गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४३४ राजाओंके अनुकूल वचन क्या कहला भेजूं । मुझे विश्वास है कि [जिस प्रकार मेरे विरुद्ध बातें अयोध्यामें कही गयी हैं] उसी प्रकार इस बार कोई सज्जन पुरुष आकर मेरे अनुकूल बातें भी कहेगा ॥२॥ कृपामय लषणलाल ! तुम मुझे एकाएकी भूल मत जाना और राजधर्म ही समझकर सब तपस्विनियोंके समान मेरा भी पालन करते रहना' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, सीताजीके ये वचन सुनकर सब लोग नेत्रोंसे जल बरसाने लगे । [औरोंकी तो बात हो क्या,] वाल्मीकिजी भी उस स्नेहके कारण अपनेको न सँभाल सके ॥ ४ ॥
[ ३० ] सुनि ब्याकुल भए, उतरु कछु कह्यो न जाइ । जानि जिय बिधि बाम दीन्हों मोहि सरुष सजाइ ॥ १ ॥ कहत हित मेरी कठिनई लखि गई प्रीति लजाइ । आजु अवसर ऐसेहू जौं न चले प्रान बजाइ ॥ २ ॥ इतहि सीय-सनेह-संकट उतहि राम रजाइ । मौनही गहि चरन, गौने सिख-सुआसिष पाइ ॥ ३ ॥ प्रेम-निधि पितु को कहे मैं परुष बचन अघाइ । पाप तेहि परिताप तुलसी उचित सहे सिराइ ॥ ४ ॥
ये सब बातें सुनकर लक्ष्मणजी व्याकुल हो गये, उनसे कुछ भी उत्तर नहीं दिया गया; मनमें समझ लिया कि वाम विधाताने कुपित होकर मुझे सजा दी है ॥ १ ॥ वे मन-ही-मन कहने लगे—'अहो मेरी कठोरता देखकर प्रीति भी लज्जित हो गयी जो आज ऐसे अवसरपर भी मेरे प्राणोंने कूच नहीं किया' ॥ २ ॥