भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 428

गीतावली ४२२ उरु अरु जानु पीन, मृदु, मरकत खंभ समान। नूपुर मुनि-मन मोहत, करत सुकोमल गान ॥१२॥ अरुनबरन पदपंकज, नखदुति इंदु-प्रकास। जनक-सुता-करपल्लव-लालित बिपुल बिलास ॥१३॥ कंजकुलिस-धुज-अंकुस-रेख चरन सुभ चारि। जन-मन-मीन हरन कहँ बंसी रची सँवारि ॥१४॥ अंग अंग प्रति अतुलित सुषमा बरनि न जाइ। एहि सुख मगन होइ मन फिरि नहि अनत लोभाइ ॥१५॥ खेलत फागु, अवधपति, अनुज-सखा सब संग। बरषि सुमन सुर निरखहिं सोभा अमित अनंग ॥१६॥ ताल, मृदंग झाँझ, डफ बाजहिं पनव-निसान। सुघर सरल सहनाइन्ह गावहिं समय समान ॥१७॥ बीना-बेनु-मधुर-धुनि सुनि किंनर-गन्धर्ब। निज-गुन गरुअ ह्रदय अति मानहिं मन तजि गर्ब ॥१८॥ निज निज अटनि मनोहर गान करहिं पिकबैनि। मनहुँ हिमालय-सिखरनि लसहिं अमर-मृगनैनि ॥१९॥ धवल धामतें निकसहिं जहँ तहँ नारि-बरूथ। मानहुँ मथत पयोनिधि बिपुल अपसरा-जूथ ॥२०॥ किसुकबरन सुअंगक सुषमा सुखनि समेत। जनु बिधु-निबह रहे करि दामिनि-निकर निकेत ॥२१॥ कुंकुम सुरस अबीरनि भरहिं चतुर बर नारि। रितु सुभाय सुठि सोभित देहिं बिबिध बिधि गारि ॥२२॥ जो सुख जोग, जाग, जप, अरु तीरथतें दूरि। राम-कृपाते सोइ सुख अवध गलिन्ह रह्यो पूरि ॥२३॥ खेलि बसंत कियो प्रभु मज्जन सरजूनीर। बिबिध भाँति जाचक जन पाए भूषन चीर ॥२४॥