गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३७ उत्तरकाण्ड
[ बाल्मीकिजी कहते हैं—] 'पुत्रि ! तू मनमें यह समझकर कि मैं अपने पिताके घर आयी हुई हूँ, किसी प्रकारका शोक न कर । कल्याणि ! तुझे कल ( शीघ्र ) ही आनन्द-मङ्गल प्राप्त होने- वाला है ॥ १ ॥ तेरे पिता और ससुर—दोनों ही राजर्षि हैं, साक्षात् भगवान् पति हैं और तू भी सम्पूर्ण मङ्गलोंकी खानि है—ऐसे स्थलमें भी विपरीत गति देखी जाती है, इससे मालूम होता है विधाताका स्वभाव बड़ा ही टेढ़ा है, ॥ २ ॥ फिर वाल्मीकिजीने प्रीतिकी गति जानकर सीताजीको बुलाया और उन्हें अपनी कन्या मानकर यह शिक्षा दी—'हे सीते ! तुम आलसियोंको शुभ गति देनेवाली गङ्गाजीकी मन लगाकर सेवा करना ॥ ३ ॥ प्रातःकाल ही स्नान करके इच्छित फल देनेवाले वटवृक्षका पूजन करना । हे देवि ! इससे तुम्हें पुत्रोंकी प्राप्ति होगी; दिन-दिन चित्तमें उत्साह- बढ़ेगा और अहितकी हानि होगी' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, फिर वाल्मीकिजीने पाप और तापको दूर करनेवाली बहुत-सी सरस और पुरानी कथाएँ कहकर सीताजीको सान्त्वना दी । इससे उनकी भारी ग्लानि दूर हो गयी ॥ ५ ॥
[ ३३ ] जबतें जानकी रही रुचिर आश्रम आइ । गगन, जल, थल बिमल तबतें, मंगलदाइ ॥ १ ॥ निरस भूरुह सरस फूलत, फलत अति अधिकाइ । कंद-मूल अनेक अंकुर स्वाद सुधा लजाइ ॥ २ ॥ मलय मरुत, मराल-मधुकर-मोर-पिक-समुदाइ । मुदित-मन मृग-बिहग बिहरत बिषम बैर बिहाइ ॥ ३ ॥