गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३६ उत्तरकाण्ड तेहि निसा तहँ सत्रुसूदन रहे बिधिबस आइ। माँगि मुनिसों बिदा गवने भोर सो सुख पाइ ॥ ३ ॥ मातु मौसी-बहिनिहूतें सासुतें अधिकाइ। करहिं तापस-तीय-तनया सीय-हित चित लाइ ॥ ४ ॥ किए बिधि-व्यवहार मुनिबर बिप्रवृन्द बोलाइ। कहत सब रिषिकृपाको फल भयो आजु अघाइ ॥ ५ ॥ सुरुष ऋषि, सुख सुतनिको, सिय-सुखद सकल सहाइ। सूल राम-सनेहको तुलसी न जियतें जाइ ॥ ६ ॥ जानकीजीने शुभ दिन, शुभ घड़ी, शुभ नक्षत्र और शुभ लग्नमें दो बालकोंको जन्म दिया। उस समय मुनि-पत्नियां गान करने लगीं ॥ १ ॥ देवतालोग प्रसन्न होकर गहगहे बाजे बजाते हुए फूलोंकी वर्षा करने लगे तथा सम्पूर्ण लोक, वन और आश्रमोंमें आनन्दमंगल छा गये ॥ २ ॥ उस रात्रिको दैवयोगसे वहाँ शत्रुघ्न- जी आकर टिक गये। यह सुख पाकर वे प्रातःकाल ही मुनिसे बिदा मांगकर चले गये ॥ ३ ॥ मुनियोंकी स्त्रियाँ और कन्याएँ सीताजीकी माता, मौसी, सासु और बहिनोंसे भी बढ़कर बहुत मन लगाकर सेवा करती थीं ॥ ४ ॥ मुनिवर वाल्मीकिजीने ब्राह्मणोंको बुलाकर सब प्रकारके विधि और व्यवहार किये। सब लोग यही कहते हैं कि आज ऋषिकृपाका पूरा-पूरा फल हुआ है ॥ ५ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, सीताजीको ऋषिकी अनुकूलता और पुत्र-सुख आदि तो सभी सुखदायक और सहायक हो रहे हैं, किंतु उनके हृदयसे भगवान् रामके स्नेहका शूल नहीं निकलता ॥ ६ ॥