गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४३ | उत्तरकाण्ड
पंचबटी पावन राघव करि सूपनखा कुरुप कीन्ही । खर-दूषन संहारे कपटमृग-गीधराज कहँ गति दीन्ही ॥ ५ ॥ हति कबंध, सुग्रीव सखा करि, बेधे ताल, बालि मारचो । बानर रीछ सहाय, अनुज सँग सिंधु बाँधि जस बिस्तारयो ॥ ६ ॥ सकुल पुत्र बल सहित दसानन मारि अखिल सुर-दुख टारयो । परमसाधु जिय जानि बिभीषन लंकापुरी तिलक सारयो ॥ ७ ॥ सीता अरु लछिमन सँग लीन्हे औरहु जिते दास आए । नगर निकट बिमान आए, सब नर-नारी देखत धाए ॥ ८ ॥ सिद्ध-बिरंचि, सुक-नारदादि मुनि अस्तुति करत बिमल बानी । चौदह भुवन चराचर हरषित, आए राम राजधानी ॥ ९ ॥ मिले भरत, जननी, गुरु, परिजन, चाहत परम अनंद भरे । दुसह-बियोग-जनित, दारुन दुख रामचरन देखत बिसरे ॥ १० ॥ बेद-पुरान बिचारि लगन सुभ महाराज अभिषेक कियो । तुलसिदास जिय जानि सुअवसर भगति-दान तब माँगि लियो ॥११॥ हे रघुनाथजी ! आप परम उदार और अवताररूपसे मनुष्यदेह धारण किये अजन्मा और अविनाशी परब्रह्म ही हैं। आपके पवित्र चरित्रोंको समस्त अयोध्यावासी इस प्रकार गाते हैं—॥ १ ॥ विप्रहितकारी भगवान् रामने पहले ताड़काको मार और सुबाहुका वध करके विश्वामित्रजीके यज्ञकी रक्षा की, फिर शापके कारण शिलारूप अहल्याको बहुत दुखी देखकर उसका उद्धार किया ॥ २ ॥ जनकपुरमें शिवजीका भारी धनुष तोड़कर सब राजाओंका गर्व दूर किया, फिर सीताजीके सहित घरको लौटते समय परशुरामजी- का मान मर्दन किया ॥ ३ ॥ तदनन्तर पिताजीके वचनसे राज्य त्याग कर देवताओंका कार्य करनेके लिये मुनिवेष धारणकर चित्रकूट पर्वतपर रहे । वहाँ इन्द्रके पुत्र जयन्तको एक नेत्रवाला बनाया तथा विराधका वध करके ऋषियोंका शोक दूर किया ॥ ४ ॥ फिर