गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४३६ दुःखको सहन करनेके लिये मुझे हनूमान्जीने ओषधि लाकर व्यर्थ ही जीवित कर दिया ॥ २ ॥ मैं ही सीताहरणका कारण था और अब मैं ही उनके वनवासका हेतु हुआ । हे विधाता ! मेरा दाहिना दिन ( अनुकूल समय ) भी हट करके तेरा कठोर दाँव ही हो जाता है ! [ इसीसे भगवदाज्ञापालनरूप अनुकूल कर्म करते हुए भी मुझसे सीतावनवास-जैसा कठोर कर्म बन गया ] ॥ ३ ॥ अहो ! जिनके लिये यशस्वी जटायुने संग्रामभूमिमें अपना शरीर त्याग दिया उन्हीं सीताजीको मैं वनमें पहुँचाकर स्वभावतः अयोध्यापुरीको जा रहा हूँ ॥ ४ ॥ मालूम होता है, वाम विधाताने मुझे कठोर कर्तव्य करनेके लिये कुटिलहृदय ही रचा है और इस बातको कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजी जानते हैं [ इसीलिये ऐसे कठोर कार्योंके लिये वे मुझे ही आज्ञा दिया करते हैं ]' ॥ ५ ॥ [ ३२ ] पुत्रि ! न सोचिये आई हौ जनक-गृह जिय जानि । काल्हिको कल्यान-कौतुक, कु