भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 408

गीतावली ४०२ कुण्डल सुशोभित हैं, मानो [मुखरूप] चन्द्रमाके प्रतिकूल हुए [भुजारूप] दो सर्पोंको देखकर उन्हें [कुण्डलरूप] दो मयूर पकड़ना चाहते हैं ॥ ५ ॥ भगवान्‌के अधर खूब लाल-लाल हैं, दन्तावली बड़ी सुन्दर है तथा हास्य बड़ा मधुर और मनोहर है, मानो किसी सोनेके कमलमें बिजलीके सहित वज्र बसे हुए हों ॥ ६॥ उनकी ठोढ़ी बड़ी मनोहर है तथा सुन्दर और उठी हुई नासिका तोतेकी चोंचको भी लजानेवाली है। तुलसीदासजी कहते हैं, छविधाम भगवान् रामका मुख बड़ा सुखदायक और जन्म-मरणरूप भय को शान्त करनेवाला है ॥ ७ ॥ राग केदारा [ १३ ] सुमिरत श्रीरघुबीर की बाहें । होत सुगम भव-उदधि अगम अति, कोउ लांघत, कोउ उतरत थाहैं सुंदर-स्याम-सरीर-सैलतें धँसि जनु जुग जमुना अवगाहें । अमित अमल जल-बल परिपूरन, जनु जनमोसिंगार सविता हैं ॥ २ ॥ धारैं बान, कूल धनु, भूषन जलचर, भँवर सुभग सब खाँहैं । बिलसति बीचि बिजय-बिरदावलि, कर-सरोज सोहत सुषमाहैं ॥ ३ ॥ सकल-भुवन-मंगल-मंदिरके द्वार बिसाल सुहईं साहैं । जे पूजी कौसिक-मख ऋषियनि, जनक-गनप, संकर-गिरिजा हैं ॥ ४ ॥ भवधनु दलि जानकी बिबाही, भए बिहाल नृपाल त्रपा हैं । परसुपानि जिन्ह किये महामुनि जे वितए कबहू न कृपा हैं ॥ ५ ॥ जातुधान-तिय जानि बियोगिनि दुखई सीय सुनाइ कुचाहैं । जिन्ह रिपु मारि सुरारि-नारि तेइ सीस उघारि दिबाई धाहैं ॥ ६ ॥