गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४१ उत्तरकाण्ड [३६] बालक सीयके बिहरत मुदित-मत दो भाइ। नाम लव-कुस राम-सिय अनुहरति सुंदरताइ ॥ १ ॥ देत मुनि मुनि-सिसु खिलौना, ते ले धरत दुराइ । खेल खेलत नृप-सिसुन्हके बालबृन्द बोलाइ ॥ २ ॥ भूप-भूषन-बसन-बाहन राज-साज सजाइ । बरम-चरम, कृपान-सर धनु-तून लेत बनाइ ॥ ३ ॥ दुखी सिय पिय-बिरह तुलसी, सुखी, सुत-सुख पाइ । आंच पय उफनात सींचत सलिल ज्यों सकुचाइ ॥ ४ ॥ सीताजीके बालक दोनों भाई प्रसन्नचित्तसे वनमें खेलते फिरते हैं। उनके नाम लव और कुश हैं; वे सुन्दरतामें भगवान् राम और सीताजीके ही समान हैं ॥ १ ॥ वाल्मीकि मुनि जब उन्हें मुनिबालकोंवाले खिलौने देते हैं तो वे उन्हें लेकर छिपाकर रख देते हैं। वे बहुत-से बालकोंको बुलाकर राजकुमारोंके-से खेल खेलते हैं ॥ २ ॥ वे राजाओंके-से आभूषण, वस्त्र, वाहन और राजसामग्री सजाते हैं तथा कवच, ढाल, तलवार, बाण, धनुष और तरकस भी बना लेते हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, सीताजी पतिके वियोग- में तो दुखी हैं, किंतु पुत्रसुख पाकर प्रसन्न भी हैं, जिस प्रकार अग्नि- पर रखा हुआ दूध.उफनने लगता है, परंतु जलके छींटे लगते ही फिर बैठ जाता है ॥ ४ ॥ [३७] कंकेयी जौलौं जियति रही । तौलौं बात मातुसों मुंह भरि भरत न भूलि कही ॥ १ ॥ गी० २९—*