सोचत जानि जिय रघुराउ । सहस द्वादस पंचसतमें कछुक है अब आउ ॥ १ ॥ भोग पुनि पितु-आयुको, सोउ किए बनै बनाउ । परिहरे बिनु जानकी नहि और अनघ उपाउ ॥ २ ॥ पालिबे असिधार-ब्रत, प्रिय प्रेम-पाल सुभाउ । होइ हित केहि भांति, नित सुबिचारु, नहि चित चाउ ॥ ३ ॥ निपट असमंजसहु बिलसति मुख मनोहरताउ । परम धीर-धुर्रीन हृदय किं हरष-बिसमय काउ ? ॥ ४ ॥ अनुज-सेवक-सचिव हैं सब सुमति, साध सखाउ । जान कोउ न जानकी बिनु अगम अलख लखाउ ॥ ५ ॥ राम जोगवत सीय-मनु, प्रिय-मनहि प्रानप्रियाउ । परम पावन प्रेम-परमिति समुझि तुलसी गाउ ॥ ६ ॥ एक समय श्रीरघुनाथजी धर्मसंकट उपस्थित होनेपर मन-ही- मन इस प्रकार सोचने लगे—‘अब मेरी बारह हजार पाँच सौ वर्षकी आयुमें कुछ ही और शेष है ॥ १ ॥ उसके पश्चात् पिताकी आयुका भोग है, और उसे भोगनेसे ही काम चलेगा; किन्तु उसे भोगनेके लिये सीताजीको त्यागे बिना और कोई निर्दोष उपाय नहीं

गीतावली ४३०

हैं'* ॥ २ ॥ अब खांड़ेकी धारके समान कठोर व्रतका तो पालन करना है, और प्रेमको निभानेका भगवान्‌का प्रिय स्वभाव है । ऐसी अवस्थामें किस प्रकार हित हो—इस सतत विचारके कारण उनके चित्तमें उत्साहका अभाव हो गया ॥ ३ ॥ किन्तु ऐसे असमंजसके समय भी मुखपर मनोहरता छायी हुई थी । भला, परम धीरधुरन्धर भगवान् रामके हृदयमें भी कभी हर्ष या विषाद हो सकता था ? ॥ ४ ॥ छोटे भाई, सेवक, मन्त्री और मित्रगण—ये सभी बड़े बुद्धिमान् और साधु-चरित हैं; परंतु भगवान्‌की इस दुर्गम और अदृश्य गतिको जानकीजीके सिवा और कोई नहीं जानता था ॥ ५ ॥ क्योंकि भगवान् राम सीताजीके मनको देखते रहते हैं और प्राणप्रिया सीताजी भी अपने प्रियतमका मन देखती रहती हैं । तुलसीदास भी इस परम पवित्रप्रेमकी मर्यादाको समझकर इसका गान करता है ॥६॥

[ २६ ] राम बिचारि कै राखी ठीक दै मन माँहि । लोक-बेद-सनेह पालत पल कृपालहि जाहि ॥ १ ॥ प्रियतमा, पतिदेवता, जिहि उमा रमा सिहाहिं । गुरुविनी सुकुमारि सियतियमनि समुझि सकुचाहिं ॥ २ ॥ मेरे ही सुख सुखो, सुख अपनो सपनहुँ नाहिं । गेहिनी गुन गेहनी गुन सुमिरि सोच समाहिं ॥ ३ ॥


*महाराज दशरथ अपनी अवस्था पूरी होनेसे पूर्व ही स्वर्गवासी हो गये थे । उनकी शेष आयु श्रीरामचन्द्रजीने भोगी । परंतु पिताकी आयुमें सीताजीको साथ रखना उन्हें अनुचित जान पड़ा । इसलिये उन्होंने उनका परित्याग कर दिया ।

४३१ उत्तरकाण्ड राम-सीय-सनेहु बरनत अगम कबि सकाहिं । रामसीय-रहस्य तुलसी कहत राम-कृपाहिं ॥ ४ ॥ अन्तमें रामचन्द्रजीने बहुत सोच-विचारकर मन-ही-मन उन्हें त्याग देना निश्चित कर लिया। अब परम कृपालु रघुनाथजीके सभी क्षण लौकिक-वैदिक स्नेहका पालन करनेमें बीतने लगे ॥ १ ॥ 'सीताजी मुझे परम प्रिय हैं, उनके अलौकिक पातिव्रतको देखकर पार्वती और लक्ष्मीजी भी ईर्ष्या करती हैं, इस समय वे गर्भवती हैं तथा परम सुकुमारी नारीरत्न हैं' यह विचारकर प्रभु उन्हें त्यागनेमें सकुचाते हैं ॥ २ ॥ 'सीताजी मेरे ही सुखमें सुखी रहती हैं, इन्हें अपने सुखका स्वप्नमें भी ध्यान नहीं है' इस प्रकार अपनी गुणखानि गृहिणीके गुणोंको याद कर-करके वे सोचमें डूब जाते हैं ॥ ३ ॥ श्रीराम और सीताजीके अगम स्नेहका वर्णन करनेमें बड़े-बड़े कवि भी शङ्कित हो जाते हैं। तुलसीदास तो श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे ही राम और सीताके गूढ़ रहस्यका वर्णन करता है ॥ ४ ॥ - [ २७ ] चरचा चरनिसों चरती जानमनि रघुराइ । दूत-मुख सुनि लोक-धुनि घर घरनि बूझी आइ ॥ १ ॥ प्रिया निज अभिलाष रुचिकहि कहति सिय सकुचाइ । तीये-तनयसमेत तापस पूजिहौं बन जाइ ॥ २ ॥ जानि करुनासिंधु भाबी-बिबस सकल सहाइ । धीर धरि रघुबीर भोरहि लिए लषन बोलाइ ॥ ३ ॥ 'तात तुरतहि साज स्यंदन सीय लेहु चढ़ाइ । बालमीकि मुनीस आश्रम आइयहु पहुँचाइ ॥ ४ ॥

गीतावली ४३२ 'भलेहि नाथ,' सुहाथ माथे राखि राम-रजाइ । चले तुलसी पालि सेवक-धरम अवधि अघाइ ॥ ५ ॥ चतुरशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीने अपने चरोंसे गुप्त समाचारकी बातें कीं । दूतोंके मुखसे लोकमतको जानकर अपने महलमें आ श्रीसीताजीसे पूछा—॥ १ ॥ 'प्राणप्रिये ! तुम अपनी अभीष्ट रुचि बतलाओ ।' तब सीताजीने सकुचाकर कहा—'मैं वनमें जाकर स्त्री और बालकोंके सहित तपस्वियोंका पूजन करना चाहती हूँ' ॥ २ ॥ तब करुणासागर भगवान् रामने होनहारके वश सारी सहायता उपस्थित देख, धैर्य धारणकर सवेरा होते ही लक्ष्मीजीको बुलाया ॥ ३ ॥ और कहा—'भैया ! तुम इसी समय रथ सजाकर उसपर सीताजीको बिठा वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर पहुँचा आओ' ॥ ४ ॥ तब 'प्रभो ! बहुत अच्छा' इस प्रकार कह अपने हाथोंको माथेपर रखा (दुःख किया) और भगवान् रामकी आज्ञा शिरोधार्य की । वे सेवकधर्मका पूर्णतया पालन करते हुए वहाँसे चल दिये ॥ ५ ॥ [ २८ ] आइ लषन लै सौंपी सिय मुनीसहि आनि । नाइ सिर रहे पाइ आसिष जोरि पंकजपानि ॥ १ ॥ बालमीकि बिलोकि ब्याकुल लषन गरत गलानि । सरबबिद बूझत न, बिधिकी बामता पहिचानि ॥ २ ॥ जानि जिय अनुमानही सिय सहस बिधि सनमानि । राम सदगुन-धाम, परमिति भई कछुक मलानि ॥ ३ ॥ दीनबंधु दयालु देवर देखि अति अकुलानि । कहति बचन उदास तुलसीदास त्रिभुवन-रानि ॥ ४ ॥

४३३ उत्तरकाण्ड तब लक्ष्मणजीने सीताजीको लाकर मुनिवर वाल्मीकिको सौंप दिया और सिर नवा उनका आशीर्वाद पा करकमल जोड़े हुए खड़े रहे ॥ १ ॥ लक्ष्मणजीको व्याकुल और ग्लानिसे गलते देख सर्वज्ञ वाल्मीकिजीने विधाताको वाम जानकर उनसे कुछ भी नहीं पूछा ॥ २ ॥ उन्होंने अपने मन-ही-मन अनुमानसे सारी बातें जानकर सीताजी का सहस्रों प्रकार सम्मान किया; किंतु [ यह विचारकर कि ] राम तो सम्पूर्ण सद्गुणोंके धाम और सीमा हैं [ उन्होंने यह क्या किया ? ] उन्हें कुछ खेद भी हुआ ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, त्रिलोकीकी रानी सीताजी अपने दीनबन्धु और दयामय देवरको देखकर बड़ी व्याकुल हो गयीं और उदास होकर ये वचन कहने लगीं ॥ ४ ॥ [ २९ ] तौलौं बलि, आपुही कीबी बिनव समुझि सुधारि । जौलों हौं सिखि लेउँ बन रिषि-रीति बसि दिन चारि ॥ १ ॥ तापसी कहि कहा पठवति नृपतिको मनुहारि । बहुरि तिहि बिधि आइ कहिहै साधु कोउ हितकारि ॥ २ ॥ लखनलाल कृपाल ! निपटहि डारिबी न बिसारि । पालबी सब तापसनि ज्यौं राजधरम बिचारि ॥ ३ ॥ सुनत सीता-बचन मोचत सकल लोचन-बारि । बालमीकि न सके तुलसी सो सनेह सँभारि ॥ ४ ॥ [ सीताजी बोलीं— ] ‘जबतक मैं चार दिन वनमें रहकर तपस्वियोंकी रीति न सीख लूं तबतक तुम्हीं भलीभाँति समझ-बूझकर भगवान्‌को विनय करते रहना ॥ १ ॥ मैं तपस्विनी होकर भला गी० २८

गीतावली ४३४ राजाओंके अनुकूल वचन क्या कहला भेजूं । मुझे विश्वास है कि [जिस प्रकार मेरे विरुद्ध बातें अयोध्यामें कही गयी हैं] उसी प्रकार इस बार कोई सज्जन पुरुष आकर मेरे अनुकूल बातें भी कहेगा ॥२॥ कृपामय लषणलाल ! तुम मुझे एकाएकी भूल मत जाना और राजधर्म ही समझकर सब तपस्विनियोंके समान मेरा भी पालन करते रहना' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, सीताजीके ये वचन सुनकर सब लोग नेत्रोंसे जल बरसाने लगे । [औरोंकी तो बात हो क्या,] वाल्मीकिजी भी उस स्नेहके कारण अपनेको न सँभाल सके ॥ ४ ॥

[ ३० ] सुनि ब्याकुल भए, उतरु कछु कह्यो न जाइ । जानि जिय बिधि बाम दीन्हों मोहि सरुष सजाइ ॥ १ ॥ कहत हित मेरी कठिनई लखि गई प्रीति लजाइ । आजु अवसर ऐसेहू जौं न चले प्रान बजाइ ॥ २ ॥ इतहि सीय-सनेह-संकट उतहि राम रजाइ । मौनही गहि चरन, गौने सिख-सुआसिष पाइ ॥ ३ ॥ प्रेम-निधि पितु को कहे मैं परुष बचन अघाइ । पाप तेहि परिताप तुलसी उचित सहे सिराइ ॥ ४ ॥

ये सब बातें सुनकर लक्ष्मणजी व्याकुल हो गये, उनसे कुछ भी उत्तर नहीं दिया गया; मनमें समझ लिया कि वाम विधाताने कुपित होकर मुझे सजा दी है ॥ १ ॥ वे मन-ही-मन कहने लगे—'अहो मेरी कठोरता देखकर प्रीति भी लज्जित हो गयी जो आज ऐसे अवसरपर भी मेरे प्राणोंने कूच नहीं किया' ॥ २ ॥

४३५ उत्तरकाण्ड इधर तो उन्हें सीताजीके प्रेमका आकर्षण था और उधर भगवान् रामकी आज्ञाका विचार था। अन्तमें वे चुपचाप ही सीताजीके चरण छू उनसे आशीर्वाद और शिक्षा ग्रहणकर वहांसे चल दिये ॥ ३ ॥ [ वे सोचने लगे— ] 'मैंने अपने प्रेमनिधि पिताजीको भरपेट कठोर बचन कहे थे*। उस पापके कारण ही आज यह उचित दुःख सहन करना पड़ा जो संहकर ही चुकेगा' ॥ ४ ॥ [ ३१ ] गौने मौनहो बारहि बार परि परि पाय। जात जनु रथ चीर कर लछिमन मगन पछिताय ॥ १ ॥ असन बिनु बन, बरन बिनु रन, बच्यो कठिन कुघाय। दुवह साँसति सहनको हनुमान ज्यायो जाय ॥ २ ॥ हेतु हौ सियहरनको तब, अबहु भयो सहाय। होत हठि मोहि दाहिनो दिन दैव दारुन दाय ॥ ३ ॥ तज्यो तनु संग्राम जेहि लगि गीध जसो जटाय। ताहि हौं पहुँचाइ कानन चल्यों अवध सुझाय ॥ ४ ॥ घोरहृदय कठोर करतव सृज्यो हौं बिधि बायें। दास तुलसी जानि राख्यो कृपानिधि रघुराय ॥ ५ ॥ फिर बारंबार चरणोंमें गिर लक्ष्मणजी चुपचाप ही चल दिये। वे पश्चात्तापमें ऐसे डूबे हुए थे मानो रथमें वस्त्रके पुतले ही हैं ॥ १ ॥ [ वे मन-ही-मन सोचते थे-- ] 'हाय ! मैं वनमें बिना भोजनके ही जीवित रहा, युद्धक्षेत्रमें कवच न रहनेपर भी कुछ न बिगड़ा; शक्ति लगते समय भी बच गया, उस समय इस दुःसह *लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा ॥ —रामचरितमानस

गीतावली ४३६ दुःखको सहन करनेके लिये मुझे हनूमान्‌जीने ओषधि लाकर व्यर्थ ही जीवित कर दिया ॥ २ ॥ मैं ही सीताहरणका कारण था और अब मैं ही उनके वनवासका हेतु हुआ । हे विधाता ! मेरा दाहिना दिन ( अनुकूल समय ) भी हट करके तेरा कठोर दाँव ही हो जाता है ! [ इसीसे भगवदाज्ञापालनरूप अनुकूल कर्म करते हुए भी मुझसे सीतावनवास-जैसा कठोर कर्म बन गया ] ॥ ३ ॥ अहो ! जिनके लिये यशस्वी जटायुने संग्रामभूमिमें अपना शरीर त्याग दिया उन्हीं सीताजीको मैं वनमें पहुँचाकर स्वभावतः अयोध्यापुरीको जा रहा हूँ ॥ ४ ॥ मालूम होता है, वाम विधाताने मुझे कठोर कर्तव्य करनेके लिये कुटिलहृदय ही रचा है और इस बातको कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजी जानते हैं [ इसीलिये ऐसे कठोर कार्योंके लिये वे मुझे ही आज्ञा दिया करते हैं ]' ॥ ५ ॥ [ ३२ ] पुत्रि ! न सोचिये आई हौ जनक-गृह जिय जानि । काल्हिको कल्यान-कौतुक, कु

४३७ उत्तरकाण्ड

[ बाल्मीकिजी कहते हैं—] 'पुत्रि ! तू मनमें यह समझकर कि मैं अपने पिताके घर आयी हुई हूँ, किसी प्रकारका शोक न कर । कल्याणि ! तुझे कल ( शीघ्र ) ही आनन्द-मङ्गल प्राप्त होने- वाला है ॥ १ ॥ तेरे पिता और ससुर—दोनों ही राजर्षि हैं, साक्षात् भगवान् पति हैं और तू भी सम्पूर्ण मङ्गलोंकी खानि है—ऐसे स्थलमें भी विपरीत गति देखी जाती है, इससे मालूम होता है विधाताका स्वभाव बड़ा ही टेढ़ा है, ॥ २ ॥ फिर वाल्मीकिजीने प्रीतिकी गति जानकर सीताजीको बुलाया और उन्हें अपनी कन्या मानकर यह शिक्षा दी—'हे सीते ! तुम आलसियोंको शुभ गति देनेवाली गङ्गाजीकी मन लगाकर सेवा करना ॥ ३ ॥ प्रातःकाल ही स्नान करके इच्छित फल देनेवाले वटवृक्षका पूजन करना । हे देवि ! इससे तुम्हें पुत्रोंकी प्राप्ति होगी; दिन-दिन चित्तमें उत्साह- बढ़ेगा और अहितकी हानि होगी' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, फिर वाल्मीकिजीने पाप और तापको दूर करनेवाली बहुत-सी सरस और पुरानी कथाएँ कहकर सीताजीको सान्त्वना दी । इससे उनकी भारी ग्लानि दूर हो गयी ॥ ५ ॥

[ ३३ ] जबतें जानकी रही रुचिर आश्रम आइ । गगन, जल, थल बिमल तबतें, मंगलदाइ ॥ १ ॥ निरस भूरुह सरस फूलत, फलत अति अधिकाइ । कंद-मूल अनेक अंकुर स्वाद सुधा लजाइ ॥ २ ॥ मलय मरुत, मराल-मधुकर-मोर-पिक-समुदाइ । मुदित-मन मृग-बिहग बिहरत बिषम बैर बिहाइ ॥ ३ ॥

गीतावली ४३८ रहत रबि अनुकूल दिन, ससि रजनि सजनि सुहाइ । सीय सुनि सादर सराहति सखिन्ह भलो मनाइ ॥ ४ ॥ मोद बिपिन बिनोद चितवत लेत चितहि चोराइ । राम बिनु सिय सुखद बन, तुलसी कहै किमि गाइ ॥ ५ ॥ जबसे जानकीजीने उस सुन्दर आश्रममें आकर निवास किया है तबसे आकाश, जल और पृथ्वी—सभी निर्मल और सब प्रकारके मङ्गल देनेवाले हो गये हैं ॥ १ ॥ नीरस वृक्षोंमें भी बहुत अधिकता- से सरस फूल-फल लगने लगे हैं तथा अनेकों प्रकारके कन्द, मूल और अंकुर अपने स्वादसे अमृतको लज्जित करते हैं ॥ २ ॥ मलयवायु, हंस, भ्रमर, मयूर और कोकिलोंके समूह तथा प्रसन्नचित्त मृग और पक्षी आपसका विषम वैर त्यागकर बिहार करते रहते हैं ॥ ३ ॥ दिनमें सूर्य अनुकूल रहता है और रात्रिमें चन्द्रमा स्त्रियोंको प्रिय जान पड़ता है, सखियोंसे ऐसी बातें सुनकर सीताजी प्रसन्न होकर आदरपूर्वक उनकी सराहना करती हैं ॥ ४ ॥ वनमें ऐसा आनन्द- मङ्गल है कि देखते ही चित्तको चुरा लेता है; परंतु रामचन्द्रजीके बिना सीताजीको वन सुखदायक है—इसे तुलसीदास किस प्रकार गाकर कह सकता है ? ॥ ५ ॥ लव-कुश-जन्म [ ३४ ] सुभ दिन, सुभ घरी, नीको नखत, लगन सुहाइ । पूत जाये जानकी द्वै, मुनिबधू उठीं गाइ ॥ १ ॥ हरषि बरषत सुमन सुर गहगहे बधाए बजाइ । भुवन, कानन, आश्रमनि रहे मोद-मंगल छाइ ॥ २ ॥

४३६ उत्तरकाण्ड तेहि निसा तहँ सत्रुसूदन रहे बिधिबस आइ। माँगि मुनिसों बिदा गवने भोर सो सुख पाइ ॥ ३ ॥ मातु मौसी-बहिनिहूतें सासुतें अधिकाइ। करहिं तापस-तीय-तनया सीय-हित चित लाइ ॥ ४ ॥ किए बिधि-व्यवहार मुनिबर बिप्रवृन्द बोलाइ। कहत सब रिषिकृपाको फल भयो आजु अघाइ ॥ ५ ॥ सुरुष ऋषि, सुख सुतनिको, सिय-सुखद सकल सहाइ। सूल राम-सनेहको तुलसी न जियतें जाइ ॥ ६ ॥ जानकीजीने शुभ दिन, शुभ घड़ी, शुभ नक्षत्र और शुभ लग्नमें दो बालकोंको जन्म दिया। उस समय मुनि-पत्नियां गान करने लगीं ॥ १ ॥ देवतालोग प्रसन्न होकर गहगहे बाजे बजाते हुए फूलोंकी वर्षा करने लगे तथा सम्पूर्ण लोक, वन और आश्रमोंमें आनन्दमंगल छा गये ॥ २ ॥ उस रात्रिको दैवयोगसे वहाँ शत्रुघ्न- जी आकर टिक गये। यह सुख पाकर वे प्रातःकाल ही मुनिसे बिदा मांगकर चले गये ॥ ३ ॥ मुनियोंकी स्त्रियाँ और कन्याएँ सीताजीकी माता, मौसी, सासु और बहिनोंसे भी बढ़कर बहुत मन लगाकर सेवा करती थीं ॥ ४ ॥ मुनिवर वाल्मीकिजीने ब्राह्मणोंको बुलाकर सब प्रकारके विधि और व्यवहार किये। सब लोग यही कहते हैं कि आज ऋषिकृपाका पूरा-पूरा फल हुआ है ॥ ५ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, सीताजीको ऋषिकी अनुकूलता और पुत्र-सुख आदि तो सभी सुखदायक और सहायक हो रहे हैं, किंतु उनके हृदयसे भगवान् रामके स्नेहका शूल नहीं निकलता ॥ ६ ॥