गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२६ बालकाण्ड थे ॥ ३ ॥ भगवान्के राजसमाजका वर्णन करके दीन तुलसीदास भी यही माँगता है कि मुझे अपनाकर अपने चरणोंका परम पवित्र और सुदृढ़ प्रेम दीजिये ॥ ४ ॥ सीता-बनवास [ २४ ] संकट सुकृतको सोचत जानि जिय रघुराउ । सहस द्वादस पंचसतमें कछुक है अब आउ ॥ १ ॥ भोग पुनि पितु-आयुको, सोउ किए बनै बनाउ । परिहरे बिनु जानकी नहि और अनघ उपाउ ॥ २ ॥ पालिबे असिधार-ब्रत, प्रिय प्रेम-पाल सुभाउ । होइ हित केहि भांति, नित सुबिचारु, नहि चित चाउ ॥ ३ ॥ निपट असमंजसहु बिलसति मुख मनोहरताउ । परम धीर-धुर्रीन हृदय किं हरष-बिसमय काउ ? ॥ ४ ॥ अनुज-सेवक-सचिव हैं सब सुमति, साध सखाउ । जान कोउ न जानकी बिनु अगम अलख लखाउ ॥ ५ ॥ राम जोगवत सीय-मनु, प्रिय-मनहि प्रानप्रियाउ । परम पावन प्रेम-परमिति समुझि तुलसी गाउ ॥ ६ ॥ एक समय श्रीरघुनाथजी धर्मसंकट उपस्थित होनेपर मन-ही- मन इस प्रकार सोचने लगे—‘अब मेरी बारह हजार पाँच सौ वर्षकी आयुमें कुछ ही और शेष है ॥ १ ॥ उसके पश्चात् पिताकी आयुका भोग है, और उसे भोगनेसे ही काम चलेगा; किन्तु उसे भोगनेके लिये सीताजीको त्यागे बिना और कोई निर्दोष उपाय नहीं