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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

गीतावली ४४२ मानी राम अधिक जननीतें, जननिहु गँस न गही। सीय-लषन रिपुदवन राम-रुख लखि सबकी निबही ॥ २ ॥ लोक-बेद-मरजाद दोष-गुन-गति चित चख न चढ़ी। तुलसी भरत समुझि सुनि राखी राम-सनेह सही ॥ ३ ॥ कैकेयी जबतक जीवित रही, तबतक सीताजीने भूलकर भी अपनी मातासे मुंह खोलकर बात नहीं की ॥ १ ॥ किंतु रामचन्द्रजीने उसे अपनी मातासे बढ़कर माना और माता कौसल्याने भी उससे किसी प्रकारका मनमुटाव नहीं रखा। रामचन्द्रजीका रुख देखकर सीता, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न—इन सबने भी उसका निर्वाह किया ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भरतजीने तो रामप्रेमको ही सुन और समझकर उसीकी रक्षा की। उन्होंने लोक या वेदकी मर्यादा अथवा गुण-दोषकी गतिकी ओर न तो कभी चित्त ही लगाया और न दृष्टिपात ही किया ॥ ३ ॥ रामचरितका उल्लेख राग रामकली [३८] रघुनाथ तुम्हारे चरित मनोहर गावहिं सकल अवधबासी। अति उदार अवतार मनुज-वपु धरे ब्रह्म अज अबिनासी ॥ १ ॥ प्रथम ताड़का पति, सुबाहु-बधि मख राख्यो, द्विज-हितकारी। देखि दुखी अति सिला सापबस रघुपति बिप्रनारि तारी ॥ २ ॥ सब भूपनको गरब हरयो, भंज्यो संभु-चाप भारी। जनकसुता समेत आवत गृह परसुराम अति मदहारी ॥ ३ ॥ तात-बचन तजि राज-काज सुर चित्रकूट मुनिबेष धरयो। एक नयन कीन्हों सुरपति-सुत, बधि बिराधरिषि-सोक हरयो ॥ ४॥

४४३ | उत्तरकाण्ड

पंचबटी पावन राघव करि सूपनखा कुरुप कीन्ही । खर-दूषन संहारे कपटमृग-गीधराज कहँ गति दीन्ही ॥ ५ ॥ हति कबंध, सुग्रीव सखा करि, बेधे ताल, बालि मारचो । बानर रीछ सहाय, अनुज सँग सिंधु बाँधि जस बिस्तारयो ॥ ६ ॥ सकुल पुत्र बल सहित दसानन मारि अखिल सुर-दुख टारयो । परमसाधु जिय जानि बिभीषन लंकापुरी तिलक सारयो ॥ ७ ॥ सीता अरु लछिमन सँग लीन्हे औरहु जिते दास आए । नगर निकट बिमान आए, सब नर-नारी देखत धाए ॥ ८ ॥ सिद्ध-बिरंचि, सुक-नारदादि मुनि अस्तुति करत बिमल बानी । चौदह भुवन चराचर हरषित, आए राम राजधानी ॥ ९ ॥ मिले भरत, जननी, गुरु, परिजन, चाहत परम अनंद भरे । दुसह-बियोग-जनित, दारुन दुख रामचरन देखत बिसरे ॥ १० ॥ बेद-पुरान बिचारि लगन सुभ महाराज अभिषेक कियो । तुलसिदास जिय जानि सुअवसर भगति-दान तब माँगि लियो ॥११॥ हे रघुनाथजी ! आप परम उदार और अवताररूपसे मनुष्यदेह धारण किये अजन्मा और अविनाशी परब्रह्म ही हैं। आपके पवित्र चरित्रोंको समस्त अयोध्यावासी इस प्रकार गाते हैं—॥ १ ॥ विप्रहितकारी भगवान् रामने पहले ताड़काको मार और सुबाहुका वध करके विश्वामित्रजीके यज्ञकी रक्षा की, फिर शापके कारण शिलारूप अहल्याको बहुत दुखी देखकर उसका उद्धार किया ॥ २ ॥ जनकपुरमें शिवजीका भारी धनुष तोड़कर सब राजाओंका गर्व दूर किया, फिर सीताजीके सहित घरको लौटते समय परशुरामजी- का मान मर्दन किया ॥ ३ ॥ तदनन्तर पिताजीके वचनसे राज्य त्याग कर देवताओंका कार्य करनेके लिये मुनिवेष धारणकर चित्रकूट पर्वतपर रहे । वहाँ इन्द्रके पुत्र जयन्तको एक नेत्रवाला बनाया तथा विराधका वध करके ऋषियोंका शोक दूर किया ॥ ४ ॥ फिर

गीतावली ४१४ रामचन्द्रजीने पंचवटीको पवित्र कर शूर्पणखाको कुरूप किया तथा खर, दूषणको मारकर मारीच तथा जटायुको शुभ गति दी ॥ ५ ॥ वहाँसे चलकर कबन्धका वधकिया तथा सुग्रीवसे मित्रता कर तालवृक्षोंको बेधकर बालिका वध किया । फिर रीछ और वानरोंकी सहायतासे भाई लक्ष्मणके सहित समुद्रपर पुल बाँधकर अपना सुयश फैलाया ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् रावणको उसके कुटुम्ब और पुत्रोंके सहित मारकर देवताओंका सारा दुःख दूर किया और अपने हृदयमें विभीषणको अत्यन्त साधु जान लंकापुरीमें उसका राज्याभिषेक किया ॥ ७ ॥ फिर सीता, लक्ष्मण---और जितने सेवक साथमें आये थे, उन सबको संग लेकर विमानपर अयोध्यापुरीके निकट आये । उस समय सब स्त्री-पुरुष भगवान्‌का दर्शन करनेके लिये दौड़े गये ॥ ८ ॥ तब चौदहों लोकोंके सम्पूर्ण चराचर प्राणी आनन्दित हो गये तथा शिव, ब्रह्मा, शुकदेव और नारदादि मुनिगण विमल वाक्योंसे स्तुति करते हुए भगवान् रामकी राजधानी अयोध्यापुरीमें आये ॥ ९ ॥ उस समय रामदर्शनके लिये लालायित भरतजी, सब माताएँ, गुरुजी और परिवारके लोग अति आनन्दमें भरकर मिले । उनके दुःसह वियोग-जनित दारुण दुःख भगवान् रामके चरण देखते ही विस्मृत हो गये ॥ १० ॥ तब वसिष्ठजीने वेद और पुराणसे विचारकर शुभलग्नमें भगवान्‌का राज्याभिषेककिया । उसी समय तुलसीदासने अपने हृदयमें सुअवसर जानकर प्रभुसे भक्ति- का दान माँग लिया ॥ ११ ॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु

(मुहर) तुलसी दास बरसिहपुर-गोरखपुर

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Sri Ramakrishna Ashram L I B R A R Y SRINAGAR ⎯⎯ Extract from the Rules :-

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नाहिन भजिबे जोग बियो । श्रीरघुवीर समान आन को पूरन कृपा हियो ॥ १ ॥ कहहु कौन सुर सिला तारि पुनि केवट मीत कियो ? कौने गीध अधमको पितु-ज्यों निजकर पिंड दियो ? ॥ २ ॥ कौन देव सबरीके फल करि भोजन सलिल पियो ? बालित्रास-वारिधि बूड़त कपि केहि गहि बाँह लियो ? ३ ॥ भजन प्रभाउ बिभीषन भाष्यौ, सुनि कपि-कटक जियो। तुलसिदासको प्रभु कोसलपति सब प्रकार वरियो ॥ ४ ॥ ( गीतावली )