गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३१ उत्तरकाण्ड राम-सीय-सनेहु बरनत अगम कबि सकाहिं । रामसीय-रहस्य तुलसी कहत राम-कृपाहिं ॥ ४ ॥ अन्तमें रामचन्द्रजीने बहुत सोच-विचारकर मन-ही-मन उन्हें त्याग देना निश्चित कर लिया। अब परम कृपालु रघुनाथजीके सभी क्षण लौकिक-वैदिक स्नेहका पालन करनेमें बीतने लगे ॥ १ ॥ 'सीताजी मुझे परम प्रिय हैं, उनके अलौकिक पातिव्रतको देखकर पार्वती और लक्ष्मीजी भी ईर्ष्या करती हैं, इस समय वे गर्भवती हैं तथा परम सुकुमारी नारीरत्न हैं' यह विचारकर प्रभु उन्हें त्यागनेमें सकुचाते हैं ॥ २ ॥ 'सीताजी मेरे ही सुखमें सुखी रहती हैं, इन्हें अपने सुखका स्वप्नमें भी ध्यान नहीं है' इस प्रकार अपनी गुणखानि गृहिणीके गुणोंको याद कर-करके वे सोचमें डूब जाते हैं ॥ ३ ॥ श्रीराम और सीताजीके अगम स्नेहका वर्णन करनेमें बड़े-बड़े कवि भी शङ्कित हो जाते हैं। तुलसीदास तो श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे ही राम और सीताके गूढ़ रहस्यका वर्णन करता है ॥ ४ ॥ - [ २७ ] चरचा चरनिसों चरती जानमनि रघुराइ । दूत-मुख सुनि लोक-धुनि घर घरनि बूझी आइ ॥ १ ॥ प्रिया निज अभिलाष रुचिकहि कहति सिय सकुचाइ । तीये-तनयसमेत तापस पूजिहौं बन जाइ ॥ २ ॥ जानि करुनासिंधु भाबी-बिबस सकल सहाइ । धीर धरि रघुबीर भोरहि लिए लषन बोलाइ ॥ ३ ॥ 'तात तुरतहि साज स्यंदन सीय लेहु चढ़ाइ । बालमीकि मुनीस आश्रम आइयहु पहुँचाइ ॥ ४ ॥