भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 53

४७ बालकाण्ड जिस समय मुनिवरने रामके मस्तकपर हाथ रक्खा, उसी समय वे किलकने लगे। भगवान्‌की महिमाको जानकर और उनकी लीला देखकर गुरुजीके नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गया, रोमावली खड़ी हो गयी ॥ १ ॥ उन्होंने रामको गोदमें उठा लिया, किन्तु वे गोदसे उतरकर भाग गये। इससे मुनिवरका चित्त हर्षके कारण अति अनुरागमय हो गया। यह देखकर माता हृदयमें हर्षित हुईं और सखीकी ओटमें खड़ी होकर प्रेमपगे सुमधुर वचनोंमें कहने लगीं ॥ २ ॥ हे गुरुजी ! आप रघुकुलके कल्पवृक्ष हैं, आप मांगनेपर सभी अभीष्ट वस्तुएँ दे देते हैं। तुलसीदास कहते हैं—मुझे तो विशेषतः आपहीका भरोसा है, जिनकी कृपासे सभी अमङ्गल दूर हो गये हैं ॥ ३ ॥ [ १४ ] अमिय-बिलोकनि करि कृपा मुनिबर जब जोए। तबतें राम अरु भरत, लषन, रिपुदवन, सुमुखि सखि, सकल सुवन सुख सोए ॥ १ ॥ सुमित्रा लाय हिये फनि मनि ज्यों गोए। तुलसी नेवछावरि करति मातु अतिप्रेम-मगन-मन, सजल सुलोचन कोये ॥ २ ॥ हे सुमुखि सखि ! जबसे मुनिवरने कृपा करके अपनी अमृत- मयी दृष्टिसे निहारा है तभीसे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सभी बालक सुखसे सो रहे हैं ॥ १ ॥ सर्प जैसे अपनी मणिको छिपा लेता है, उसी प्रकार सुमित्राने बालकोंको हृदयसे लगा लिया है। तुलसीदासजी कहते हैं कि माता कौसल्या अत्यन्त प्रेममग्न होकर निछावर कर रही हैं और उनके नेत्रोंके कोये सजल हो गये हैं॥ २॥