गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०३ उत्तरकाण्ड दंसमुख-बिबस तिलोक लोकपति बिकल बिनाए नाक चना हैं। सुबस बसे गावत जिन्हकें जस अमर-नाग-नर सुमुखि सना हैं॥ ७॥ जे भुज बेद-पुरान, सेष-सुक-सारद सहित सनेह सराहें। फलपलताहुकी कलपलता बर, कामदुहहुकी कामदुहा हैं॥ ८॥ सरनागत-आरत-प्रनतनिको दै दें अभयपद ओर निबाहैं। करि आईं, करिहैं, करतीं हैं तुलसिदास दासनिपर छाहैं॥ ९॥ श्रीरघुनाथजीकी भुजाओंका स्मरण करते ही संसारसमुद्र, जो कि बड़ा ही दुर्गम है, सुगम हो जाता है, फिर कोई तो उसे लांघ जाते हैं और कोई थहाकर पार कर लेते हैं॥ १॥ [वे भुजाएँ भगवान्के शरीरमें ऐसी शोभित हैं] मानो अति सुन्दर श्यामशरीररूप पर्वतसे दो यमुनाजीकी धाराएँ निकली हैं, जो बलरूप अथाह एवं निर्मल जलसे भरी हुई हैं तथा श्रृंगाररूप सूर्यसे उत्पन्न हुई हैं ॥२॥ बाण उनकी धाराएँ हैं, धनुष ही किनारा है, आभूषण जलचर जन्तु हैं और छाइयाँ (अँगुलियोंके बीचके सन्धिस्थान) भँवर हैं। विजयकी विरुदावली ही उसमें तरंगरुपसे शोभायमान है तथा उसमें कररूप कमलोंकी शोभा हो रही है ॥ ३ ॥ वे मानो सम्पूर्ण लोकोंके कल्याणरूप भवनके द्वारकी दो विशाल और शोभायमान खड़ी लकड़ियां [खंभे अर्थात बाजू] हैं, जो विश्वामित्रके यज्ञमें ऋषियोंद्वारा पूजित हुई तथा जिन्होंने जनकजी, गणेशजी, भगवान् शंकर और पार्वतीसे पूजित होकर सबकी कामनाएँ पूर्ण की हैं ॥ ४॥ इन्हींने महादेवजीका धनुष तोड़कर जानकीजीसे विवाह किया, जिससे सब राजालोग मारे शर्मके बेहाल हो गये तथा जिन्होंने कृपाकी ओर कभी दृष्टिपात भी नहीं किया, उन परशुराम-