गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
गीतावली ४०० श्रवन सुंदर, सम कुंडल कल जुगम, तुलसिदास अनूप, उपमा कही न जाई। मानो मरकत सीप सुंदर ससि समीप कनक करजुत बिधि बिरची बनाई ॥ ३ ॥ आज रघुनाथजीका मुख देखनेसे आनन्द होता है। कारण कि वह सेवकोंपर सुरुख अर्थात् अनुकूल हैं; शरच्चन्द्र भी उस शोभाको देखकर सिहाता है। उनके ओठ लाल-लाल हैं तथा विशद मुसकान बड़ी ही मधुर है। मानो हासरूप चन्द्रमाकी किरणोंको होंठरूप कमलोंने मनाकर रख लिया है ॥ १ ॥ प्रभुके अरुणवर्ण एवं विशालनेत्र, मनोहर भ्रूकुटि, ललाटपरका तिलक मनोहर कपोल, चिबुक और नासिका बड़ी ही सुन्दर हैं। उनकी कुटिल अलकें बिखरी हुई हैं, मानो मधुके लालचसे दो कमलोंके ऊपर भौंरे लुभा- कर रह गये हों ॥ २ ॥ उनके सुन्दर कानोंमें एक-से मनोहर कुण्डलोंकी जोड़ी है। तुलसीदासजी कहते हैं, वे तो अनुपम हैं, उनकी उपमा कही नहीं जाती, मानो विधाताने [मुखरूप] सुन्दर चन्द्रमाके समीप [कुण्डलरूप] सुवर्णकी मछलियोंके सहित [कर्णरूप] मरकतमणिकी सीपियोंको रचकर बनाया हो ॥ ३ ॥ राग भैरव [१९] प्रातकाल रघुबीर-बदन-छबि चितै, चतुर चित मेरे। होंहिं बिबेक बिलोचन निरमल सुफल सुसीतल तेरे ॥ १ ॥ भाल बिसाल बिकट भ्रुकुटी बिच तिलक-रेख रुचि राजै। मनहुँ मदन तन तकि मरकत-धनु जुगुल कनक सर साजै ॥ २ ॥
४०१ उत्तरकाण्ड रुचिर पलक लोचन जुग तारक स्याम, अरुन सित कोए । जनु अलि नलिन-कोस महँ बंधुक-सुमन सेज सजि सोए ॥ ३ ॥ बिलुलित ललित कपोलनिपर कच मेचक कुटिल सुहाए । मनो बिधुमहँ बनरुह बिलोकि अलि विपुल सकौतुक आए ॥ ४ ॥ सोभित श्रवन कनक-कुंडल कल लंबित बिबि भुजमूले । मनहुँ केकि तकि गहन चहत जुग उरग इंदु प्रतिकूले ॥ ५ ॥ अधर अरुनतर, दसन-पांति बर, मधुर मनोहर हासा । मनहुँ सोन सरसिज महँ कुलिसनि तड़ित सहित कृत बासा ॥ ६ ॥ चारु चिबुक, सुकतुंड बिनिंदक सुभग सुउन्नत नासा । तुलसिदास छबिधाम राममुख सुखद, समन भवत्रासा ॥ ७ ॥ ऐ मेरे चतुर चित्त ! तू प्रातःकाल होते ही रघुनाथजीके मुख- की शोभा निहारा कर । इससे तेरे विवेकरूप नेत्र निर्मल, सफल और शीतल हो जायेंगे ॥ १ ॥ भगवान्के विशाल भालपर बांकी भ्रुकुटियां हैं और उनके बीचमें तिलककी मनोहर रेखा विराजमान है, मानों कामदेवने [अलकावलीरूप] अन्धकारको ताककर [भ्रुकुटियुगलरूप] मरकतमणिके धनुषपर [तिलकरूप] दो सुवर्ण- मय-बाण चढ़ाये हों ॥ २ ॥ सुन्दर पलकयुक्त नेत्रोंमें दो श्यामवर्ण तारे तथा श्वेत रक्तवर्ण कोये हैं, मानो कमलकोषमें मुंदे हुए दो भौंरे बन्धूकपुष्पकी शय्या बनाकर उसपर शयन कर रहे हों ॥ ३ ॥ प्रभुके मनोहर कपोलोंपर लटकती हुई काली और घुंघराली अलकें ऐसी शोभायमान हैं, मानो [मुखरूप] चन्द्रमामें [नेत्ररूप] कमलकुसुम देखकर कुतूहलवश बहुत से भौंरे इकट्ठे हो गये हों ॥४॥ भगवान्के कानोंमें दोनों भुजाओंके मूलभागतक लटकते हुए सुवर्णके गी० २६—
गीतावली ४०२ कुण्डल सुशोभित हैं, मानो [मुखरूप] चन्द्रमाके प्रतिकूल हुए [भुजारूप] दो सर्पोंको देखकर उन्हें [कुण्डलरूप] दो मयूर पकड़ना चाहते हैं ॥ ५ ॥ भगवान्के अधर खूब लाल-लाल हैं, दन्तावली बड़ी सुन्दर है तथा हास्य बड़ा मधुर और मनोहर है, मानो किसी सोनेके कमलमें बिजलीके सहित वज्र बसे हुए हों ॥ ६॥ उनकी ठोढ़ी बड़ी मनोहर है तथा सुन्दर और उठी हुई नासिका तोतेकी चोंचको भी लजानेवाली है। तुलसीदासजी कहते हैं, छविधाम भगवान् रामका मुख बड़ा सुखदायक और जन्म-मरणरूप भय को शान्त करनेवाला है ॥ ७ ॥ राग केदारा [ १३ ] सुमिरत श्रीरघुबीर की बाहें । होत सुगम भव-उदधि अगम अति, कोउ लांघत, कोउ उतरत थाहैं सुंदर-स्याम-सरीर-सैलतें धँसि जनु जुग जमुना अवगाहें । अमित अमल जल-बल परिपूरन, जनु जनमोसिंगार सविता हैं ॥ २ ॥ धारैं बान, कूल धनु, भूषन जलचर, भँवर सुभग सब खाँहैं । बिलसति बीचि बिजय-बिरदावलि, कर-सरोज सोहत सुषमाहैं ॥ ३ ॥ सकल-भुवन-मंगल-मंदिरके द्वार बिसाल सुहईं साहैं । जे पूजी कौसिक-मख ऋषियनि, जनक-गनप, संकर-गिरिजा हैं ॥ ४ ॥ भवधनु दलि जानकी बिबाही, भए बिहाल नृपाल त्रपा हैं । परसुपानि जिन्ह किये महामुनि जे वितए कबहू न कृपा हैं ॥ ५ ॥ जातुधान-तिय जानि बियोगिनि दुखई सीय सुनाइ कुचाहैं । जिन्ह रिपु मारि सुरारि-नारि तेइ सीस उघारि दिबाई धाहैं ॥ ६ ॥
४०३ उत्तरकाण्ड दंसमुख-बिबस तिलोक लोकपति बिकल बिनाए नाक चना हैं। सुबस बसे गावत जिन्हकें जस अमर-नाग-नर सुमुखि सना हैं॥ ७॥ जे भुज बेद-पुरान, सेष-सुक-सारद सहित सनेह सराहें। फलपलताहुकी कलपलता बर, कामदुहहुकी कामदुहा हैं॥ ८॥ सरनागत-आरत-प्रनतनिको दै दें अभयपद ओर निबाहैं। करि आईं, करिहैं, करतीं हैं तुलसिदास दासनिपर छाहैं॥ ९॥ श्रीरघुनाथजीकी भुजाओंका स्मरण करते ही संसारसमुद्र, जो कि बड़ा ही दुर्गम है, सुगम हो जाता है, फिर कोई तो उसे लांघ जाते हैं और कोई थहाकर पार कर लेते हैं॥ १॥ [वे भुजाएँ भगवान्के शरीरमें ऐसी शोभित हैं] मानो अति सुन्दर श्यामशरीररूप पर्वतसे दो यमुनाजीकी धाराएँ निकली हैं, जो बलरूप अथाह एवं निर्मल जलसे भरी हुई हैं तथा श्रृंगाररूप सूर्यसे उत्पन्न हुई हैं ॥२॥ बाण उनकी धाराएँ हैं, धनुष ही किनारा है, आभूषण जलचर जन्तु हैं और छाइयाँ (अँगुलियोंके बीचके सन्धिस्थान) भँवर हैं। विजयकी विरुदावली ही उसमें तरंगरुपसे शोभायमान है तथा उसमें कररूप कमलोंकी शोभा हो रही है ॥ ३ ॥ वे मानो सम्पूर्ण लोकोंके कल्याणरूप भवनके द्वारकी दो विशाल और शोभायमान खड़ी लकड़ियां [खंभे अर्थात बाजू] हैं, जो विश्वामित्रके यज्ञमें ऋषियोंद्वारा पूजित हुई तथा जिन्होंने जनकजी, गणेशजी, भगवान् शंकर और पार्वतीसे पूजित होकर सबकी कामनाएँ पूर्ण की हैं ॥ ४॥ इन्हींने महादेवजीका धनुष तोड़कर जानकीजीसे विवाह किया, जिससे सब राजालोग मारे शर्मके बेहाल हो गये तथा जिन्होंने कृपाकी ओर कभी दृष्टिपात भी नहीं किया, उन परशुराम-
गी तावली ४०४ जीको जिन्होंने महामुनि [मुनीश्वरोंके समान क्षमाशील] बना दिया है ! ॥ ५ ॥ जब राक्षसियोंने सीताजीको वियोगिनी जानकर बहुत-सी अप्रिय बातें कहकर उन्हें व्यथित किया, तब उन भुजाओंने शत्रुओंका संहार कर उन असुरपत्नियोंके सिर उघाड़कर उन्हें धाड़ मारकर रुलाया ॥ ६ ॥ रावणने तीनों लोकोंको विवश करके लोक- पालोंको व्याकुल कर उनसे नाकों चने बिनवाये थे । [उसी रावणके मारे जानेसे ] देवता, नाग और मनुष्यगण अपने-अपने धामोंमें सुखपूर्वक बसकर अपनी पत्नियोंके सहित जिन भुजाओंका सुयश गान करते हैं ॥ ७ ॥ जिन भुजाओंकी वेद, पुराण, शेष, शारदा और शुकदेव भी स्नेहपूर्वक सराहना करते हैं, जो कल्पलताकी भी श्रेष्ठ कल्पलता तथा कामधेनुकी भी कामधेनु हैं ॥ ८ ॥ तथा जो अपने शरणागत दीन एवं प्रणत पुरुषोंको अभयपद देकर अन्ततक उनका निर्वाह करती हैं । तुलसीदासजी कहते हैं, भगवान्की वे हीं भुजाएँ अपने दासोंपर सदा छाया करती आयी हैं, अब भी करती हैं और आगे भी करती रहेंगी ॥ ९ ॥ राग भैरव [ १४ ] रामचंद्र-करकंज कामतरु बामदेव-हितकारी । तियसनेह-बर बेलि-ललित बर-प्रेम बंधु बर बारी ॥ १ ॥ मंजुल मंगल-मूल मूल तनु, करज मनोहर साखा । रोम परन, नख सुमन सुफल सब काल सुजन-अभिलाषा ॥ २ ॥ अबिचल अमल,अनामय,अबिरल, ललित, रहित छल छाया । समन सकल संताप-पाप-रुज-मोह-मान-मद-माया ॥ ३ ॥
४०५ उत्तरकाण्ड सेवहिं सुचि मुनि-भृंग-बिहग मन-मुदित मनोरथ पाए । सुमिरत हित हुलसत तुलसी अनुराग उमगि गुन गाए ॥ ४ ॥ श्रीरामजीके करकमल भगवान् शंकरका प्रिय करनेवाले कल्पवृक्ष ही हैं। वे सीताजीकी स्नेहरूप ललित लतासे लिपटे हुए तथा लक्ष्मणजीके पुनीत प्रेमरूप सुन्दर बाड़ेसे घिरे हुए हैं ॥ १ ॥ भगवान्का महामनोहर एवं मङ्गलमय शरीर ही उसका मूल है, अंगुलियां मनोहर शाखाएँ हैं, रोमावली पत्ते हैं, नख पुष्प हैं तथा संतपुरुषोंकी इच्छापूर्ति ही उसके सब कालमें फलनेवाले सुफल हैं ॥ २ ॥ उसकी छाया स्थिर, दोषरहित, अनामय (दुखरहित), घनी, अति सुन्दर और छलरहित है। सब प्रकारके दुःख, पाप, रोग, मोह, मान, मद और माया आदिको शान्त करने वाली है ॥ ३ ॥ पवित्रचित्त मुनिजनरूप भौंरे और पक्षी मनमें प्रसन्न होकर अपने मनोरथ सिद्ध करते हुए उसका सेवन करते हैं, उसका स्मरण करनेसे तुलसीदास भी हृदयमें आनन्दित होता है और उसके प्रेममें उमँगकर उसने उसके गुण गाये हैं ॥ ४ ॥ [ १५ ] रामचरन अभिराम कामप्रद तीरथ-राज बिराजै । संकर-हृदय-भगति-भूतलपर प्रेम-अछयबट भ्राजै ॥ १ ॥ स्यामबरन पद-पीठ, अरुन तल, लसति बिसद नखश्रेनी । जनु रबि-सुता सारदा-सुर सरि मिलि चलीं ललित त्रिबेनी ॥ २ ॥ अंकुस-कुलिस-कमल-ध्वज सुंदर भँवर तरंग-बिलासा । मज्जहिं सुर-सज्जन, मुनिजन-मन मुदित मनोहर बासा ॥ ३ ॥ बिनु बिराग-जप-जाग-जोग-ब्रत, बिनु तप, बिनु तनु त्यागे । सब सुख सुलभ सद्य तुलसी प्रभु-पद-प्रयाग अनुरागे ॥ ४ ॥
ग ीतावली ४०६ सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले भगवान् रामके मनोहर चरणकमल मानो साक्षात् तीर्थराज होकर विराजमान हैं। श्रीशंकरके हृदयकी भक्तिरूप भूमिपर प्रेममय अक्षयवट शोभायमान है॥ १ ॥ चरणोंका पृष्ठभाग श्यामवर्ण है, तलुए अरुण हैं तथा उसमें शुक्लवर्ण नखावली शोभायमान है, मानो यमुना, सरस्वती और गङ्गाजी—ये तीनों मिलकर सुन्दर त्रिवेणीके रूपमें बह चली हों ॥ २ ॥ तलुओंमें जो अंकुश वज्र, कमल और ध्वजाके चिह्न हैं, वे ही सुन्दर भँवर और तरंगावली हैं। उनमें देवता और साधुजन स्नान करते हैं तथा वे मुनियोंके सुप्रसन्न चित्तोंके मनोहर निवास-स्थान हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके इस चरणरूप प्रयागमें प्रेम करनेसे वैराग्य, जप, यज्ञ, योग, व्रत, तप और शरीरत्यागके बिना ही सब सुख तत्काल सुलभ हो जाते हैं ॥ ४ ॥ राग बिलावल [ १६ ] रघुबर-रूप बिलोकु, मन । सकल लोक-लोचन-सुखदायक, नखसिख सुभग स्यामसुंदर तन । १। चारु चरन-तल-चिह्न चारि फल चारि देत परचारि जाति जन । राजत नख जनु कमल-दलनिपर अरुन-प्रभा-रंजित तुषार-कन । २। जंघा-जानु भानु कदली उर, कटि किंकिनि, पटपीत सुहावन । रुचिर निषंग, नाभि, रोमावलि, त्रिबलि, बलित उपमा कछु आवत ३ भृगुपद-चिह्न, पदक उर सोभित, मुकुतमाल, कुंकुम-अनुलेपन । मनहुँ परसपर मिलि पंकज-रवि प्रगटयौ निज अनुराग, सुजस धन बाहु बिसाल ललित सायक धनु, कर कंकन केयूर महाधन । बिमल दुकूल-दलन दामिनि-दुति, यज्ञोपवीत लसत अति पावन । ५।
४०७ | उत्तरकाण्ड कंतुग्रीव, छबि सीव, चिबुक, द्विज, अधर, कपोल, बोल, भय-मोचन नासिक सुभग, कृपापरिपूरन तरुन अरुन राजीव बिलोचन ॥ ६ ॥ कुटिल भुकुटिबर, भाल तिलक रुचि, सुचि सुंदरता श्रवन-बिभूषन मनहुँ बारि मनसिज पुरारि दिय ससिहि चाप-सर-मकर अदूषन ७ कुंचित कच, कंचन-किरीट सिर, जटित ज्योतिमय बहुबिधि मनिगन तुलसिदास रबिकुल रबि-छबि कबि कहि न सकत सुक- संभु-सहसफन ॥ ८ ॥ अरे मन ! तू तनिक रघुनाथजीको रूप तो देख । यह श्यामसुन्दर शरीर तो सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको सुख देनेवाला और नखसे सिखतक शोभायमान है ॥ १ ॥ इनके चरणतलके [वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल—ये] चारों मनोहर चिह्न अपने भक्तजनों- को पहचानकर उन्हें आग्रहपूर्वक [अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—ये] चारों फल देते हैं । प्रभुके नख ऐसे शोभामान हैं, मानो कमल- दलोंके ऊपर बालसूर्यकी प्रभासे अनुरञ्जित हिमकण हों ॥ २ ॥ इनकी जंघा और जानु कदलीकी याद दिलाती है, कमरमें किंकिणी तथा सुहावना पीताम्बर है, इनके सुन्दर तूणीर, नाभि, रोमावली और उदरदेशकी त्रिवलीकी तो कोई उपमा ही नहीं बनती ॥ ३ ॥ इनके वक्षःस्थलमें भृगुजीका चरणचिह्न, पदिक, मोतियोंकी माला और केसरका अनुलेपन ऐसा शोभायमान है, मानो सूर्य और कमलने आपसमें मिलकर अपने प्रेम तथा महान् सुयशको प्रकट किया है ॥ ४ ॥ वे अपनी विशाल भुजाओंमें मनोहर धनुष बाण धारण किये हैं, इनके हाथों महामूल्यवान् कंकण और केयूर हैं तथा इनके शरीरपर बिजलीकी छटाको छीननेवाला निर्मल दुकूल तथा पवित्र
गीतावली ४०८ यज्ञोपवीत शोभायमान है॥ ५ ॥ इनकी ग्रीवा शंखके समान है। चिबुक, दन्तावली, अधर और कपोल मानो छबिकी सीमा ही हैं, वचन सब प्रकारके भयको दूर करनेवाले हैं, नासिका बड़ी सुघड़ है तथा नवीन अरुणकमल-से नेत्र कृपासे परिपूर्ण हैं ॥ ६ ॥ इनकी सुन्दर भ्रुकुटियाँ बड़ी बाँकी हैं माथेपर मनोहर तिलक है तथा कर्णभूषणों (कुण्डलों) की भी बड़ी ही सुन्दरता है, मानो महादेवजीने कामदेवको मारकर उसके निर्दोष धनुष-बाण और मकर चन्द्रमाको दे दिये हैं। [यहाँ भगवान्का मुख चन्द्रमा है, भ्रुकुटियाँ धनुष हैं, तिलक बाण हैं तथा कुण्डल मकर हैं] ॥ ७ ॥ प्रभुके कुञ्चित केश हैं, सिरपर सोनेका मुकुट है, जिसमें अनेक प्रकारकी कान्तिमयी मणियाँ जड़ी हुई हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, सूर्यकुलसूर्य भगवान् रामकी छवि, कोई कवि क्या, सुकदेव, महादेव और शेष आदि भी नहीं कह सकते ॥ ८ ॥ राग कान्हरा [ १७ ] देखो रघुपति-छबि अतुलित अति । जनु तिलोक-सुषमासकेलि बिधि राखी रुचिर अंग-अंगनि प्रति ॥ १ ॥ पदुमराग रुचि मृदु पदतल धुज-अंकुस कुलिस-कमल यहि सूरति रही आनि चहुँ बिधि भगतनिकी जनु अनुरागभरी अंतरगति ॥ २ ॥ सकल-सुचित्त सुजन सुखदायक,उरधरेख बिसेष बिराजति । मनहुँ भानु-मंडलहि सँवारत धरयो सूत बिधि-सुत बिचित्रमति । ३ । सुभग अँगुष्ठ, अंगुली अबिरल, कछुक अरुननख-ज्योति जगमगति । चरन-पीठ उन्नत नत पालक, गूढ़ गुलुफ, जंघा कदलीजति ॥ ४ ॥
४०६ उत्तरकाण्ड काम-तून-तल-सरिस जानु जुग, उरु करिकर, करभहि बिलखावति। रसना रचित रतन चामीकर, पीत बसन कटि कसे सरसावति ॥ ५ ॥ नाभी सर, त्रिवलीनिसेनिका, रोमराजि सेंवल-छबि पावति। उरमुकुतामनि-माल मनोहर मनहु हंस-अवली उड़ि आवति ॥ ६ ॥ हृदय पदक, भृगु-चरन चिह्नबर, बाहु बिसाल जानुलगि पहुँचति। कल केयूर पूर कंचन-मनि, पहुँची मंजु कंजकर सोहति ॥ ७ ॥ सुजव सुरेख सुनख अंगुलिजुत सुंदर पानि मुद्रिका राजति। अंगुलित्रान-कमान-बानछबि सुरनि सुखद, असुरनि उर। सालति ॥ ८ स्याम सरीर सुचंदन-चरचित पीत दुकूल अधिक छबि छाजति। नील जलदपर निरखि चंद्रिका दुरनि त्यागि दामिनि जनु दमकति ॥ ९ ॥ यज्ञोपबीत पुनीत बिराजत गूढ़ जत्रु बनि पीन अंस तति। सुगढ़ पुष्ट उन्नत कृकाटिका, कंबु-कंठ-सोभा मन मानति ॥ १० ॥ सरद-समय-सरसीरुह-निंदक मुख सुषमा कछु कहत न बानति। निरखतही नयननि निरुपम सुख, रबिसुत-मदन-सोम- दुति निदरति ॥ ११ ॥ अरुन अधर, द्विजपांति अनूपम, ललित हँसनि जनु मन आकरषति। बिद्रुम-रचित बिमानमध्य जनु सुरमंडली सुमन-चय बरसति ॥ १२ ॥
ह type piece is worn out, or if the typesetter accidentally grabbed प, it printed मोपति.
Wait, let me look at मोषति again. Could it be मोषति?
Wait, look at मोपति: let me look at both options. If I transcribe what is in the image:
Does it say मोपति or मोहति?
Let's look at ह in अहि (L14):
The top is flat, goes down, loops right, then hooks back.
If you look at line 3:
It's literally मोपति । or मोहति ।
Wait, let's look at the character:
Top horizontal bar: spans the full width of the letter.
Left vertical stroke: goes straight down.
Bottom horizontal: goes straight across to the right.
Right vertical stroke: goes straight up to the top bar.
That is 100% the letter प!
Wait, does the right vertical stroke go all the way to the top?
Yes, exactly like प in कपोल!
It is definitely printed as मोपति! It's a misprint for मोहति in the original book!
Should we transcribe मोपति or मोहति?
Usually, in exact OCR/transcription, we transcribe what is printed, or
४११ उत्तरकाण्ड है, टखने गूढ़ (छिपे हुए) हैं तथा जंघाएँ कदलीस्तम्भको जीतनेवाली हैं ॥ ४ ॥ दोनों घुटने कामदेवके तरकसके निम्नभागके समान हैं, सुघड़ जाँघें हाथीकी सूँड़ और हाथीके बच्चेका मान मर्दन करनेवाली हैं। कमरमें सुवर्ण और मणियोंकी बनी हुई करधनी तथा उसपर कसा हुआ पीताम्बर सुशोभित हो रहा है ॥ ५ ॥ प्रभुकी नाभि मानो सरोवर है, उदरकी तीन रेखाएँ उसकी सीढ़ियाँ हैं तथा रोमावली सेवारकी छवि पाती है। हृदयमें जो मोतियोंकी मनोहर माला पड़ी हुई है वह मानो [उस नाभि- सरोवरपर] हंसोंकी पंक्तियां उड़-उड़कर आ रही हैं ॥ ६ ॥ भगवान्के वक्षःस्थलपर पदक तथा मनोहर भृगुलताका चिह्न है। उनकी लम्बी-लम्बी भुजाएँ घुटनोंतक लटकती हैं, उसमें सुवर्ण और मणियोंके सुन्दर बाजूबंद हैं तथा करकमलोंमें मनोहर पहुँचियाँ शोभायमान हैं ॥ ७ ॥ शुभ यव, शुभ रेखा, सुन्दर नख और मनोहर अँगुलियोंसे युक्त सुन्दर हाथोंमें अँगूठी शोभा पा रही है तथा अङ्गुलित्राण, धनुष और बाणोंकी छवि देवताओंको सुख देती है तथा असुरोंके हृदयमें शूल उत्पन्न करती है ॥ ८ ॥ मंजुल चन्दनचर्चित श्याम शरीरमें पीताम्बर बड़ा ही छविमय जान पड़ता है, मानो नील मेघपर चन्द्रमाकी चाँदनी देखकर बिजली छिपना छोड़कर (स्थिर हो) दमक रही हो ॥ ९ ॥ गलेमें पवित्र यज्ञोपवीत शोभायमान है, जत्रु (गलेकी धनुषाकार हड्डी) गूढ़ (छिपी हुई) है, कन्धे स्थूल और विस्तृत हैं, कृकाटिका (घांटी) सुघड़, पुष्ट एवं उन्नत है तथा शङ्खसदृश (त्रिरेखायुक्त) गलेकी शोभा मनको प्रिय जान पड़ती है ॥ १० ॥ शरत्कालीन कमलकुसुमोंकी
गीतावली ४१२ निन्दा करनेवालो मुखकी मनोहरता कुछ कहनेमें नहीं आती; उसे देखनेसे ही नेत्रोंको अनुपम सुख होता है। वह छवि अश्विनीकुमार, कामदेव और चन्द्रमाकी कान्तिका भी निरादर करती है ॥ ११ ॥ प्रभुके लाल-लाल ओठोंमें अनुपम दन्तावली शोभायमान है, उनकी मनोहर मुसकान मानो मनको खींचे लेती है। ऐसा जान पड़ता है, जैसे मूंगेके बने हुए विमानमें चढ़ी हुई देवताओंकी मण्डली पुष्पावली बरसा रही हो ॥ १२ ॥ सुन्दर ठोड़ी मनोहर हनुस्थल (डोड़ीके नीचेका भाग) तथा सुन्दर कपोल और नासिका—ये सब मनको मोहे लेते हैं। प्रभुके नेत्र कमलका मान मर्दन करनेवाले हैं तथा चितवन अति मनोहर अमृतमय जलकी वर्षा करती है ॥ १३ ॥ उनके सिरपर केश सुशोभित हैं, वचन बड़े ही सुन्दर और गम्भीर हैं तथा कानोंमें कुण्डलोंका हिलना हृदयको प्रफुल्लित करता है, मानो किसी नवीन नील मेघको देखकर और उसका शब्द सुनकर मोरोंकी मनोहर जोड़ी नाच रही हो ॥ १४ ॥ चन्द्रमाके श्याम चिह्नके समान [ भगवान्के मुखचन्द्रपर ] बाँकी भ्रुकुटियाँ और माथेपर कुंकुमकी मनोहर रेखाएं (तिलक) विराजमान हैं तथा सिरपर हीरे और मणियोंसे जड़े हुए सुवर्णमुकुटकी कान्ति सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करती है ॥ १५ ॥ श्रुति, शेष, शुकदेव, शंकर और सरस्वती आदि भी भगवान्के रूपका वर्णन करते-करते उसका पार नहीं पाते; फिर इस मूर्तिका, जो मन और वचनका विषय नहीं है, तुलसीदास किस प्रकार वर्णन कर सकता है ? ॥ १६ ॥
४१३ उत्तरकाण्ड राम-हिडोला राग मलार [ १८ ] आली री ! राधोके रुचिर हिंडोलना झूलन जैए ॥ फटिक-भीति सुधारु चहुँ दिसि, मंजु मनिमय पौरि । गच काँच लखि मन नाच सिखिनु, पाँचसर-सुफँसौरि ॥ तोरन-बितान-पताक-चामर-धुज-सुमन-फल-थोरि । प्रतिछांह-छबि कहि-साखिदै प्रति सों कहै गुरु हौं रि ॥ १ ॥ मदन-झयके खंभ-से रचे खंभ सरल बिसाल । पाटीर-पाटि विचित्र भँवरा बलित, बेलत लाल ॥ डांड़ो कनक कुंकुम-तिलक-रेख-सी मनसिज-माल । पटली पदिक रति-हृदय जनु कलधौत कोमल माल ॥ २ ॥ उनये सघन घनघोर, मृदु झरि सुखद सावन लाग । बगपांति, सुरधनु, दमक दामिनि हरित भूमि-बिभाग ॥ दांदुर मुदित, भरे, सरित-सर, महि उमग जनु अनुराग । पिक-मोर-मधुप-चकोर-चातक-सोर उपबन बाग ॥ ३ ॥ सो समौ देखि सुहावनो नवसत सँवारि सँवारि । गुन-रूप-जोबन-सींव सुंदरि चली झुंडनि भारि ॥ हिंडोल-साल बिलोकि सब अंचल पसारि पसारि । लागीं असीसन राम-सीतहि सुख-समाजु निहारि ॥ ४ ॥ झूलहिं, झुलावहिं, ओसरिन्ह गावैं सुहो, गौडमल्लार । मंजीर-नूपुर-बलय-धुनि जनु काम-करतल-तार ॥ अति मुचत स्रमकन मुखनि, बिथुरे चिकुर, बिलुलित हार । तम तड़ित उड़ुगन अरुन बिधु जनु करत ब्योम-बिहार ॥ ५ ॥
गीतावली ४१४ हिय हरषि, वरषि प्रसून निरखति बिबुध-तिय तृन तूरि । आनंद-जल लोचन, मुदित मन, पुलक तनु भरि पूरि ॥ सब कहहिं, अबिचल राज नित, कल्यान-मंगल मूरि । चिर जिया जानकिनाथ जग तुलसी-सजीवनिमूरि ॥ ६ ॥ अरी आली ! रघुनाथजीके मनोहर हिंडोलेमें झूलनेके लिये चलो । उसके चारों ओर स्फटिकमणिकी मनोहर भीतें हैं तथा मणियोंके सुन्दर दरवाजे हैं । उसकी काँचकी गचें देखकर मन मयूर- के समान नाचने लगता है, मानो वह कामदेवका फंदा ही हो । उस हिंडोलेमें जो बंदनवार, वितान, पताका, चमर, ध्वजा तथा पुष्प और फलोंकी आकृतियाँ बनायी गयी हैं, उनकी परछाँहीं मानो कवि- की साक्षी देकर अपने बिम्बोंसे [ जिसके अनुरूप उनकी प्रतिछाया मणि और काँचकी गचमें प्रतिबिम्बित है ] कहती हैं कि हम तुमसे बड़ी हैं ॥ १ ॥ उस हिंडोलेमें कामदेवके विजयस्तम्भके समान सीधे और बड़े-बड़े खम्भे बनाये गये हैं । उसमें विचित्र भौरों (आंकड़ों) में लटकी हुई चन्दनकी पाटी तथा लाल रंगका बेलन है । बेलनमें जो सोनेकी डंडी लगी हुई है वह ऐसी जान पड़ती है, मानो काम- देवके माथेपर कुंकुमके तिलककी रेखा हो तथा पटुली, मानो रतिके वक्षःस्थलपर पदिक तथा सोनेकी कोमल माला हो ॥ २ ॥ सुखदायक श्रावण मास आरम्भ हो गया है, घनघोर घटाएँ उमड़ी हुई हैं, जलकी मन्द-मन्द फुहारें पड़ रही हैं, बगुलोंकी पंक्ति और इन्द्रधनुष शोभायमान है, बिजली चमक रही है, सम्पूर्ण भू-भाग हरे-भरे होरहे हैं, मेढक बड़े प्रसन्न हैं तथा नदी और तालाबोंमें जल भरा हुआ है, मानो सम्पूर्ण पृथ्वीमें प्रेमकी बाढ़ आरही है । बाग-बगीचोंमें सब ओर कोयल
४१५ उत्तरकाण्ड मोर, भौंरे, चकोर और चातकोंका शोर होरहा है ॥ ३ ॥ वह सुहावना समय देखकर रूप, गुण और यौवनकी सीमारूप बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ सोलहों शृंगार करके दल बाँधकर चलीं और उस हिंडोलेकी शोभा देख अपने आँचल फैला-फैलाकर राम और सीताको— उनका सुख-समाज देखकर—आशीर्वाद देने लगीं ॥ ४ ॥ फिर वे सूहो, गौंडमलार आदि राग गाती हुई बारी-बारीसे झूलने और झुलाने लगीं उस समय जो मंजीर, नूपुर और कंकणोंकी ध्वनि होती थी, वह कामदेवके हाथोंकी ताल-सी जान पड़ती थी [झूलते समय श्रमकी अधिकताके कारण] उनके मुखपर छायी हुई पसीनेकी बूंदें, बिखरे हुए बाल और उलझे हुए हार ऐसे जान पड़ते थे, मानो अन्धकार, बिजली, नक्षत्रगण, बालसूर्य और चन्द्रमा आकाशमें विहार कर रहे हों [यहाँ बिखरे हुए बाल अन्धकार हैं, अङ्गकी कान्ति बिजली है, पसीनेकी बूंदें नक्षत्रगण हैं, हार बालसूर्य हैं तथा मुख चन्द्रमा है] ॥ ५ ॥ इस तरह देवाङ्गनाएँ हृदयमें हर्षित हो फूलोंकी वर्षा कर [नजर न लग जाय, इसलिये] तिनका तोड़ती हुई यह सब लीला देख रही हैं। उनके नेत्रोंमें आनन्दाश्रु छाये हुए हैं, मन प्रसन्न है तथा सम्पूर्ण शरीर अत्यन्त पुलकित हो रहा है। वे सब यही कह रही हैं कि यह अत्यन्त कल्याण और मंगलमय राज्य सर्वदा अविचल रहे तथा तुलसीदासजीके जीवनमूल जानकीनाथ भगवान् राम संसारमें दीर्घजीवी हों ॥ ६ ॥ अयोध्याकी रमणीयता वर्षा-वर्णन राग सूहो [ १९ ] कोसलपुरी सुहावनी सरि सरजूके तीर । भूपावली-मुकुटमनि नृपति जहाँ रघुबीर ॥
गीतावली ४१६ पुर-नर-नारि चतुर अति, धरमनिपुन, रत नीति। सहज सुभाय सकल उर श्रीरघुबर-पद-प्रीति॥ श्रीरामपद-जलजात सबके प्रीति अबिरल पावनी। जो चहत सुक-सनकादि, संभु-बिरंचि, मुनि-मन-भावनी॥ सबहीके सुंदर मंदिरांजिर,राउ-रंक न लखि परै। नाकेस-दुरलभ भोग लोग करहिं, न मन बिषयनि हरै ॥ १ ॥ सरयूनदीके तटपर अति सुहावनी अयोध्यापुरी है, जहाँके राजा महिपालमण्डली-मुकुटमणि महाराज राम हैं। नगरके सभी स्त्री-पुरुष बड़े चतुर, धर्मकुशल और नीतिपरायण हैं। उन सबके हृदयमें स्वभावसेही श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंमेंप्रीति है। श्रीरामचन्द्रजीके चरणसरोरुहमें उन सभीका अविच्छिन्न और पवित्र प्रेम है, जिसकी कि शुक, सनकादि, महादेव और ब्रह्मा आदि भी इच्छा करते हैं और जो मुनियोंके मनको भी प्रिय है। सभीके घर और आँगन बड़े सुन्दर हैं। उनमें राजा-रंककी कोई पहचान ही नहीं होती। जो भोग देवराजको भी दुर्लभ हैं, उन्हें वहाँके लोग भोगते हैं, तो भी उनका मन विषयोंके वशीभूत नहीं होता ॥ १ ॥ सब रितु सुखप्रद सो पुरी, पावस अति कमनीय। निरखत मनहि हरत हठि हरित अवनि रमनीय॥ बीरबहूटि बिराजही, दादुर-धुनि चहुँ ओर। मधुर गरजि घन बरषहिं, सुनि सुनि बोलत मोर॥ बोलत जो चातक-मोर, कोकिल-कीर पारावत घने। खग बिपुल पाले बालकनि कूजत, उड़ात सुहावने॥ बकराजि राजति गगन, हरिधनु, तड़ित दसदिसि सोहहीं। नभ-नगरको सोभा अतुल अवलोकि मुनि-मन मोहहीं॥ २ ॥
४१७ उत्तरकाण्ड वह पुरी यों तो सभी ऋतुओंमें सुखदायिनी है, परन्तु वर्षा ऋतुमें तो वह बड़ी ही सुहावनी जान पड़ती है। उस समय वहाँकी हरो-भरी रमणीय भूमि देखते ही बलपूर्वक चित्तको हर लेती है। चारों ओर बीरबहूटियाँ सुशोभित होती हैं, मेढकोंकी ध्वनि सुनायी देती है तथा मेघ मन्द-मन्द गरजकर वर्षा करते हैं और उनका शब्द सुन-सुनकर मयूर बोलने लगते हैं। उस समय चातक, मोर, कोकिल शुक और कबूतर आदि बहुत-से पक्षी बोलते रहते हैं तथा बालकोंके पाले हुए अनेकों पक्षी कूजते और सुहावनी उड़ान भरते हैं। आकाशमें बगुलोंकी पंक्ति और इन्द्रधनुष तथा दशा दिशाओंमें बिजली शोभायमान होने लगती है। उस समय आकाश और नगरकी वह अतुलित शोभा देखकर मुनियोंके मन भी मोहित हो जाते हैं॥ २॥ गृह-गृह रचे हिडोलना, महि गच कांच सुढार। चित्र बिचित्र चहू दिसि परदा फटिक-पगार ॥ सरल बिसाल बिराजहीं बिद्रुम-खंभ सुजोर। चारु पाटि पटी पुरटकी झरकत मरकत भौर ॥ रकत भवँर डांडी कनक मनि-जटित दुति जगमगि रही। पटुली मनहु बिधि निपुनता निज प्रगट करि राखी सही ॥ बहुरंग लसत बितान मुकुतादाम-सहित मनोहरा। नव-सुमन-माल-सुगंध लोभे मंजु गुंजत मधुकरा ॥ ३ ॥ घर-घरमें हिंडोले, पृथ्वीपर कांचकी सुन्दर और सुढाल गच तथा चारों दिशाओंमें स्फटिककी भीतोंपर चित्र-विचित्र परदे लटक रहे हैं। मूंगेके सीधे, विशाल और सुदृढ़ खंभे सुशोभित हैं तथा सोनेसे मढ़ी हुई सुन्दर पटलियोंपर मरकतमणिके भौंरे (आंकड़े) झिलमिला गी० २६—
गीतावली ४१८ रहे हैं। इस प्रकार हिंडोलोंमें मरकतमणिके भौंरे और सोनेकी मणि- जटित डंडियोंकी कान्ति जगमगा रही है और पटली तो ऐसी सुशोभित होती है मानो विधाताने सचमुच ही अपनी रचनाचातुरीको प्रकट करके रक्खा हो। उन हिंडोलोंमें मोतियोंकी लड़ियोंके सहित अनेकों रंग-बिरंगे मनोहर चँदोवे शोभायमान हो रहे हैं तथा उनमें लटकी हुई नवीन पुष्पोंकी मालाओंकी सुगन्धपर लुब्ध होकर भ्रमरगण मनोहर गुंजार कर रहे हैं ॥ ३ ॥ झुंड झुंड झूलन चलीं गजगामिनि वर नारि । कुसुंभी चीर तनु सोहहीं, भूषन बिबिध सँवारि ॥ पिकबयनी मृगलोचनी, सारद ससि सम तुंड । रामसुजस सब गावहीं सुसुर सुसारँग गुंड ॥ सारंग, गुंड-मलार, सोरठ, सुहव सुघरनि बाजहीं । बहु भाँति तान-तरंग सुनि गंधरब किंनर लाजहीं ॥ अति मचत, छूटत कुटिल कच, छबि अधिक सुंदरि पावहीं । पट उड़त, भूषन खसत, हँसि हँसि अपर सखी झुलावहीं ॥ ४ ॥ [उन हिंडोलेमें] झुंड-की-झुंड गजगामिनी सुन्दर नारियाँ झूलनेके लिये जा रही हैं। उनके शरीरपर कुसुंभी साड़ी तथा तरह- तरहसे सजाये हुए आभूषण शोभायमान हैं। उनके मुख शरदचन्द्रके समान हैं, वे कोकिलके समान स्वरवाली, मृगनयनी बालाएँ सुन्दर स्वरसे सारंग और गौंड रागमें भगवान् रामका सुयश गान कर रही हैं। इस प्रकार अयोध्याके सुन्दर घरोंमें सारंग, गौंडमलार, सोरठ और सूहो रागोंमें मनोहर बाजे बज रहे हैं। उनकी अनेक प्रकारकी तान- तरंगावली सुनकर गन्धर्व और किन्नर भी लज्जित हो जाते हैं। इस
४१६ उत्तरकाण्ड प्रकार खूब झूला मचता है, झूलनेवाली नारियों की घुंघराली अलकें बिखर जाती हैं, जिससे उन रमणियों की सुन्दरता और भी बढ़ जाती है। हवा लगने से उनके वस्त्र उड़ने लगते हैं और आभूषण खिसक जाते हैं। इसपर अन्यान्य सखियाँ उन्हें हँस-हँसकर झुलाने लगती हैं ॥ ४ ॥
फिरि फिरि झूलहिं भामिनी अपनी अपनी बार। बिबुध-बिमान थकित भए देखत चरित अपार ॥ बरषि सुमन हरषहिं उर, बरनहिं हरिगुन-गाथ । पुनि पुनि प्रभुहि प्रसंसहीं 'जय जय जानकिनाथ' ॥ जय जानकीपति, बिसद कीरति सकल-लोक-मलापहा ॥ सुरबधू देंहि असीस, चिरजिव राम, सुख-संपत्ति महा ॥ पावस समय कछू अवध बन्नत सुनि अघौघ नसावहीं । रघुबीरके गुनगन नवल नित दास तुलसी गावहीं ॥ ५ ॥
सब सखियाँ अपनी-अपनी बारी से पुनः-पुनः झूलती हैं। इस अपार चरित को देवताओं के विमान थकित होकर देख रहे हैं। वे पुष्प बरसाकर हृदय में हर्षित हो श्रीहरि की गुणगाथा बखान करते हैं और 'जानकीनाथ की जय हो, जय हो' ऐसा कहते हुए बारंबार प्रभु की प्रशंसा करते हैं। जानकीनाथ की जय हो; उनकी विशद कीर्ति सम्पूर्ण कलि-कल्मषों को नष्ट करनेवाली है। इस प्रकार देवाङ्गनाएँ भी 'भगवान् राम चिरजीवी हों और उनका सुख और वैभव बढ़ता रहे' ऐसा कहती हुई उन्हें आशीर्वाद देती हैं। वर्षाकालीन अयोध्या- का वर्णन सुनने से सब पापसमूह नष्ट हो जाते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि रघुनाथजी के नित्य-नूतन गुणगण को दास सदा ही गाते रहते हैं ॥ ५ ॥