भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 407

४०१ उत्तरकाण्ड रुचिर पलक लोचन जुग तारक स्याम, अरुन सित कोए । जनु अलि नलिन-कोस महँ बंधुक-सुमन सेज सजि सोए ॥ ३ ॥ बिलुलित ललित कपोलनिपर कच मेचक कुटिल सुहाए । मनो बिधुमहँ बनरुह बिलोकि अलि विपुल सकौतुक आए ॥ ४ ॥ सोभित श्रवन कनक-कुंडल कल लंबित बिबि भुजमूले । मनहुँ केकि तकि गहन चहत जुग उरग इंदु प्रतिकूले ॥ ५ ॥ अधर अरुनतर, दसन-पांति बर, मधुर मनोहर हासा । मनहुँ सोन सरसिज महँ कुलिसनि तड़ित सहित कृत बासा ॥ ६ ॥ चारु चिबुक, सुकतुंड बिनिंदक सुभग सुउन्नत नासा । तुलसिदास छबिधाम राममुख सुखद, समन भवत्रासा ॥ ७ ॥ ऐ मेरे चतुर चित्त ! तू प्रातःकाल होते ही रघुनाथजीके मुख- की शोभा निहारा कर । इससे तेरे विवेकरूप नेत्र निर्मल, सफल और शीतल हो जायेंगे ॥ १ ॥ भगवान्‌के विशाल भालपर बांकी भ्रुकुटियां हैं और उनके बीचमें तिलककी मनोहर रेखा विराजमान है, मानों कामदेवने [अलकावलीरूप] अन्धकारको ताककर [भ्रुकुटियुगलरूप] मरकतमणिके धनुषपर [तिलकरूप] दो सुवर्ण- मय-बाण चढ़ाये हों ॥ २ ॥ सुन्दर पलकयुक्त नेत्रोंमें दो श्यामवर्ण तारे तथा श्वेत रक्तवर्ण कोये हैं, मानो कमलकोषमें मुंदे हुए दो भौंरे बन्धूकपुष्पकी शय्या बनाकर उसपर शयन कर रहे हों ॥ ३ ॥ प्रभुके मनोहर कपोलोंपर लटकती हुई काली और घुंघराली अलकें ऐसी शोभायमान हैं, मानो [मुखरूप] चन्द्रमामें [नेत्ररूप] कमलकुसुम देखकर कुतूहलवश बहुत से भौंरे इकट्ठे हो गये हों ॥४॥ भगवान्‌के कानोंमें दोनों भुजाओंके मूलभागतक लटकते हुए सुवर्णके गी० २६—