गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४२८ रामको निहारकर उनके मुखकमलका मकरन्द पान करते हैं, उन अयोध्यावासियोंकी वे प्रसन्नतापूर्वक सराहना करते हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भगवान् रामकी पुरीको देखनेसे सारे दुःख और द्वन्द्व नष्ट हो जाते हैं, अतः सूर्य, तारे और चन्द्रमाभी उसे देखनेके लिये] मध्य आकाशमें कुछ ठहरकर चलते हैं ॥ ४ ॥ रामराज्य राग सोरठ [ २४ ] पालत राज यों राजीं राम धरमधुरींन । सावधान, सुजान, सब दिन रहत नय-लयलीन ॥ १ ॥ स्वान-खग-जति-न्याउ देख्यो आपु बैठि प्रबीन । नीचु हति महिदेव-बालक कियो मीचुबिहीन ॥ २ ॥ भरत ज्यों अनुकूल जग निरुपाधि नेह नवीन । सकल चाहत रामही, ज्यों जल अगाधहि मीन ॥ ३ ॥ गाइ राज-समाज जांचत बास तुलसी दीन । लेहु निज करि देहु निज-पद-प्रेमपावन पीन ॥ ४ ॥ इस प्रकार धर्मधुरन्धर महाराज राम अपने राज्यका पालन करते हैं । वे परम सुजान सर्वदा सावधान रहकर नीतिमें तत्पर रहते हैं ॥ १ ॥ प्रवीण रामचन्द्रजीने श्वान, पक्षी और यतिका न्याय स्वयं बैठाकर देखा तथा शूद्रको मारकर ब्राह्मणके बालकको जीवन दान दिया ॥ २ ॥ भरतजीके समान सारा संसार ही भगवान्से अहैतुक और नित्यनूतन प्रेम करता था। मछली जिस प्रकार अगाध जलको ही चाहती है उसी प्रकार सभी लोग रामचन्द्रजीको ही चाहते