गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४२६ बाजहिं मृदंग,डफ,ताल,बेनु । छिरकैं सुगंधभरे मलय-रेनु ॥ ३ ॥ उत जुवति-जूथ जानकी संग । पहिरे पट भूषन सरस रंग ॥ ४ ॥ लिये छरी बेंत सोंधैंविभाग । चांचरि झूमक कहैं सरस राग ॥ ५ ॥ नूपुर-किंकिनि-धुनि अति सोहाइ । ललना-गन जब जेहि धरइँधाइ ॥६ लोचन आँजहि फगुआ मनाइ । छाड़हिं नचाइ, हाहा कराइ ॥७॥ चढ़े खरनि बिदूषक-स्वाँग साजि । करें कूटि, निपट गइ लाज भाजि॥८॥ नर-नारि परस्पर गारि देत । सुनि हँसत रामभाइन समेत॥९॥ बरषत प्रसून बर-बिबुध-वृंद । जय-जय दिनकर-कुल-कुमुदचंद १० ब्रह्मादि प्रसंसत अवध बास । गावत कलकीरति तुलसिदास ॥११॥ राजाधिराज भगवान् राम फाग खेल रहे हैं, आकाशमें देवता लोग यह कौतुक देख रहे हैं ॥ १ ॥ रघुनाथजीके साथ उनके सखा और छोटे भाई शोभायमान हैं। उनकी झोलियोंमें अबीर है और हाथोंमें पिचकारियाँ ॥ २ ॥ इस समय मृदंग, डफ, करताल और बाँसुरी आदि बाजे बज रहे हैं तथा चन्दनकी रजसे मिला हुआ सुगन्धित जल छिटका जा रहा है ॥ ३ ॥ उधर जानकीजीके साथ रंगबिरंगे वस्त्र और आभूषण पहने युवतियोंका झुंड हाथमें बेंतकी छड़ी लिये रास्ता खोजता है और अत्यन्त सरस चाँचर और झूमक राग गा रहा है ॥ ४-५ ॥ जब वे स्त्रियाँ दौड़कर किसीको पकड़ती हैं तो उनके नूपुर और करधनीकी ध्वनि बड़ी ही मनोहर जान पड़ती है ॥ ३ ॥ वे जिसे पकड़ती हैं, उसके नेत्रोंमें अञ्जन लगा देती हैं तथा उससे फगुआ मनाकर और नाच नचाकर बहुत प्रार्थना करने- पर छोड़ती हैं ॥ ७ ॥ बहुत-से लोग मसखरेका स्वाँग रचकर गधों- पर चढ़े हुए हैं। वे तरह-तरहकी कूटोक्तियाँ बोलते हैं, इस