भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52

और पालनेमें झुलानेसे भी नहीं रहते, बराबर रो रहे हैं। इससे मुझे तथा और सब लोगोंको बड़ी चिन्ता हो रही है ॥ १ ॥ देव, पितर और ग्रहोंकी पूजा की जाती है, घृतका तुलादान भी किया जाता है; तो भी हे सखि ! कभी-कभी जब किसी दुष्टा स्त्रीकी दृष्टि पड़ जाती है तो ऐसे ही मचल जाते हैं ॥ २ ॥ तुरन्त ही कुलगुरुको बुलाना चाहिये। वे अपने अमृतमय हाथोंसे बालकका मस्तक स्पर्श करें।' यह सुनते ही ऋषिवरने आकर कुशसे नृसिंहमन्त्र* पढ़कर झाड़-फूँक की; ऐसे मन्त्रसे जिस मन्त्रका स्मरण करनेसे भयको भी भय होता है ॥ ३ ॥ जिनका नाम सदाशिव और पार्वतीका सर्वस्व है उन्हींको कौसल्याजी झाड़-फूँक करा रही हैं ! प्रीतिकी इस रीतिको देखकर तुलसीदासके हृदयमें अति आनन्द होता है ॥ ४ ॥

[१३] माथे हाथ ऋषि जब दियो राम किलकन लागे। महिमा समुझि, लीला बिलोकि गुरु सजल नयन, तनु पुलक, रोम रोम जागे ॥ १ ॥ लिये गोद, धाए गोदतें, मोद मुनि मन अनुरागे। निरखि मातु हरषी हिये आली-ओट कहति मृदु बचन प्रेमके-से पागे ॥ २ ॥ तुम्ह सुरतरु रघुबंसके, देत अभिमत माँगे। मेरे बिसेषि गति रावरी, तुलसी प्रसाद जाके सकल अमंगल भागे ॥ ३ ॥


*ॐ नमो नृसिंहाय हिरण्यकशिपुवक्षःस्थलविदारणाय त्रिभुवनव्याप- काय भूतप्रेतपिशाचशाकिनीडाकिनीकीलनोन्मूलनाय स्तम्भोद्भव समस्त- दोषान् हन हन सर सर चल चल कम्प कम्प मथ मथ हुंफट् हुंफट् ठंठः महारुद्रजापित स्वाहा।