गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४०० श्रवन सुंदर, सम कुंडल कल जुगम, तुलसिदास अनूप, उपमा कही न जाई। मानो मरकत सीप सुंदर ससि समीप कनक करजुत बिधि बिरची बनाई ॥ ३ ॥ आज रघुनाथजीका मुख देखनेसे आनन्द होता है। कारण कि वह सेवकोंपर सुरुख अर्थात् अनुकूल हैं; शरच्चन्द्र भी उस शोभाको देखकर सिहाता है। उनके ओठ लाल-लाल हैं तथा विशद मुसकान बड़ी ही मधुर है। मानो हासरूप चन्द्रमाकी किरणोंको होंठरूप कमलोंने मनाकर रख लिया है ॥ १ ॥ प्रभुके अरुणवर्ण एवं विशालनेत्र, मनोहर भ्रूकुटि, ललाटपरका तिलक मनोहर कपोल, चिबुक और नासिका बड़ी ही सुन्दर हैं। उनकी कुटिल अलकें बिखरी हुई हैं, मानो मधुके लालचसे दो कमलोंके ऊपर भौंरे लुभा- कर रह गये हों ॥ २ ॥ उनके सुन्दर कानोंमें एक-से मनोहर कुण्डलोंकी जोड़ी है। तुलसीदासजी कहते हैं, वे तो अनुपम हैं, उनकी उपमा कही नहीं जाती, मानो विधाताने [मुखरूप] सुन्दर चन्द्रमाके समीप [कुण्डलरूप] सुवर्णकी मछलियोंके सहित [कर्णरूप] मरकतमणिकी सीपियोंको रचकर बनाया हो ॥ ३ ॥ राग भैरव [१९] प्रातकाल रघुबीर-बदन-छबि चितै, चतुर चित मेरे। होंहिं बिबेक बिलोचन निरमल सुफल सुसीतल तेरे ॥ १ ॥ भाल बिसाल बिकट भ्रुकुटी बिच तिलक-रेख रुचि राजै। मनहुँ मदन तन तकि मरकत-धनु जुगुल कनक सर साजै ॥ २ ॥