गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४०२ कुण्डल सुशोभित हैं, मानो [मुखरूप] चन्द्रमाके प्रतिकूल हुए [भुजारूप] दो सर्पोंको देखकर उन्हें [कुण्डलरूप] दो मयूर पकड़ना चाहते हैं ॥ ५ ॥ भगवान्के अधर खूब लाल-लाल हैं, दन्तावली बड़ी सुन्दर है तथा हास्य बड़ा मधुर और मनोहर है, मानो किसी सोनेके कमलमें बिजलीके सहित वज्र बसे हुए हों ॥ ६॥ उनकी ठोढ़ी बड़ी मनोहर है तथा सुन्दर और उठी हुई नासिका तोतेकी चोंचको भी लजानेवाली है। तुलसीदासजी कहते हैं, छविधाम भगवान् रामका मुख बड़ा सुखदायक और जन्म-मरणरूप भय को शान्त करनेवाला है ॥ ७ ॥ राग केदारा [ १३ ] सुमिरत श्रीरघुबीर की बाहें । होत सुगम भव-उदधि अगम अति, कोउ लांघत, कोउ उतरत थाहैं सुंदर-स्याम-सरीर-सैलतें धँसि जनु जुग जमुना अवगाहें । अमित अमल जल-बल परिपूरन, जनु जनमोसिंगार सविता हैं ॥ २ ॥ धारैं बान, कूल धनु, भूषन जलचर, भँवर सुभग सब खाँहैं । बिलसति बीचि बिजय-बिरदावलि, कर-सरोज सोहत सुषमाहैं ॥ ३ ॥ सकल-भुवन-मंगल-मंदिरके द्वार बिसाल सुहईं साहैं । जे पूजी कौसिक-मख ऋषियनि, जनक-गनप, संकर-गिरिजा हैं ॥ ४ ॥ भवधनु दलि जानकी बिबाही, भए बिहाल नृपाल त्रपा हैं । परसुपानि जिन्ह किये महामुनि जे वितए कबहू न कृपा हैं ॥ ५ ॥ जातुधान-तिय जानि बियोगिनि दुखई सीय सुनाइ कुचाहैं । जिन्ह रिपु मारि सुरारि-नारि तेइ सीस उघारि दिबाई धाहैं ॥ ६ ॥