गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४१४ रामचन्द्रजीने पंचवटीको पवित्र कर शूर्पणखाको कुरूप किया तथा खर, दूषणको मारकर मारीच तथा जटायुको शुभ गति दी ॥ ५ ॥ वहाँसे चलकर कबन्धका वधकिया तथा सुग्रीवसे मित्रता कर तालवृक्षोंको बेधकर बालिका वध किया । फिर रीछ और वानरोंकी सहायतासे भाई लक्ष्मणके सहित समुद्रपर पुल बाँधकर अपना सुयश फैलाया ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् रावणको उसके कुटुम्ब और पुत्रोंके सहित मारकर देवताओंका सारा दुःख दूर किया और अपने हृदयमें विभीषणको अत्यन्त साधु जान लंकापुरीमें उसका राज्याभिषेक किया ॥ ७ ॥ फिर सीता, लक्ष्मण---और जितने सेवक साथमें आये थे, उन सबको संग लेकर विमानपर अयोध्यापुरीके निकट आये । उस समय सब स्त्री-पुरुष भगवान्का दर्शन करनेके लिये दौड़े गये ॥ ८ ॥ तब चौदहों लोकोंके सम्पूर्ण चराचर प्राणी आनन्दित हो गये तथा शिव, ब्रह्मा, शुकदेव और नारदादि मुनिगण विमल वाक्योंसे स्तुति करते हुए भगवान् रामकी राजधानी अयोध्यापुरीमें आये ॥ ९ ॥ उस समय रामदर्शनके लिये लालायित भरतजी, सब माताएँ, गुरुजी और परिवारके लोग अति आनन्दमें भरकर मिले । उनके दुःसह वियोग-जनित दारुण दुःख भगवान् रामके चरण देखते ही विस्मृत हो गये ॥ १० ॥ तब वसिष्ठजीने वेद और पुराणसे विचारकर शुभलग्नमें भगवान्का राज्याभिषेककिया । उसी समय तुलसीदासने अपने हृदयमें सुअवसर जानकर प्रभुसे भक्ति- का दान माँग लिया ॥ ११ ॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु
(मुहर) तुलसी दास बरसिहपुर-गोरखपुर