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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

गीतावली ४० प्रेमामृत पानकर पुलकित होती हैं ॥२॥ ब्रह्मा, महादेव, ऋषि और देवता—ये सभी बालकोंकी ओटमें छिपे-छिपे प्रसन्न होकर देख रहे हैं किन्तु तुलसीदासजी कहते हैं कि रघुनाथजीका ऐसा सुख तो [कौसल्याको छोड़कर] और किसीको नहीं मिला ॥३॥ राग सोरठ [ ८ ] ह्वै हौ लाल कबहिं बड़े बलि मैया। राम-लषन भावते भरत-रिपुदवन चारु चारचो भैया ॥ १ ॥ बाल बिभूषन बसन मनोहर अंगनि बिरचि बनैहौं। सोभा निरखि, निछावरि करि, उर लाइ बारने जैहौं ॥ २ ॥ छगन-मगन अँगना खेलिहौ मिलि, ठुमुकु-ठुमुकु कब धैहौ। कलबल बचन तोतरे मंजुल कहि 'माँ' मोहि बुलैहौ ॥ ३ ॥ पुरजन-सचिव, राउ-रानी सब, सेवक-सखा-सहेली। लैहैं लोचन लाहु सुफल लखि ललित मनोरथ-बेली ॥ ४ ॥ जा सुखकी लालसा लटू सिव, सुक-सनकादि उदासी। तुलसी तेहि सुखसिंधु कौसिला मगन, पै प्रेम-पियासी ॥ ५ ॥ 'हे लाल ! मैया बलि जाती है, तुम कब बड़े होगे ? प्यारे राम, लक्ष्मण और भरत, शत्रुघ्न । तुम चारों सुन्दर भाई कब बड़े होगे॥१॥ऐसा कब होगा कि मैं तुम्हारे मनोहर अङ्गोंके लिये बालोचित आभूषण और वस्त्र बना-बनाकर उन्हे सजाऊँगी तथा उस शोभाको देखकर नाना प्रकारकी निछावर कर तुम्हें हृदयसे लगाकर वारी जाऊँगी ॥ २ ॥ तुम सब बालक मग्न हो मिल-जुलकर कब आँगनमें खेलोगे, कब ठुमुक-ठुमुककर दौड़ोगे तथा कब अति मधुर और

४१ बालकाण्ड मनोहर तोतली बोली बोलकर मुझे 'माँ' कहकर बुलाओगे ॥ ३ ॥ अपनी मनोरथरूपी सुन्दर बेलको सफल हुई देख पुरवासी, मन्त्रि- मण्डल, राजा, रानी, सेवक, सखा और सहेलियाँ कब अपने नेत्रोंका लाभ लूटेंगी ?' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं कि जिस सुखकी लालसामें शिव, शुकदेव और सनकादि विरक्त जन भी लट्टू हुए रहते हैं उसी सुखसमुद्रमें कौसल्या भी मग्न हैं, तो भी उन्हें प्रेमकी प्यास लगी हुई है ॥ ५ ॥ [ ९ ] पगनि कब चलिहौ चारौ भैया ? प्रेम-पुलकि, उर लाइ सुवन सब, कहति सुमित्रा मैया ॥ १ ॥ सुंदर तनु सिसु-बसन-बिभूषन नखसिख निरखि निकैया । दलि तृन, प्रान निछावरि करि करि लैहैं मातु बलैया ॥ २ ॥ किलकनि, नटनि, चलनि, चितवनि, भजि मिलनि मनोहर तैया । मनि-खंभनि-प्रतिबिंब झलक, छबि छलकिहै भरि अँगनेया ॥ ३ ॥ बालबिनोद, मोद मंजुल बिधु, लीला ललित जुन्हैया । भूपति पुन्य-पयोधि उमँग, घर घर आनंद बधैया ॥ ४ ॥ व्हैहैं सकल सुकृत-सुख-भाजन, लोचन-लाहु लुटैया । अनायास पाइहैं जनमफल तोतरें बचन सुनैया ॥ ५ ॥ भरत, राम, रिपुदवन, लखनके चरित-सरित अन्हवैया । तुलसी तबके-से अजहुँ जानिबे रघुबर-नगर-बसैया ॥ ६ ॥ सुमित्रा मैया सब बालकोंको प्रेमपुलकित हो हृदयसे लगाकर कहती हैं—'तुम चारों भैया कब पैरों चलोगे ? ॥ १ ॥ तुम्हारे सुन्दर शरीरोंपर बालोचित वस्त्राभूषण तथा नखसिखकी सुन्दरता देख माताएँ [ नजर न लग जाय, इसलिये ] तिनका तोड़ेंगी और प्राण

गीतावली ४२ निछावर कर बलैया लेंगी ॥ २ ॥ तुम्हारे किलकने, नाचने, चलने, देखने और दौड़कर मिलनेकी मनोहरतासे तथा मणिमय खम्भोंमें तुम्हारा प्रतिबिम्ब पड़नेसे आँगनमें छवि छलकने लगेगी ॥ ३ ॥ तुम्हारे बालविनोदके आनन्दरूप मनोहर चन्द्रकी ललित लीला रूप चन्द्रिकासे महाराज दशरथका पुण्यरूप समुद्र उमड़ेगा और घर- घरमें आनन्द-बधाई होने लगेगी ॥ ४ ॥ सभी लोग नेत्रोंका आनन्द लूटकर पुण्य और सुखके भाजन होंगे तथा तुम्हारी तोतली बोली सुननेवाले अनायास ही अपने जन्मका फल पा लेंगे' ॥ ५ ॥ तुलसी दासजी कहते हैं कि राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नके चरितरूप सरितामें स्नान करनेवाले जैसे तत्कालीन अवधवासी थे वैसे ही आज के भी समझने चाहिये ॥ ६॥ राग केदारा [ १० ] चुपिरि उबटि अन्हवाइकै नयन आँजे, चिर रुचि तिलक गोरोचनको कियो है। भ्रूपर अनूप मसिबिंदु, बारे बाढ बार बिलसत सीसपर, हेरि हरै हियो है ॥ १ ॥ मोदभरी गोद लिये लालति सुमित्रा देखि देव कहैं, सबको सुकृत उपचियो है। मातु, पितु, प्रिय, परिजन, पुरजन धन्य, पुन्यपुंज पेखि पेखि प्रेमरस पियो है ॥ २ ॥ लोहित ललित लघु चरन-कमल चारु, चाल चाहि सो छवि सुकबि जिय जियो है। बालकेलि बातबस झलकि झलमलत सोभाकी दीयटि मानो रूप-दीप दियो है ॥ ३ ॥

४३ बालकाण्ड राम-सिसु सानुज चरित चारु गाइ-सुनि सुजनन सादर जनम-लाहु लियो है। तुलसी बिहाइ दसरथ दसचारिपुर ऐसे सुखजोग बिधि बिरच्यो न बियो है ॥ ४ ॥ माताओंने बालकोंको तेल और उबटन लगाकर स्नान कराया और फिर नेत्रोंको आंजकर अति प्रीतिपूर्वक गोरोचनका तिलक लगाया। भृकुटिपर अति अनुपम काजरकी बिन्दी लगायी। शीशपर छोटे-छोटे बाल सुशोभित हैं, जो देखनेवालेके चित्त को हर लेते हैं॥ १॥ सुमित्राको अति आनन्दपूर्वक बालकोंको गोदमें लेकर दुलार करते देख देवगण कहते हैं, इस समय सभीका पुण्य प्रकट हुआ है। ये माता, पिता, प्रिय परिजन और पुरवासीलोग धन्य हैं, जो अपने पुण्यपुञ्ज भगवान् रामको देख-देखकर प्रेमरस पान कर रहे हैं॥ २॥ इनके अति ललित और लाल-लाल नन्हें-नन्हें चरण- कमल तथा सुहावनी चालकी छबिको देखकर ही सुकविजनों का हृदय जीवित रहता है। बालचापल्ययुक्त भगवान् राम ऐसे जान पड़ते हैं, मानो शोभाकी दीवटपर रूपमय दीपक बालकेलिरूप वायुके झकोरोंसे झिलमिला रहा हो ॥ ३ ॥ सत्पुरुषोंने आदरपूर्वक अनुज- सहित बालक रामका चरित्र गा-सुनकर अपने जन्म का लाभ पाया है। तुलसीदासजी कहते हैं कि ब्रह्माने महाराज दशरथ को छोड़कर ऐसा सुखका योग चौदहों भुवनमें और कहीं नहीं रचा ॥ ४ ॥ [ ११ ] राम-सिसु गोद महामोद भरे दसरथ कौसिलाहु ललकि लषनलाल लये हैं।

गीतावली ४४ भरत सुमित्रा लये, कैकयी सत्रुसमन, तन प्रेम-पुलक मगन मन भये हैं ॥ १ ॥ मेढ़ी लटकन मनि-कनक-रचित, बाल- भूषन बनाइ आछे अंग अंग ठये हैं। चाहि चुचुकारि चूमि लालत लावत उर तैसे फल पावत जैसे सुबीज बये हैं ॥ २ ॥ घन-ओट बिबुध बिलोकि बरषत फूल अनुकूल बचन कहत नेह नये हैं। ऐसे पितु, मातु, पूत, त्रिय, परिजन बिधि जानियत आयु भरि येई निरमये हैं ॥ ३ ॥ 'अजर अमर होहु', 'करौ हरिहर छोहु' जरठ जठेरिन्ह आसिरबाद दये हैं। तुलसी सराहँ भाग तिन्हके, जिन्हके हिये डिंभ-रामरूप-अनुराग रंग रये हैं ॥ ४ ॥ बालक रामको गोदमें लेकर महाराज दशरथ बड़े आनन्दमें भरे हुए हैं, कौसल्या महारानीने भी ललककर लखनलालको ले लिया है तथा सुमित्राने भरतको और कैकेयीने शत्रुघ्नको उठा लिया है। इस समय उनका तन प्रेमसे पुलकित एवं मन आनन्दमग्न हो रहा है ॥ १ ॥ बालोंको गुहकर बनायी हुई चोटीमें मणि और सुवर्णके लटकन लटक रहे हैं और बालकोंके उपयुक्त अच्छे-अच्छे आभूषण बनाकर अङ्ग-अङ्गमें सजाये गये हैं। माता-पिता प्रेमपूर्वक देखकर और चुचकार-चुचकारकर तथा बालकोंको चूमकर लाड़ करते और हृदयसे लगा लेते हैं। उन्होंने जैसे सुन्दर बीज बोये हैं, वैसे ही फल पा रहे हैं॥ २ ॥ देवतालोग बादलोंकी ओटमेंसे यह कौतुक देखकर

४५ बालकाण्ड फूल बरसाते हैं और नवीन नेहसे युक्त साधुवाद कहते हैं कि मानो विधाताने अपने जीवनभरमें इन्हीं माता, पिता, पुत्र, सुहृद् और परिजनोंको रचा है ॥ ३ ॥ बड़ी आयुके स्त्री-पुरुष आशीर्वाद देते हैं कि 'तुम अजर-अमर होओ, भगवान् विष्णु और महादेवजी तुम- पर सदा दयादृष्टि रक्खें।' तुलसीदास कहते हैं कि वे उनके भाग्यकी सराहना करते हैं जिनके मन बालरूप रामके अनुरागमें रँगे हुए हैं ॥ ४ ॥ राग आसावरी [ १२ ] 'आजु अनरसे हैं भोरके, पय पिय पियत न नीके । रहत न बैठे, ठाढ़े, पालने झुलावत हू, रोवत राममेरो सो सोच सबहीके ॥ १ ॥ देव, पितर, ग्रह पूजिये तुला तौलिये घीके। तदपि कबहुँ कबहुँक सखी ऐसेहि अरत जब परत दृष्टि दुष्ट तीके ॥ २ ॥ बेगि बोलि कुलगुरु, छुऔं माथे हाथ अभीके ।' सुनत आइ ऋषि कुस हरे नरसिंह मंत्र पढ़े, जो सुमिरत भय भीके ॥ ३ ॥ जासु नाम सरबस सदासिव-पारबतीके । ताहि झरावति कौसिला, यह रीति प्रीतिकी हिय हुलसति तुलसीके ॥ ४ ॥ [ कौसल्या कहती हैं, कि ] 'आज मेरे राम सबेरेसे ही अनमने हो रहे हैं, अच्छी तरह दूध भी नहीं पीते । आज बैठने, खड़े होने

और पालनेमें झुलानेसे भी नहीं रहते, बराबर रो रहे हैं। इससे मुझे तथा और सब लोगोंको बड़ी चिन्ता हो रही है ॥ १ ॥ देव, पितर और ग्रहोंकी पूजा की जाती है, घृतका तुलादान भी किया जाता है; तो भी हे सखि ! कभी-कभी जब किसी दुष्टा स्त्रीकी दृष्टि पड़ जाती है तो ऐसे ही मचल जाते हैं ॥ २ ॥ तुरन्त ही कुलगुरुको बुलाना चाहिये। वे अपने अमृतमय हाथोंसे बालकका मस्तक स्पर्श करें।' यह सुनते ही ऋषिवरने आकर कुशसे नृसिंहमन्त्र* पढ़कर झाड़-फूँक की; ऐसे मन्त्रसे जिस मन्त्रका स्मरण करनेसे भयको भी भय होता है ॥ ३ ॥ जिनका नाम सदाशिव और पार्वतीका सर्वस्व है उन्हींको कौसल्याजी झाड़-फूँक करा रही हैं ! प्रीतिकी इस रीतिको देखकर तुलसीदासके हृदयमें अति आनन्द होता है ॥ ४ ॥

[१३] माथे हाथ ऋषि जब दियो राम किलकन लागे। महिमा समुझि, लीला बिलोकि गुरु सजल नयन, तनु पुलक, रोम रोम जागे ॥ १ ॥ लिये गोद, धाए गोदतें, मोद मुनि मन अनुरागे। निरखि मातु हरषी हिये आली-ओट कहति मृदु बचन प्रेमके-से पागे ॥ २ ॥ तुम्ह सुरतरु रघुबंसके, देत अभिमत माँगे। मेरे बिसेषि गति रावरी, तुलसी प्रसाद जाके सकल अमंगल भागे ॥ ३ ॥


*ॐ नमो नृसिंहाय हिरण्यकशिपुवक्षःस्थलविदारणाय त्रिभुवनव्याप- काय भूतप्रेतपिशाचशाकिनीडाकिनीकीलनोन्मूलनाय स्तम्भोद्भव समस्त- दोषान् हन हन सर सर चल चल कम्प कम्प मथ मथ हुंफट् हुंफट् ठंठः महारुद्रजापित स्वाहा।

४७ बालकाण्ड जिस समय मुनिवरने रामके मस्तकपर हाथ रक्खा, उसी समय वे किलकने लगे। भगवान्‌की महिमाको जानकर और उनकी लीला देखकर गुरुजीके नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गया, रोमावली खड़ी हो गयी ॥ १ ॥ उन्होंने रामको गोदमें उठा लिया, किन्तु वे गोदसे उतरकर भाग गये। इससे मुनिवरका चित्त हर्षके कारण अति अनुरागमय हो गया। यह देखकर माता हृदयमें हर्षित हुईं और सखीकी ओटमें खड़ी होकर प्रेमपगे सुमधुर वचनोंमें कहने लगीं ॥ २ ॥ हे गुरुजी ! आप रघुकुलके कल्पवृक्ष हैं, आप मांगनेपर सभी अभीष्ट वस्तुएँ दे देते हैं। तुलसीदास कहते हैं—मुझे तो विशेषतः आपहीका भरोसा है, जिनकी कृपासे सभी अमङ्गल दूर हो गये हैं ॥ ३ ॥ [ १४ ] अमिय-बिलोकनि करि कृपा मुनिबर जब जोए। तबतें राम अरु भरत, लषन, रिपुदवन, सुमुखि सखि, सकल सुवन सुख सोए ॥ १ ॥ सुमित्रा लाय हिये फनि मनि ज्यों गोए। तुलसी नेवछावरि करति मातु अतिप्रेम-मगन-मन, सजल सुलोचन कोये ॥ २ ॥ हे सुमुखि सखि ! जबसे मुनिवरने कृपा करके अपनी अमृत- मयी दृष्टिसे निहारा है तभीसे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सभी बालक सुखसे सो रहे हैं ॥ १ ॥ सर्प जैसे अपनी मणिको छिपा लेता है, उसी प्रकार सुमित्राने बालकोंको हृदयसे लगा लिया है। तुलसीदासजी कहते हैं कि माता कौसल्या अत्यन्त प्रेममग्न होकर निछावर कर रही हैं और उनके नेत्रोंके कोये सजल हो गये हैं॥ २॥

गीतावली ४८ [ १५ ] मातु सकल, कुलगुर-वधू, प्रिय सखी सुहाई। सादर सब मंगल किए महि-मनि-महेस पर सबनि सुधेनु दुहाई ॥ १ ॥ बलि भूप भूसुर लिये अति बिनय बड़ाई। पूजि पायँ, सनमानि, दान दिये, लहि असीस, सुनि बरषैं सुमन सुरसाईं ॥ २ ॥ घर-घर पुर बाजन लगीं आनंद-बधाई। सुख-सनेह तेहि समयको तुलसी जानै जाको चोरचो है चित चहुँ भाई ॥ ३ ॥ कौसल्या आदि माताएँ, कुलगुरुपत्नी अरुन्धती और प्रिय सखियोंने आदरपूर्वक सब मङ्गलकृत्य किये और पृथ्वीके अलङ्काररूप भगवान् शङ्करपर दूध चढ़ानेके लिये सुन्दर गौओंका दोहन कराया ॥ १ ॥ फिर महाराजने अत्यन्त विनय और सम्मानपूर्वक ब्राह्मणोंको बुलाया और उनके पाँव पूज सम्मानित कर तरह-तरहके दान दिये तथा उनसे आशीर्वाद पाया, जिसे सुनकर येवराज इन्द्र पुष्पवर्षा करने लगे ॥ २ ॥ नगरमें घर-घर आनन्दकी बधाइयाँ बजने लगीं। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समयका सुख और स्नेह वही जान सकता है, जिसका चित्त चारों भाइयोंने चुरा लिया है ॥ ३ ॥ राग धनाश्री [ १६ ] या सिसुके गुन-नाम-बड़ाई। को कहि सकै, सुनहु नरपति, श्रीपति समान प्रभुताई ॥ १ ॥

४६ बालकाण्ड जद्यपि बुधि, बय, रूप, सील, गुन समै चारु चारयो भाई। तदपि लोक-लोचन-चकोर-ससि राम भगत-सुखदाई ॥ २ ॥ सुर, नर, मुनि करि अभय, दनुज हति, हरहिं, धरनि गरुआई। कीरति बिमल बिस्व-अघमोचनि रहिहि सकल जग छाई ॥ ३ ॥ याके चरन-सरोज कपट तजि जे भजिहैं मन लाई। ते कुल जुगल सहित तरिहैं भव, यह न कछू अधिकाई ॥ ४ ॥ सुनि गुरबचन पुलक तन दंपति, हरष न हृदय समाई। तुलसिदास अवलोकि मातु-मुख प्रभु मनमें मुसुकाई ॥ ५ ॥ हे राजन् ! सुनिये, इस बालकके गुण, नाम और बड़ाई कौन कह सकता है। इसकी प्रभुता श्रीलक्ष्मीपतिके समान है ॥१॥ यद्यपि बुद्धि, आयु, रूप, शील और गुणमें चारों ही भाई समान- रूपसे सुन्दर हैं तथापि भक्तसुखदायक राम तो सम्पूर्ण लोकोंके नेत्ररूप चकोरोंके लिये चन्द्रमारूप ही हैं ॥२॥ ये देवता, मनुष्य और मुनियोंको अभय कर राक्षसोंका संहार करके पृथिवीका भार उतारेंगे। इनकी जगत्पापापहारिणी निर्मल कीर्ति सम्पूर्ण जगत्में छा जायगी ॥३॥ जो लोग इनके चरणकमलोंका निष्कपटभावसे चित्त लगाकर भजन करेंगे, वे अपने [पितृपक्षीय और मातृपक्षीय] दोनों कुलोंके सहित संसारसे पार हो जायेंगे—यह कोई बड़ी बात नहीं है ॥४॥ गुरुजीके ये वचन सुनकर राजा-रानीके शरीरमें रोमाञ्च हो गया, उनके हृदयमें हर्ष समाता नहीं था। तुलसीदासजी कहते हैं—उस समय माताका मुख देखकर प्रभु मन-ही-मन मुसकाने लगे ॥५॥ गी० ४—

गीतावली ५० राग बिलावल [ १७ ] अवध आजु आगमी एकु आयो । करतल निरखि कहत सब गुनगन, बहुतन्ह परिचौ पायो ॥ १ ॥ बूढ़ो बड़ो प्रमानिक ब्राह्मन संकर नाम सुहायो । सँग सिसुसिष्य, सुनत कौसल्या भीतर भवन बुलायो ॥ २ ॥ पायँ पखारि, पूजि दियो आसन, असन बसन पहिरायो । मेले चरन चारु चारचो सुत माथे हाथ दिवायो ॥ ३ ॥ नखसिख बाल बिलोकि बिप्रतनु पुलक, नयन जल छायो । लै लै गोद कमल-कर निरखत, उर प्रमोद न अमायो ॥ ४ ॥ जनम प्रसंग कह्यो कौसिक मिस सीय-स्वयंबर गायो । राम, भरत, रिपुदवन, लखनको जय सुख सुजस सुनायो ॥ ५ ॥ तुलसिदास रनिवास रहसबस, भयो सबको मन भायो । सनमान्यो महिदेव असीसत सानँद सदन सिधायो ॥ ६ ॥ “आज अवधपुरीमें एक आगम जाननेवाला (ज्योतिषी) आया है । वह हथेली देखकर ही सारे गुण बता देता है । उसके कथनका कई लोग परिचय पा चुके हैं ॥१॥ वह बूढ़ा ब्राह्मण बड़ा ही प्रामाणिक है । उसका अति सुन्दर शङ्कर नाम है । उसके साथ बालक शिष्य भी हैं”—यह सुनकर माता कौसल्याने उसे महलके भीतर बुलवाया॥२॥ उसके चरणधो, पूजाकर, आसन दियातथा भोजन कराकर वस्त्र पहनाये । फिर उसके चारु चरणोंमें चारों बालकोंको डालकर उनके सिरपर हाथ रखवाया ॥३॥ उन बालकोंको नखसे सिखतक निहारकर ब्राह्मण देवताके शरीरमें रोमाञ्च और नेत्रोंमें जल छा गया । फिर वे

५१ बालकाण्ड बालकोंको गोदमें ले-लेकर उनके करकमल देखने लगे। उस समय [अपने आराध्यदेवका प्रत्यक्ष दर्शन पानेसे] उनके हृदयमें आनन्द नहीं समाया ॥४॥ तदनन्तर उन्होंने उनके जन्म लेनेके समयकी बातोंका वर्णन किया और भविष्यमें विश्वामित्रजीकी यज्ञरक्षाके मिषसे सीताजीके साथ स्वयंवर होनेकी बात कही तथा राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नके भावी जय, सुख और सुयशका वर्णन किया ॥५॥ तुलसीदासजी कहते हैं—यह सुनकर सारा रनिवास आनन्दमग्न हो गया, क्योंकि उनका कथन सभीके हृदयको प्रिय लगनेवाला हुआ। उन्होंने उन विप्रवरका खूब सम्मान किया और वे भी उन्हें आशीर्वाद देते हुए सानन्द अपने घर चले गये ॥६॥ राग केदारा [ १८ ] पौढ़िये लालन, पालने हौं झुलावौं। कर पद मुख चखकमल लसत लखि लोचन-भँवर भुलावौं ॥ १ ॥ बाल-बिनोद-मोद-मंजुलमनि किलकनि-खानि खुलावौं। तेइ अनुराग ताग गुहबे कहँ मति मृगनयनि बुलावौं ॥ २ ॥ तुलसी भनित भली भामिनि उर सो पहिराइ फुलावौं। चारु चरित रघुबर तेरे तेहि मिलि गाइ चरन चितु लावौं ॥ [माता कहती हैं—] 'लाल ! तुम पालनेमें पौढ़ जाओ, मैं झुलाऊँ। तुम्हारे कर, चरण, मुख और नेत्ररूप कमनीय कमलोंको निहारकर मैं अपने नयनरूप भ्रमरोंको भुलाऊँ ॥१॥ तुम्हारे बालकके लिये आनन्दरूप मञ्जुल मणिके लिये मैं तुम्हारी किलकनि (हास्य) रूप खानि खुलाऊँ और उन्हें अनुरागरूप तागेमें पिरोनेके

गीतावली ५२ लिये बुद्धिरूप मृगनयनी बुलाऊँ' ॥२॥ तुलसीदासजी कहते हैं- उस मनोहर मालाको कविंतारूप कमनीय कामिनीके कण्ठमें पहनाकर मैं प्रफुल्लित होऊँ और हे रघुश्रेष्ठ ! मैं उस (कविता-कामिनी) के साथ मिलकर तुम्हारे ही पवित्र चरित्र गाकर तुम्हारे ही चरणोंमें चित्त लगाऊँ ॥३॥ [ १९ ] सोइये लाल लाडिले रघुराई । मगन मोद लिये गोद सुमित्रा बार बार बलि जाई ॥ १ ॥ हँसे हँसत, अनरसे अनरसत प्रतिबिंबनि ज्यों झाँई । तुम सबके जीवनके जीवन, सकल सुमंगलदाई ॥ २ ॥ मूल मूल सुरबीथि-बेलि, तम-तोम सुदल अधिकाई । नखत-सुमन, नभ-बिटप बौंडिमानो छपा छिटकि छवि छाई ॥ ३ ॥ हौ जँभात, अलसात, तात ! तेरी बानि जानि मैं पाई । गाइ गाइ हलराइ बोलिहौं सुख नींदरी सुहाई ॥ ४ ॥ बछरु, छबीलो छगनमगन मेरे, कहति मलहाइ मलहाई । सानुज हिय हुलसति तुलसीके प्रभुकी ललित लरिकाई ॥ ५ ॥ सुमित्रा आनन्दमग्न होकर गोदमें ले बार-बार बलिहारी जाती हैं और—'हे लाल ! हे लाडिले रघुवीर ! सो जाओ ॥१॥ जैसे बिम्बके ही अनुरूप उसकी झाँई पड़ती है उसी प्रकार हँसनेसे तुम हँसने लगते हो और उदास होनेसे उदास हो जाते हो । तुम तो सभीके जीवनके जीवन और सब प्रकारके मङ्गल देनेवाले हो ॥२॥ [अहा ! इस समय रात्रिकी कैसी अपूर्व शोभा है ?] मूल नक्षत्र जिसका मूल है, आकाशगङ्गा बेल है, अन्धकारराशि पत्र-समूह है तथा नक्षत्रगण पुष्पावली है । आकाश-

५३ बालकाण्ड रूप - वृक्षमें फैलकर मानों रात्रि अपनी छबि छिटका रही है ॥३॥ हे तात ! अब तुम्हें जमुहाई आ रही है और तुम अलसा रहे हो । मैं तुम्हारी आदत अच्छी तरह जान गयी हूँ । अच्छा, मैं गा-गाकर और हिला डुलाकर सुखमयी निद्राको बुलाती हूँ' ॥४॥ फिर सुमित्रा मैया मग्नमनसे पुचकार-पुचकारकर 'मेरे बछरा ! मेरे छबीले छौना !' आदि कहने लगीं । तुलसीदासजी कहते हैं— उस समयका भाइयोंके सहित प्रभुका वह ललित बालभाव मेरे हृदयमें उमंगें मारता है ॥५॥ [ २० ] ललन लोने लेरुआ, बलि मैया । सुख सोइए नींद-बेरिया भई, चारु-चरित चारौ भैया ॥ १ ॥ कहति मल्हाई, लाइ उर छिन-छिन, ‘छगन छबीले छोटे छैया । मोद-कंद कुल-कुमुद-चंद्र मेरे रामचंद्र रघुरैया' ॥ २ ॥ रघुबर बालकेलि संतनकी सुभग सुभद सुरगैया । तुलसी दुहि पीवत सुख जीवत पय सप्रेम घनी घैया ॥ ३ ॥ हे ललन ! हे लोने वत्स ! माता बलि जाती है । लाल ! अब नींदका समय हो गया है; अतः मनोहर चरितवाले चारों भाई ! सुखपूर्वक सो जाओ ॥१॥ बालकोंको छातीसे चिपटाकर माता पुचकार-पुचकारकर कहती है, 'हे मेरे छोटे छबीले छौना, हे मेरे आनन्दकन्द, हे कुलरूप कुमुदवनके लिये चन्द्रमा, हे मेरे रघुकुल- भूषण राम !' आदि ॥२॥ रघुनाथजीकी बाललीला सन्तजनोंके लिये अति सुन्दर और शुभप्रद कामधेनु ही है । तुलसीदास उसका प्रेमरूप दूध दुहते हुए उसकी घैया (थनसे निकलती हुई दूधकी

गीतावली ५४ धार) प्रेमसहित पान करते हैं और आनन्दपूर्वक जीवन-यापन करते हैं ॥३॥ [ २१ ] सुखनींद कहति आलि आइहौं। राम, लखन, रिपुदवन, भरत सिसु करि सब सुमुख सोआइहौं ॥ १ ॥ रोवनि, धोवनि, अनखानि, अनरसनि, डिठि-मुठि निठुर नसाइहौं। हँसनि, खेलनि, किलकनि, आनंदनि भूपति-भवन बसाइहौं ॥ २ ॥ गोद बिनोद-मोदमय मूरति हरषि हरषि हलराइहौं। तनु तिल तिल करि, वारि रामपर लेहौं रोग बलाइहौं ॥ ३ ॥ रानी-राउ सहित सुत-परिजन निरखि नयन-फल पाइहौं। चारु चरित रघुबंस-तिलकके तहँ तुलसी मिलि गाइहौं ॥ ४ ॥ आनन्दनिद्रा कहती है—आली ! मैं आऊँगी और बालक राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको प्रसन्न करके सुलाऊँगी ॥१॥ मैं रोना-धोना, अनखाना, मचलाना और कड़ी नजर तथा टोनेको नष्ट कर दूँगी और हँसने, खेलने, किलकने तथा आनन्दित होनेकी क्रियाको महाराजके महलमें बसाऊँगी ॥२॥ रामकी विनोद और आनन्दमयी मूर्तिको गोदमें लेकर प्रसन्न मनसे हिलाऊँगी और अपने शरीरको रामललापर तिल-तिल निछावर कर उनके सारे रोग

५५ बालकाण्ड और दुःख अपने ऊपर ले लूंगी ॥३॥ राजा और रानीको अपने पुत्र तथा कुटुम्बियोंके सहित देखकर मैं नेत्रोंका फल पाऊँगी और वहाँ—तुलसीदास कहते हैं कि उन सबके साथ मिलकर रघुवंश- तिलक भगवान् रामके पवित्र चरित्र गाऊँगी ॥४॥ राग आसावरी [ २२ ] कनक-रतनमय पालनो रच्यो मनहुँ मार-सुतहार । बिबिध खेलौना, किंकिनी, लागे मंजुल मुकुताहार ॥ रघुकुल-मंडन राम लला ॥ १ ॥ जननि उबटि, अन्हवाइकै, मनिभूषन सजि, लिये गोद । पौढ़ाए पटु पालने, सिसु निरखि मगन मन मोद ॥ दसरथनंदन राम लला ॥ २ ॥ मदन, मौरकै चंदकी अलकनि, निदरति तनु-जोति । नील कमल, मनि, जलदकी उपमा कहे लघु मति होति ॥ मातु-सुकृत फल राम लला ॥ ३ ॥ लघु, लघु लोहित ललित हैं पद, पानि अधर, एक रंग । को कबि जो छबि कहि सकै नखसिख सुंदर सब अंग ॥ परिजन-रंजन राम लला ॥ ४ ॥ पग नूपुर, कटि किंकिनी, कर-कंजनि पहुँची मंजु । हिय हरि नख अदभुत बन्यो मानो मनसिज मनि-गन-गंजु ॥ पुरजन-सिरमनि राम लला ॥ ५ ॥ लोचन नील सराजसे, ऊपर मसिबिंदु बिराज । जनु बिधु-मुख-छबि-अमियको रच्छक राखे रसराज ॥ सोभासागर राम लला ॥ ६ ॥

गीतावली ५६ गधुँआरी अलकावली लसैं, लटकन ललित ललाट । जनु उडुगन बिधु मिलनको चले तम बिदारि करि बांट ॥ सहज सोहावनो राम लला ॥ ७ ॥ देखि खिलौना किलकहीं, पद पानि बिलोचन लोल । बिचित्र बिहँग अलि-जलज ज्यों सुखमा-सर करत कलोल ॥ भगत-कलपतरु राम लला ॥ ८ ॥ बाल-बोल बिनु अरथके सुनि देव पदारथ चारि । जनु इन्ह बचनन्हितें भए सुरतरु तापस त्रिपुरारि ॥ नाम-कामधुक राम लला ॥ ६ ॥ सखी सुमित्रा वारहीं मनि भूषन बसन बिभाग । मधुर झुलाइ मल्हावहीं गवैं उमँगि उमँगि अनुराग ॥ हैं जग-मंगल राम लला ॥ १० ॥ मोती जायो सीपमें श्ररु अदिति जन्यो जग-भानु । रघुपति जायो कौसिला गुन-मंगल-रूप-निधानु ॥ भुवन-विभूषन राम लला ॥ ११ ॥ राम प्रगट जबतें भए सकल श्रमंगल-मूल । मीत मुदित, हित उदित हैं, नित बैरिनके चित सूल ॥ भव-भय-भंजन राम लला ॥ १२ ॥ श्रनुज-सखा-सिसु संग लै खेलन जैहैं चौगान । लंका खरभर परैंगी, सुरपुर बाजिहैं निसान ॥ रिपुगन-गंजन राम लला ॥ १३ ॥ राम अहेरे चलहिये जब गज रथ बाजि सँवारि । दसकंधर उर धकधकी श्रब जनि धावै धनु धारि ॥ श्ररि-करि-केहरि राम लला ॥ १४ ॥

५७ बालकाण्ड गीत सुमित्रा सखिन्हकै सुनि सुनि सुर मुनि अनुकूल । दै असीस जय जय कहैं हरषैं बरषैं फूल ॥ सुर-सुखदायक राम लला ॥ १५ ॥ बालचरितमय चंद्रमा यह सोरह-कला-निधान । चित-चकोर तुलसी कियो कर प्रेम-अमिय-रसपान ॥ तुलसीको जीवन राम लला ॥ १६ ॥ सुवर्ण और मणियोंसे जड़ा हुआ मनोहर पालना है, जिसे मानो कामदेवरूप बढ़ईने बनाया है। उसमें तरह-तरहके खिलौने, घुंघरू और मनोहर मोतीकी मालाएँ लगी हुई हैं। उसीमें रघुकुल- भूषण रामलला विराजमान हैं ॥१॥ माताने दशरथनन्दन रामललाको उबटन लगा, स्नान करा और मणिमय आभूषणोंसे सुसज्जित कर गोदमें लिया और फिर उस सुन्दर पालनेमें सुला दिया। बालक रामको देखकर माताका मन आनन्दमग्न हो रहा है ॥२॥ रामके श्याम शरीरकी कान्ति कामदेव ओर मोरपङ्खकी चन्द्रिकाकी आभाका भी निरादर करती है। यदि उसकी उपमा नील कमल, नील मणि अथवा नील मेघसे दी जाय तो बुद्धिकी लघुता प्रकट होती है। रामलला तो माताके पुण्यपुञ्जका फल ही हैं ॥३॥ रामके नन्हें-नन्हें पाँव, हाथ और अधर एक ही रंगके, अति सुन्दर और अरुणवर्ण हैं। नखसे शिखतक उनके सभी अङ्ग सुन्दर हैं। ऐसा कौन कवि है जो इनकी छविका वर्णन कर सके ? रामलला अपने सभी कुटुम्बियोंको आनन्दित करनेवाले हैं ॥४॥ रामके चरणोंमें नूपुर, कटिप्रदेशमें किंकिणी, करकमलोंमें मनोहरपहुँची और हृदयमें अतिअद्भुत बघनहा शोभायमान है, जो मानो कामदेवकी मणियोंका ढेर हो। रामलला

गीतावली ५८ पुरवासियोंके चूडामणि हैं ॥५॥ रामके नेत्र नील कमलके समान हैं, भृकुटीपर काजलकी बिन्दी शोभायमान है । मानो मुखचन्द्रके छविरूप अमृतकी चौकसीके लिये शृङ्गाररसने रक्षक नियुक्त किया हो । रामलला शोभाके समुद्र हैं ॥६॥ उनकी गभुआरी अलकावली सुशोभित है तथा मनोहर ललाट-प्रदेशपर लटकन लटक रहा है । मानो नक्षत्रगण अन्धकारको विदीर्ण करके मार्ग निकालकर चन्द्रमासे मिलनेको चले हों । रामलला स्वभावसे ही शोभायमान हैं ॥७॥ वे खिलौनोंको देखकर किलकारी मारते हैं और उनके चरण, हाथ और नेत्र चञ्चल हो जाते हैं; मानो सौन्दर्यके सरोवरमें कमल, चित्र-विचित्र पक्षी और भ्रमरगण किकोल कर रहे हों । रामलला भक्तोंके लिये कल्पवृक्षरूप हैं ॥८॥ बालक रामके अर्थहीन शब्द सुने जानेपर चारों फल प्रदान करते हैं । मानो इन शब्दोंसे सहमकर ही वृक्ष और त्रिपुरहर शङ्कर तपस्वी हो गये हैं । रामलला- का नाम ही साक्षात् कामधेनु है ॥ ९॥ सखियाँ तथा सुमित्रा महारानी मणि, भूषण और वस्त्रोंका विभागकर निछावर करती हैं । वे झुलातीऔरपुचकारतीहुई प्रेमसे उमँग-उमँगकर मधुर स्वरसे गाती हैं। रामलला जगन्मङ्गल रूप हैं ॥ १० ॥ जैसे सीपसे मोती प्रकट होता है और अदितिसे सूर्यका जन्म हुआ है, उसी प्रकार कौसल्याने गुण, मङ्गल और रूपके निधान रघुनन्दनको जन्म दिया है । रामलला त्रिभुवनको विभूषित करनेवाले हैं ॥ ११ ॥ जबसे रामका प्रादुर्भाव हुआ है, तबसे सारे अमङ्गलोंकी जड़ कट गयी है, मित्र- मण्डल आनन्दित है, हितैषियोंका अभ्युदय हो रहा है तथा वैरियोंके हृदयमें शूल होता है । रामलला संसारके भयको भङ्ग करनेवाले

हैं ॥ १२ ॥ जिस समय भगवान् राम अपने भाई और साथी बालकोंको सङ्ग लेकर गेंद खेलने जायँगे, उस समय लङ्कामें खलबली पड़ जायगी और स्वर्गमें बाजे बजने लगेंगे, क्योंकि रामलला शत्रुदल- का दमन करनेवाले हैं ॥ १३ ॥ जिस समय रामचन्द्रजी हाथी, घोड़े और रथ सँभालकर मृगमायाके लिये चलेंगे, उस समय रावणके हृदयमें धड़कन होने लगेगी कि कहीं धनुष लेकर मेरी ओर न दौड़ पड़ें; क्योंकि श्रीरामलला शत्रुरूप हाथीके लिये साक्षात् सिंह ही हैं ॥ १४ ॥ सुमित्रा और सखियोंके गीत सुन-सुनकर देवता और मुनिजन प्रसन्न होते हैं तथा आशीर्वाद देते हुए जय-जयकार कर हर्षित हो फूलोंकी वर्षा करते हैं। रामलला देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं ॥ १५ ॥ तुलसीदासने प्रेमामृतरसका पान कर चित्तरूप चकोरके लिये यह षोडशकलानिधान बालचरितरूप चन्द्रमा* रचा है। रामलला तो तुलसीदासके जीवन ही हैं ॥ १६ ॥ राग कान्हरा [ २३ ] पालने रघुपुति झुलावै । लै लै नाम सप्रेम सरस स्वर कौसल्या कल कीरति गावै ॥ १ ॥ केकिंकंठ दुति स्यामबरन बपु, बाल बिभूषन बिरचि बनाए । अलक कुटिल, ललित लटकनभ्रू, नील नलिन दोउ नयन सुहाए ॥ २ ॥ सिसु-सुभाय सोहत जब कर गहि बदन निकट पदपल्लव लाए । मनहुँ सुभग जुग भुजग जलज भरि लेत सुधा ससि सों सचु पाए ॥ ३ ॥


  • इन सोलह पदोंमें बालरूप रामकी रूप-माधुरीका वर्णन किया गया है। इनमें एक-एक पद चन्द्रमाकी उत्तरोत्तर बढ़ती हुई कलाओंका सूचक है। इस प्रकार इनमें षोडशकलानिधान चन्द्रमाकी उत्प्रेक्षा की है ।