भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 46

गीतावली ४० प्रेमामृत पानकर पुलकित होती हैं ॥२॥ ब्रह्मा, महादेव, ऋषि और देवता—ये सभी बालकोंकी ओटमें छिपे-छिपे प्रसन्न होकर देख रहे हैं किन्तु तुलसीदासजी कहते हैं कि रघुनाथजीका ऐसा सुख तो [कौसल्याको छोड़कर] और किसीको नहीं मिला ॥३॥ राग सोरठ [ ८ ] ह्वै हौ लाल कबहिं बड़े बलि मैया। राम-लषन भावते भरत-रिपुदवन चारु चारचो भैया ॥ १ ॥ बाल बिभूषन बसन मनोहर अंगनि बिरचि बनैहौं। सोभा निरखि, निछावरि करि, उर लाइ बारने जैहौं ॥ २ ॥ छगन-मगन अँगना खेलिहौ मिलि, ठुमुकु-ठुमुकु कब धैहौ। कलबल बचन तोतरे मंजुल कहि 'माँ' मोहि बुलैहौ ॥ ३ ॥ पुरजन-सचिव, राउ-रानी सब, सेवक-सखा-सहेली। लैहैं लोचन लाहु सुफल लखि ललित मनोरथ-बेली ॥ ४ ॥ जा सुखकी लालसा लटू सिव, सुक-सनकादि उदासी। तुलसी तेहि सुखसिंधु कौसिला मगन, पै प्रेम-पियासी ॥ ५ ॥ 'हे लाल ! मैया बलि जाती है, तुम कब बड़े होगे ? प्यारे राम, लक्ष्मण और भरत, शत्रुघ्न । तुम चारों सुन्दर भाई कब बड़े होगे॥१॥ऐसा कब होगा कि मैं तुम्हारे मनोहर अङ्गोंके लिये बालोचित आभूषण और वस्त्र बना-बनाकर उन्हे सजाऊँगी तथा उस शोभाको देखकर नाना प्रकारकी निछावर कर तुम्हें हृदयसे लगाकर वारी जाऊँगी ॥ २ ॥ तुम सब बालक मग्न हो मिल-जुलकर कब आँगनमें खेलोगे, कब ठुमुक-ठुमुककर दौड़ोगे तथा कब अति मधुर और