गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३५ उत्तरकाण्ड इधर तो उन्हें सीताजीके प्रेमका आकर्षण था और उधर भगवान् रामकी आज्ञाका विचार था। अन्तमें वे चुपचाप ही सीताजीके चरण छू उनसे आशीर्वाद और शिक्षा ग्रहणकर वहांसे चल दिये ॥ ३ ॥ [ वे सोचने लगे— ] 'मैंने अपने प्रेमनिधि पिताजीको भरपेट कठोर बचन कहे थे*। उस पापके कारण ही आज यह उचित दुःख सहन करना पड़ा जो संहकर ही चुकेगा' ॥ ४ ॥ [ ३१ ] गौने मौनहो बारहि बार परि परि पाय। जात जनु रथ चीर कर लछिमन मगन पछिताय ॥ १ ॥ असन बिनु बन, बरन बिनु रन, बच्यो कठिन कुघाय। दुवह साँसति सहनको हनुमान ज्यायो जाय ॥ २ ॥ हेतु हौ सियहरनको तब, अबहु भयो सहाय। होत हठि मोहि दाहिनो दिन दैव दारुन दाय ॥ ३ ॥ तज्यो तनु संग्राम जेहि लगि गीध जसो जटाय। ताहि हौं पहुँचाइ कानन चल्यों अवध सुझाय ॥ ४ ॥ घोरहृदय कठोर करतव सृज्यो हौं बिधि बायें। दास तुलसी जानि राख्यो कृपानिधि रघुराय ॥ ५ ॥ फिर बारंबार चरणोंमें गिर लक्ष्मणजी चुपचाप ही चल दिये। वे पश्चात्तापमें ऐसे डूबे हुए थे मानो रथमें वस्त्रके पुतले ही हैं ॥ १ ॥ [ वे मन-ही-मन सोचते थे-- ] 'हाय ! मैं वनमें बिना भोजनके ही जीवित रहा, युद्धक्षेत्रमें कवच न रहनेपर भी कुछ न बिगड़ा; शक्ति लगते समय भी बच गया, उस समय इस दुःसह *लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा ॥ —रामचरितमानस