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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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गीतावली ४३८ रहत रबि अनुकूल दिन, ससि रजनि सजनि सुहाइ । सीय सुनि सादर सराहति सखिन्ह भलो मनाइ ॥ ४ ॥ मोद बिपिन बिनोद चितवत लेत चितहि चोराइ । राम बिनु सिय सुखद बन, तुलसी कहै किमि गाइ ॥ ५ ॥ जबसे जानकीजीने उस सुन्दर आश्रममें आकर निवास किया है तबसे आकाश, जल और पृथ्वी—सभी निर्मल और सब प्रकारके मङ्गल देनेवाले हो गये हैं ॥ १ ॥ नीरस वृक्षोंमें भी बहुत अधिकता- से सरस फूल-फल लगने लगे हैं तथा अनेकों प्रकारके कन्द, मूल और अंकुर अपने स्वादसे अमृतको लज्जित करते हैं ॥ २ ॥ मलयवायु, हंस, भ्रमर, मयूर और कोकिलोंके समूह तथा प्रसन्नचित्त मृग और पक्षी आपसका विषम वैर त्यागकर बिहार करते रहते हैं ॥ ३ ॥ दिनमें सूर्य अनुकूल रहता है और रात्रिमें चन्द्रमा स्त्रियोंको प्रिय जान पड़ता है, सखियोंसे ऐसी बातें सुनकर सीताजी प्रसन्न होकर आदरपूर्वक उनकी सराहना करती हैं ॥ ४ ॥ वनमें ऐसा आनन्द- मङ्गल है कि देखते ही चित्तको चुरा लेता है; परंतु रामचन्द्रजीके बिना सीताजीको वन सुखदायक है—इसे तुलसीदास किस प्रकार गाकर कह सकता है ? ॥ ५ ॥ लव-कुश-जन्म [ ३४ ] सुभ दिन, सुभ घरी, नीको नखत, लगन सुहाइ । पूत जाये जानकी द्वै, मुनिबधू उठीं गाइ ॥ १ ॥ हरषि बरषत सुमन सुर गहगहे बधाए बजाइ । भुवन, कानन, आश्रमनि रहे मोद-मंगल छाइ ॥ २ ॥

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