गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१ बालकाण्ड मनोहर तोतली बोली बोलकर मुझे 'माँ' कहकर बुलाओगे ॥ ३ ॥ अपनी मनोरथरूपी सुन्दर बेलको सफल हुई देख पुरवासी, मन्त्रि- मण्डल, राजा, रानी, सेवक, सखा और सहेलियाँ कब अपने नेत्रोंका लाभ लूटेंगी ?' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं कि जिस सुखकी लालसामें शिव, शुकदेव और सनकादि विरक्त जन भी लट्टू हुए रहते हैं उसी सुखसमुद्रमें कौसल्या भी मग्न हैं, तो भी उन्हें प्रेमकी प्यास लगी हुई है ॥ ५ ॥ [ ९ ] पगनि कब चलिहौ चारौ भैया ? प्रेम-पुलकि, उर लाइ सुवन सब, कहति सुमित्रा मैया ॥ १ ॥ सुंदर तनु सिसु-बसन-बिभूषन नखसिख निरखि निकैया । दलि तृन, प्रान निछावरि करि करि लैहैं मातु बलैया ॥ २ ॥ किलकनि, नटनि, चलनि, चितवनि, भजि मिलनि मनोहर तैया । मनि-खंभनि-प्रतिबिंब झलक, छबि छलकिहै भरि अँगनेया ॥ ३ ॥ बालबिनोद, मोद मंजुल बिधु, लीला ललित जुन्हैया । भूपति पुन्य-पयोधि उमँग, घर घर आनंद बधैया ॥ ४ ॥ व्हैहैं सकल सुकृत-सुख-भाजन, लोचन-लाहु लुटैया । अनायास पाइहैं जनमफल तोतरें बचन सुनैया ॥ ५ ॥ भरत, राम, रिपुदवन, लखनके चरित-सरित अन्हवैया । तुलसी तबके-से अजहुँ जानिबे रघुबर-नगर-बसैया ॥ ६ ॥ सुमित्रा मैया सब बालकोंको प्रेमपुलकित हो हृदयसे लगाकर कहती हैं—'तुम चारों भैया कब पैरों चलोगे ? ॥ १ ॥ तुम्हारे सुन्दर शरीरोंपर बालोचित वस्त्राभूषण तथा नखसिखकी सुन्दरता देख माताएँ [ नजर न लग जाय, इसलिये ] तिनका तोड़ेंगी और प्राण