गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ४८ [ १५ ] मातु सकल, कुलगुर-वधू, प्रिय सखी सुहाई। सादर सब मंगल किए महि-मनि-महेस पर सबनि सुधेनु दुहाई ॥ १ ॥ बलि भूप भूसुर लिये अति बिनय बड़ाई। पूजि पायँ, सनमानि, दान दिये, लहि असीस, सुनि बरषैं सुमन सुरसाईं ॥ २ ॥ घर-घर पुर बाजन लगीं आनंद-बधाई। सुख-सनेह तेहि समयको तुलसी जानै जाको चोरचो है चित चहुँ भाई ॥ ३ ॥ कौसल्या आदि माताएँ, कुलगुरुपत्नी अरुन्धती और प्रिय सखियोंने आदरपूर्वक सब मङ्गलकृत्य किये और पृथ्वीके अलङ्काररूप भगवान् शङ्करपर दूध चढ़ानेके लिये सुन्दर गौओंका दोहन कराया ॥ १ ॥ फिर महाराजने अत्यन्त विनय और सम्मानपूर्वक ब्राह्मणोंको बुलाया और उनके पाँव पूज सम्मानित कर तरह-तरहके दान दिये तथा उनसे आशीर्वाद पाया, जिसे सुनकर येवराज इन्द्र पुष्पवर्षा करने लगे ॥ २ ॥ नगरमें घर-घर आनन्दकी बधाइयाँ बजने लगीं। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समयका सुख और स्नेह वही जान सकता है, जिसका चित्त चारों भाइयोंने चुरा लिया है ॥ ३ ॥ राग धनाश्री [ १६ ] या सिसुके गुन-नाम-बड़ाई। को कहि सकै, सुनहु नरपति, श्रीपति समान प्रभुताई ॥ १ ॥