गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
गीतावली ४४० [ ३५ ] मुनिबर करि छठी कीन्ही बारहेंकी रीति । बन-बसन पहिराइ तापस, तोषि पोषे प्रीति ॥ १ ॥ नामकरन सुअन्नप्रासन बेद बांधी नीति । समय सब रिषिराज करत समाज साज समीति ॥ २ ॥ बाल लालहि, कहहिं 'करिहैं राज सब जग जीति ।' राम-सिय-सुत, गुर-अनुग्रह, उचित, अचल प्रतीति ॥ ३ ॥ निरखि बाल-विनोद तुलसी जात बासर बीति । पिय-चरित सिय-चित-चितेरो लिखत नित हित भीति ॥ ४ ॥ मुनिवर वाल्मीकिने बालकोंकी छठी करके बारहवें दिनकी रीति की। उस दिन उन्होंने तपस्वियोंको वनके वस्त्र पहनाकर प्रीतिपूर्वक सन्तुष्ट किया ॥ १ ॥ वेदने जो नामकरण और अन्न- प्राशन आदिका नियम बांधा है, ऋषिराज वाल्मीकिजीने समाज और साजको जोड़कर समय-समयपर वे सभी कृत्य किये ॥ २ ॥ बालकोंको खेलाते समय वे कहते थे, 'ये तो सारे जगत्को जीतकर राज्य करेंगे।' वे बालक प्रथम तो श्रीराम और सीताके पुत्र हैं, दूसरे उनपर गुरुजीकी भी खूब कृपा है; इसलिये उनके लिये यह उचित ही है और सब लोगोंको भी यही विश्वास होता था ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, सीताजीके दिन तो बालकोंके चरित्र देखनेमें निकल जाया करते थे तथापि उनका चित्तरूप चित्रकार प्रेमरूप भित्तिपर प्रियतमके चरित्र बराबर चित्रित करता रहता था ॥ ४ ॥
४४१ उत्तरकाण्ड [३६] बालक सीयके बिहरत मुदित-मत दो भाइ। नाम लव-कुस राम-सिय अनुहरति सुंदरताइ ॥ १ ॥ देत मुनि मुनि-सिसु खिलौना, ते ले धरत दुराइ । खेल खेलत नृप-सिसुन्हके बालबृन्द बोलाइ ॥ २ ॥ भूप-भूषन-बसन-बाहन राज-साज सजाइ । बरम-चरम, कृपान-सर धनु-तून लेत बनाइ ॥ ३ ॥ दुखी सिय पिय-बिरह तुलसी, सुखी, सुत-सुख पाइ । आंच पय उफनात सींचत सलिल ज्यों सकुचाइ ॥ ४ ॥ सीताजीके बालक दोनों भाई प्रसन्नचित्तसे वनमें खेलते फिरते हैं। उनके नाम लव और कुश हैं; वे सुन्दरतामें भगवान् राम और सीताजीके ही समान हैं ॥ १ ॥ वाल्मीकि मुनि जब उन्हें मुनिबालकोंवाले खिलौने देते हैं तो वे उन्हें लेकर छिपाकर रख देते हैं। वे बहुत-से बालकोंको बुलाकर राजकुमारोंके-से खेल खेलते हैं ॥ २ ॥ वे राजाओंके-से आभूषण, वस्त्र, वाहन और राजसामग्री सजाते हैं तथा कवच, ढाल, तलवार, बाण, धनुष और तरकस भी बना लेते हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, सीताजी पतिके वियोग- में तो दुखी हैं, किंतु पुत्रसुख पाकर प्रसन्न भी हैं, जिस प्रकार अग्नि- पर रखा हुआ दूध.उफनने लगता है, परंतु जलके छींटे लगते ही फिर बैठ जाता है ॥ ४ ॥ [३७] कंकेयी जौलौं जियति रही । तौलौं बात मातुसों मुंह भरि भरत न भूलि कही ॥ १ ॥ गी० २९—*
गीतावली ४४२ मानी राम अधिक जननीतें, जननिहु गँस न गही। सीय-लषन रिपुदवन राम-रुख लखि सबकी निबही ॥ २ ॥ लोक-बेद-मरजाद दोष-गुन-गति चित चख न चढ़ी। तुलसी भरत समुझि सुनि राखी राम-सनेह सही ॥ ३ ॥ कैकेयी जबतक जीवित रही, तबतक सीताजीने भूलकर भी अपनी मातासे मुंह खोलकर बात नहीं की ॥ १ ॥ किंतु रामचन्द्रजीने उसे अपनी मातासे बढ़कर माना और माता कौसल्याने भी उससे किसी प्रकारका मनमुटाव नहीं रखा। रामचन्द्रजीका रुख देखकर सीता, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न—इन सबने भी उसका निर्वाह किया ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भरतजीने तो रामप्रेमको ही सुन और समझकर उसीकी रक्षा की। उन्होंने लोक या वेदकी मर्यादा अथवा गुण-दोषकी गतिकी ओर न तो कभी चित्त ही लगाया और न दृष्टिपात ही किया ॥ ३ ॥ रामचरितका उल्लेख राग रामकली [३८] रघुनाथ तुम्हारे चरित मनोहर गावहिं सकल अवधबासी। अति उदार अवतार मनुज-वपु धरे ब्रह्म अज अबिनासी ॥ १ ॥ प्रथम ताड़का पति, सुबाहु-बधि मख राख्यो, द्विज-हितकारी। देखि दुखी अति सिला सापबस रघुपति बिप्रनारि तारी ॥ २ ॥ सब भूपनको गरब हरयो, भंज्यो संभु-चाप भारी। जनकसुता समेत आवत गृह परसुराम अति मदहारी ॥ ३ ॥ तात-बचन तजि राज-काज सुर चित्रकूट मुनिबेष धरयो। एक नयन कीन्हों सुरपति-सुत, बधि बिराधरिषि-सोक हरयो ॥ ४॥
४४३ | उत्तरकाण्ड
पंचबटी पावन राघव करि सूपनखा कुरुप कीन्ही । खर-दूषन संहारे कपटमृग-गीधराज कहँ गति दीन्ही ॥ ५ ॥ हति कबंध, सुग्रीव सखा करि, बेधे ताल, बालि मारचो । बानर रीछ सहाय, अनुज सँग सिंधु बाँधि जस बिस्तारयो ॥ ६ ॥ सकुल पुत्र बल सहित दसानन मारि अखिल सुर-दुख टारयो । परमसाधु जिय जानि बिभीषन लंकापुरी तिलक सारयो ॥ ७ ॥ सीता अरु लछिमन सँग लीन्हे औरहु जिते दास आए । नगर निकट बिमान आए, सब नर-नारी देखत धाए ॥ ८ ॥ सिद्ध-बिरंचि, सुक-नारदादि मुनि अस्तुति करत बिमल बानी । चौदह भुवन चराचर हरषित, आए राम राजधानी ॥ ९ ॥ मिले भरत, जननी, गुरु, परिजन, चाहत परम अनंद भरे । दुसह-बियोग-जनित, दारुन दुख रामचरन देखत बिसरे ॥ १० ॥ बेद-पुरान बिचारि लगन सुभ महाराज अभिषेक कियो । तुलसिदास जिय जानि सुअवसर भगति-दान तब माँगि लियो ॥११॥ हे रघुनाथजी ! आप परम उदार और अवताररूपसे मनुष्यदेह धारण किये अजन्मा और अविनाशी परब्रह्म ही हैं। आपके पवित्र चरित्रोंको समस्त अयोध्यावासी इस प्रकार गाते हैं—॥ १ ॥ विप्रहितकारी भगवान् रामने पहले ताड़काको मार और सुबाहुका वध करके विश्वामित्रजीके यज्ञकी रक्षा की, फिर शापके कारण शिलारूप अहल्याको बहुत दुखी देखकर उसका उद्धार किया ॥ २ ॥ जनकपुरमें शिवजीका भारी धनुष तोड़कर सब राजाओंका गर्व दूर किया, फिर सीताजीके सहित घरको लौटते समय परशुरामजी- का मान मर्दन किया ॥ ३ ॥ तदनन्तर पिताजीके वचनसे राज्य त्याग कर देवताओंका कार्य करनेके लिये मुनिवेष धारणकर चित्रकूट पर्वतपर रहे । वहाँ इन्द्रके पुत्र जयन्तको एक नेत्रवाला बनाया तथा विराधका वध करके ऋषियोंका शोक दूर किया ॥ ४ ॥ फिर
गीतावली ४१४ रामचन्द्रजीने पंचवटीको पवित्र कर शूर्पणखाको कुरूप किया तथा खर, दूषणको मारकर मारीच तथा जटायुको शुभ गति दी ॥ ५ ॥ वहाँसे चलकर कबन्धका वधकिया तथा सुग्रीवसे मित्रता कर तालवृक्षोंको बेधकर बालिका वध किया । फिर रीछ और वानरोंकी सहायतासे भाई लक्ष्मणके सहित समुद्रपर पुल बाँधकर अपना सुयश फैलाया ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् रावणको उसके कुटुम्ब और पुत्रोंके सहित मारकर देवताओंका सारा दुःख दूर किया और अपने हृदयमें विभीषणको अत्यन्त साधु जान लंकापुरीमें उसका राज्याभिषेक किया ॥ ७ ॥ फिर सीता, लक्ष्मण---और जितने सेवक साथमें आये थे, उन सबको संग लेकर विमानपर अयोध्यापुरीके निकट आये । उस समय सब स्त्री-पुरुष भगवान्का दर्शन करनेके लिये दौड़े गये ॥ ८ ॥ तब चौदहों लोकोंके सम्पूर्ण चराचर प्राणी आनन्दित हो गये तथा शिव, ब्रह्मा, शुकदेव और नारदादि मुनिगण विमल वाक्योंसे स्तुति करते हुए भगवान् रामकी राजधानी अयोध्यापुरीमें आये ॥ ९ ॥ उस समय रामदर्शनके लिये लालायित भरतजी, सब माताएँ, गुरुजी और परिवारके लोग अति आनन्दमें भरकर मिले । उनके दुःसह वियोग-जनित दारुण दुःख भगवान् रामके चरण देखते ही विस्मृत हो गये ॥ १० ॥ तब वसिष्ठजीने वेद और पुराणसे विचारकर शुभलग्नमें भगवान्का राज्याभिषेककिया । उसी समय तुलसीदासने अपने हृदयमें सुअवसर जानकर प्रभुसे भक्ति- का दान माँग लिया ॥ ११ ॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु
(मुहर) तुलसी दास बरसिहपुर-गोरखपुर
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नाहिन भजिबे जोग बियो । श्रीरघुवीर समान आन को पूरन कृपा हियो ॥ १ ॥ कहहु कौन सुर सिला तारि पुनि केवट मीत कियो ? कौने गीध अधमको पितु-ज्यों निजकर पिंड दियो ? ॥ २ ॥ कौन देव सबरीके फल करि भोजन सलिल पियो ? बालित्रास-वारिधि बूड़त कपि केहि गहि बाँह लियो ? ३ ॥ भजन प्रभाउ बिभीषन भाष्यौ, सुनि कपि-कटक जियो। तुलसिदासको प्रभु कोसलपति सब प्रकार वरियो ॥ ४ ॥ ( गीतावली )