गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३८ पढ़ने लगे। आकाशसे फूलोंकी झड़ी लग गयी तथा जय-जयकारके सहित बहुत-से बाजे बजने लगे ॥१६॥ लङ्कामें अमङ्गल होने लगे, तरह-तरहकी शङ्काएँ और आपत्तियाँ उमड़ आयीं; किन्तु चौदहों भुवनके बड़े-बड़े दुःख और दारिद्र्य दूर हो गये ॥ १७ ॥ अथर्व- वेदी वसिष्ठजीने बालककी ओर देखकर हँसते हुए भगवान् शङ्करको बतलाया [कि तुम्हारे इष्टदेव ये ही हैं] और उनका, शुभके लिये भी शुभ तथा आनन्दके भी आनन्ददायक 'राम' नाम सुनाया ॥ १८ ॥ श्रीकौसल्याजी सुन्दर आलवाल (वृक्षका थाला) हैं, ('राम' नामके) दो अक्षर सुन्दर दल हैं, मानो सकल आनन्दका कन्द ही अंकुरके रूपमें प्रकट हुआ है ॥ १९ ॥ [वसिष्ठजीने जो भगवान् शङ्करको यह सूचना दी थी कि ये आपके इष्टदेव हैं सो] शिवजीने उन्हे देखकर और पहचानकर भगवान्का नाम जपते हुए हाथ जोड़कर सिरके पास लगाया। उस समय देवताओंने आदरपूर्वक 'जय जय जय करुणानिधे' कहा ॥ २० ॥ हे सत्यसन्ध! आपने जो अक्षर कहे हैं वे सर्वदा सत्य हैं। हे प्रणतपाल! आपसे जिन-जिन फलोंकी इच्छा की है उन सभीको प्राप्त किया है॥ २१ ॥ उस समय ब्राह्मण और देवताओंको देखकर महाराज दशरथ बड़े आनन्दित हुए और अपने मन्त्री, सेवक, सखा, पटधारी और भण्डारीको बुलाकर कहा- ॥ २२ ॥ 'जाओ, जिसे जो चाहिये उसे सम्मान और सावधानीसे वही वस्तु दो।' तब वे हृदयमें हर्षित हो याचकोंको ढूँढ़-ढूँढ़कर तथा बुला-बुलाकर दान देने लगे ॥२३॥ सब लोग भगवान् रामकी निछावर लेनेके लिये हठपूर्वक भिखारी बन जाते हैं और फिर वे ही दान देते हुए