भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 438

गीतावली ४३२ 'भलेहि नाथ,' सुहाथ माथे राखि राम-रजाइ । चले तुलसी पालि सेवक-धरम अवधि अघाइ ॥ ५ ॥ चतुरशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीने अपने चरोंसे गुप्त समाचारकी बातें कीं । दूतोंके मुखसे लोकमतको जानकर अपने महलमें आ श्रीसीताजीसे पूछा—॥ १ ॥ 'प्राणप्रिये ! तुम अपनी अभीष्ट रुचि बतलाओ ।' तब सीताजीने सकुचाकर कहा—'मैं वनमें जाकर स्त्री और बालकोंके सहित तपस्वियोंका पूजन करना चाहती हूँ' ॥ २ ॥ तब करुणासागर भगवान् रामने होनहारके वश सारी सहायता उपस्थित देख, धैर्य धारणकर सवेरा होते ही लक्ष्मीजीको बुलाया ॥ ३ ॥ और कहा—'भैया ! तुम इसी समय रथ सजाकर उसपर सीताजीको बिठा वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर पहुँचा आओ' ॥ ४ ॥ तब 'प्रभो ! बहुत अच्छा' इस प्रकार कह अपने हाथोंको माथेपर रखा (दुःख किया) और भगवान् रामकी आज्ञा शिरोधार्य की । वे सेवकधर्मका पूर्णतया पालन करते हुए वहाँसे चल दिये ॥ ५ ॥ [ २८ ] आइ लषन लै सौंपी सिय मुनीसहि आनि । नाइ सिर रहे पाइ आसिष जोरि पंकजपानि ॥ १ ॥ बालमीकि बिलोकि ब्याकुल लषन गरत गलानि । सरबबिद बूझत न, बिधिकी बामता पहिचानि ॥ २ ॥ जानि जिय अनुमानही सिय सहस बिधि सनमानि । राम सदगुन-धाम, परमिति भई कछुक मलानि ॥ ३ ॥ दीनबंधु दयालु देवर देखि अति अकुलानि । कहति बचन उदास तुलसीदास त्रिभुवन-रानि ॥ ४ ॥