भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 433

४२७ उत्तरकाण्ड समय उनकी लज्जा बिल्कुल चली गयी है ॥ ८ ॥ स्त्री-पुरुष आपसमें गालियाँ देते हैं, उन्हें सुन-सुनकर श्रीरामचन्द्रजी भाइयोंके सहित हँसते हैं ॥ ९ ॥ 'सूर्यकुल-कुमुदकलाधर भगवान् रामकी जय हो, जय हों' ऐसा कहते हुए देवतालोग फूलोंकी वर्षा कर रहे हैं ॥ १० ॥ अयोध्याके निवासकी ब्रह्मादिक भी प्रशंसा कर रहे हैं। तुलसीदास भी प्रभुकी पवित्र कीर्तिका गान करता है ॥ ११ ॥ अयोध्या का आनन्द राग केदारा [ २३ ] देखत अवधको आनन्द । हरषि बरषत सुमन दिन दिन देवतनिको वृंद ॥ १ ॥ नगर-रचना सिखनको विधि तकत बहु बिधि-वृंद । निपट लागत अगम, ज्यों जलचरहि गमन सुछंद ॥ २ ॥ मुदित सुरलोगनि सराहत निरखि सुषमाकंद । जिन्हके सुअलि-चख पियत राम-मुखारबिंद-मरंद ॥ ३ ॥ मध्य ब्योम बिलंबि चलत दिनेस-उडुगन-चंद । रामपुरी बिलोकि तुलसी मिटत सब दुख-द्वंद ॥ ४ ॥ अयोध्याका आनन्द देखकर देवतालोग हृदयमें हर्षित हो नित्य- प्रति फूलोंकी वर्षा करते हैं ॥ १ ॥ नगरकी रचना सीखनेके लिये ब्रह्माजी उसके तरह-तरहके भेद देखते हैं, परन्तु उन्हें यह इस प्रकार अत्यन्त दुर्गम जान पड़ती है जैसे जलचरको पृथ्वीपर स्वच्छन्द विचरना* ॥ २ ॥ जिनके नेत्ररूप भौंरे सुषमाकन्द भगवान् *क्योंकि ब्रह्माजी मायिक सृष्टिके अधिकारी हैं और यह दिव्य रचना है ।