गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४४२ मानी राम अधिक जननीतें, जननिहु गँस न गही। सीय-लषन रिपुदवन राम-रुख लखि सबकी निबही ॥ २ ॥ लोक-बेद-मरजाद दोष-गुन-गति चित चख न चढ़ी। तुलसी भरत समुझि सुनि राखी राम-सनेह सही ॥ ३ ॥ कैकेयी जबतक जीवित रही, तबतक सीताजीने भूलकर भी अपनी मातासे मुंह खोलकर बात नहीं की ॥ १ ॥ किंतु रामचन्द्रजीने उसे अपनी मातासे बढ़कर माना और माता कौसल्याने भी उससे किसी प्रकारका मनमुटाव नहीं रखा। रामचन्द्रजीका रुख देखकर सीता, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न—इन सबने भी उसका निर्वाह किया ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भरतजीने तो रामप्रेमको ही सुन और समझकर उसीकी रक्षा की। उन्होंने लोक या वेदकी मर्यादा अथवा गुण-दोषकी गतिकी ओर न तो कभी चित्त ही लगाया और न दृष्टिपात ही किया ॥ ३ ॥ रामचरितका उल्लेख राग रामकली [३८] रघुनाथ तुम्हारे चरित मनोहर गावहिं सकल अवधबासी। अति उदार अवतार मनुज-वपु धरे ब्रह्म अज अबिनासी ॥ १ ॥ प्रथम ताड़का पति, सुबाहु-बधि मख राख्यो, द्विज-हितकारी। देखि दुखी अति सिला सापबस रघुपति बिप्रनारि तारी ॥ २ ॥ सब भूपनको गरब हरयो, भंज्यो संभु-चाप भारी। जनकसुता समेत आवत गृह परसुराम अति मदहारी ॥ ३ ॥ तात-बचन तजि राज-काज सुर चित्रकूट मुनिबेष धरयो। एक नयन कीन्हों सुरपति-सुत, बधि बिराधरिषि-सोक हरयो ॥ ४॥