भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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४२३ उत्तरकाण्ड तुलसिदास तेहि अवसर मांगी भगति अनूप । मृदु मुसुकाइ दीन्हि तब कृपादृष्टि रघुभूप ॥ २५ ॥ श्रेष्ठ नदी सरयूके तटपर बसा हुआ अयोध्या नगर बड़ा ही सुन्दर है। वहाँके सभी स्त्री-पुरुष नीति-निपुण, धर्मधुरन्धर और धैर्यशाली हैं॥ १॥ यों तो वह नगर जहाँ नृपतिशिरोमणि जानकीनाथ भगवान् राम निवास करते हैं, सभी ऋतुओंमें सुखदायक है, किन्तु बसन्त ऋतुमें उसकी शोभा अधिक बढ़ जाती है ॥ २ ॥ वहाँके वन और उपवनोंमें नवीन पत्ते और कई रंगके पुष्प खिले हुए हैं, चहचहाते हुए पक्षी और सुन्दर कोकिल सुमधुर बोली बोल रहे हैं तथा भौंरे गूंज रहे हैं ॥३॥ कृपानिधान भगवान् रामने अनुकूल समय समझकर और द्वारपर बहुत भीड़ लगी देखकर हँसते हुए कहा, 'सब स्त्री-पुरुष प्रसन्नतापूर्वक होली खेलो' ॥ ४ ॥ यह सुनकर नगरके सब नर नारी प्रसन्न होकर फाग खेलने चले । उस समय महाराज रामकी अनुपम छबि देखकर उनके हृदयमें अपार प्रेम उमड़ने लगा ॥ ५ ॥ भगवान् रामका शरीर श्याम-तमाल अथवा श्माम मेघके समान शोभायमान है। उसपर अति निर्मल पीताम्बर है। उनके नेत्र अरुण कमलदलके समान हैं और वे सदा ही अपने सेवकोंपर कृपादृष्टि रखते हैं ॥ ६ ॥ प्रभुके सिरपर किरीट, कानोंमें कुण्डल और मनोहर मस्तकपर तिलक सुशोभित है । उनकी अलकावली कुञ्चित, भ्रुकुटि बाँकी और चितवन भक्तोंपर कृपाकरने- वाली है ॥ ७ ॥ उनके कपोल बड़े सुन्दर हैं, नासिका तोतेकी चोंचके समान है तथा मनोहर ओठोंके बीचमें दाँतोंकी ज्योति इस प्रकार जगमगा रही है, मानो अरुण-कमलके बीचमें गजमुक्ताओंकी दो