गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२५ उत्तरकाण्ड झांझ, डफ, ढोल और दुन्दुभी आदि बाजे बजाते हैं तथा सुन्दर और सरस शहनाइयोंपर समयानुकूल गाना गाते हैं ॥ १७ ॥ वीणा और बाँसुरीकी सुमधुर ध्वनि सुनकर किन्नर और-गन्धर्वगण अपने बड़े गुणको भी, अभिमान छोड़कर मन-ही-मन अत्यन्त तुच्छ मानने लगते हैं ॥ १८ ॥ कोकिलभाषिणी कामिनियाँ अपनी-अपनी अटारियोंपर चढ़कर मनोहर गान कर रही हैं, मानो हिमालयके शिखरोंपर सुर-सुन्दरियाँ विराजमान हों ॥ १९ ॥ जहाँ-तहाँ अपने अपने उज्ज्वल भवनोंसे स्त्रियोंके झुण्ड निकलते हैं, मानो बहुत-सी अप्सराएँ मिलकर समुद्र-मन्थन कर रही हों ॥ २० ॥ वे सुन्दरता और आनन्दसहित बसन्ती साड़ी ओढ़े ऐसी जान पड़ती हैं, मानो चन्द्रमाओंके समूह बिजलियोंके घरोंमें बसे हुए हों ॥ २१ ॥ वे सुचतुर सुन्दरी स्त्रियाँ अबीर घोलकर कुंकुमोंमें भरती हैं तथा ऋतुके स्वभावानुसार तरह-तरहकी पवित्र और सुन्दर गालियाँ देती हैं॥२२॥ जो सुख, योग, यज्ञ, जप और तीर्थ आदिसे परे है वही श्रीरामचन्द्रजी की कृपासे अयोध्याकी गलियोंमें भरा हुआ है ॥ २३ ॥ इस प्रकार फाग खेलनेके अनन्तर भगवान्ने सरयू नदीके जलमें स्नान किया। तदनन्तर याचकोंको तरह-तरहके वस्त्र और आभूषण प्राप्त हुए ॥२४॥ उसी समय तुलसीदासने प्रभुकी अनुपम भक्ति माँगी, तब श्रीरघुनाथ- जीने मृदुल मुसकान करते हुए कृपादृष्टिपूर्वक वह दे दी ॥ २५ ॥ राग बसंत [ २२ ] खेलत बसंत राजाधिराज । देखत नभ कौतुक सुर-समाज ॥१॥ सोहैं सखा-अनुज रघुनाथ साथ । झोलिन्ह अबीर, पिचकारि हाथ२