भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 55

४६ बालकाण्ड जद्यपि बुधि, बय, रूप, सील, गुन समै चारु चारयो भाई। तदपि लोक-लोचन-चकोर-ससि राम भगत-सुखदाई ॥ २ ॥ सुर, नर, मुनि करि अभय, दनुज हति, हरहिं, धरनि गरुआई। कीरति बिमल बिस्व-अघमोचनि रहिहि सकल जग छाई ॥ ३ ॥ याके चरन-सरोज कपट तजि जे भजिहैं मन लाई। ते कुल जुगल सहित तरिहैं भव, यह न कछू अधिकाई ॥ ४ ॥ सुनि गुरबचन पुलक तन दंपति, हरष न हृदय समाई। तुलसिदास अवलोकि मातु-मुख प्रभु मनमें मुसुकाई ॥ ५ ॥ हे राजन् ! सुनिये, इस बालकके गुण, नाम और बड़ाई कौन कह सकता है। इसकी प्रभुता श्रीलक्ष्मीपतिके समान है ॥१॥ यद्यपि बुद्धि, आयु, रूप, शील और गुणमें चारों ही भाई समान- रूपसे सुन्दर हैं तथापि भक्तसुखदायक राम तो सम्पूर्ण लोकोंके नेत्ररूप चकोरोंके लिये चन्द्रमारूप ही हैं ॥२॥ ये देवता, मनुष्य और मुनियोंको अभय कर राक्षसोंका संहार करके पृथिवीका भार उतारेंगे। इनकी जगत्पापापहारिणी निर्मल कीर्ति सम्पूर्ण जगत्में छा जायगी ॥३॥ जो लोग इनके चरणकमलोंका निष्कपटभावसे चित्त लगाकर भजन करेंगे, वे अपने [पितृपक्षीय और मातृपक्षीय] दोनों कुलोंके सहित संसारसे पार हो जायेंगे—यह कोई बड़ी बात नहीं है ॥४॥ गुरुजीके ये वचन सुनकर राजा-रानीके शरीरमें रोमाञ्च हो गया, उनके हृदयमें हर्ष समाता नहीं था। तुलसीदासजी कहते हैं—उस समय माताका मुख देखकर प्रभु मन-ही-मन मुसकाने लगे ॥५॥ गी० ४—