गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१ बालकाण्ड बालकोंको गोदमें ले-लेकर उनके करकमल देखने लगे। उस समय [अपने आराध्यदेवका प्रत्यक्ष दर्शन पानेसे] उनके हृदयमें आनन्द नहीं समाया ॥४॥ तदनन्तर उन्होंने उनके जन्म लेनेके समयकी बातोंका वर्णन किया और भविष्यमें विश्वामित्रजीकी यज्ञरक्षाके मिषसे सीताजीके साथ स्वयंवर होनेकी बात कही तथा राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नके भावी जय, सुख और सुयशका वर्णन किया ॥५॥ तुलसीदासजी कहते हैं—यह सुनकर सारा रनिवास आनन्दमग्न हो गया, क्योंकि उनका कथन सभीके हृदयको प्रिय लगनेवाला हुआ। उन्होंने उन विप्रवरका खूब सम्मान किया और वे भी उन्हें आशीर्वाद देते हुए सानन्द अपने घर चले गये ॥६॥ राग केदारा [ १८ ] पौढ़िये लालन, पालने हौं झुलावौं। कर पद मुख चखकमल लसत लखि लोचन-भँवर भुलावौं ॥ १ ॥ बाल-बिनोद-मोद-मंजुलमनि किलकनि-खानि खुलावौं। तेइ अनुराग ताग गुहबे कहँ मति मृगनयनि बुलावौं ॥ २ ॥ तुलसी भनित भली भामिनि उर सो पहिराइ फुलावौं। चारु चरित रघुबर तेरे तेहि मिलि गाइ चरन चितु लावौं ॥ [माता कहती हैं—] 'लाल ! तुम पालनेमें पौढ़ जाओ, मैं झुलाऊँ। तुम्हारे कर, चरण, मुख और नेत्ररूप कमनीय कमलोंको निहारकर मैं अपने नयनरूप भ्रमरोंको भुलाऊँ ॥१॥ तुम्हारे बालकके लिये आनन्दरूप मञ्जुल मणिके लिये मैं तुम्हारी किलकनि (हास्य) रूप खानि खुलाऊँ और उन्हें अनुरागरूप तागेमें पिरोनेके