भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 430

गीतावली ४२४ मनोहर पंक्तियाँ हो ॥ ८ ॥ भगवान्‌की शंखके समान सुन्दर ग्रीवा है तथा उनकी स्थूल और लंबी-लंबी भुजाओंमें अपार बल है। प्रभु मनोहर कंकण और हार धारण किये हुए हैं तथा उनके वक्षःस्थलमें वनमाला विराज रही है ॥९॥ भगवान् ब्राह्मणप्रिय और पवित्रचरित्र हैं। उनके वक्षःस्थलमें भृगुजीके चरणका चिह्न सुशोभित है, वे गुण और इन्द्रियोंसे अतीत देवश्रेष्ठ अपने भक्तोंके लिये ही मनुष्यशरीर धारण करते हैं ॥ १० ॥ प्रभुके उदरदेशमें मनोहर त्रिवली और अति सुन्दर गम्भीर नाभि है। उनके कटिप्रदेशमें सोनेकी बनी हुई मणिजटित करधनी मनोहर शब्द कर रही है ॥ ११ ॥ उनके जंघा और जानु मरकतमणि खंभोंके समान स्थूल और मृदुल (चिकने) हैं तथा सुमधुर ध्वनि करते हुए नूपुर मुनियोंके मन मोह लेते हैं ॥१२॥ प्रभुके चरण-कमल अरुणवर्ण हैं, उनके नखोंकी कान्ति चन्द्रमा- के प्रकाशके समान है तथा वे श्रीजनकनन्दनीके पाणिपल्लवोंद्वारा बड़ी बिलासितासे ललित हो रहे हैं ॥ १३ ॥ उन चरणोंमें जो कमल, वज्र, ध्वजा और अंकुशकी चार शुभ रेखाएँ हैं, वे मानो भक्तोंके मनरूप मत्स्योंको पकड़नेके लिये सँवाकर बनायी हुई बंसी (मछली पकड़नेका काँटा) ही हैं ॥ १४ ॥ इस प्रकार प्रभुके अङ्ग-अङ्गकी अतुलित शोभा है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। मन इस सुखमें मग्न हो जानेपर फिर दूसरी जगह नहीं फँसता ॥ १५ ॥ जिस समय अयोध्यापति भगवान् राम अपने छोटे भाई और सखाओंके साथ फाग खेलते हैं, उस समय देवतालोग फूलों- की वर्षा करते हुए उनका अनन्त कामदेवोंके समान शोभा निहारते हैं ॥ १६ ॥ उस समय [नगरनिवासी] करताल, मृदंग