भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 58

गीतावली ५२ लिये बुद्धिरूप मृगनयनी बुलाऊँ' ॥२॥ तुलसीदासजी कहते हैं- उस मनोहर मालाको कविंतारूप कमनीय कामिनीके कण्ठमें पहनाकर मैं प्रफुल्लित होऊँ और हे रघुश्रेष्ठ ! मैं उस (कविता-कामिनी) के साथ मिलकर तुम्हारे ही पवित्र चरित्र गाकर तुम्हारे ही चरणोंमें चित्त लगाऊँ ॥३॥ [ १९ ] सोइये लाल लाडिले रघुराई । मगन मोद लिये गोद सुमित्रा बार बार बलि जाई ॥ १ ॥ हँसे हँसत, अनरसे अनरसत प्रतिबिंबनि ज्यों झाँई । तुम सबके जीवनके जीवन, सकल सुमंगलदाई ॥ २ ॥ मूल मूल सुरबीथि-बेलि, तम-तोम सुदल अधिकाई । नखत-सुमन, नभ-बिटप बौंडिमानो छपा छिटकि छवि छाई ॥ ३ ॥ हौ जँभात, अलसात, तात ! तेरी बानि जानि मैं पाई । गाइ गाइ हलराइ बोलिहौं सुख नींदरी सुहाई ॥ ४ ॥ बछरु, छबीलो छगनमगन मेरे, कहति मलहाइ मलहाई । सानुज हिय हुलसति तुलसीके प्रभुकी ललित लरिकाई ॥ ५ ॥ सुमित्रा आनन्दमग्न होकर गोदमें ले बार-बार बलिहारी जाती हैं और—'हे लाल ! हे लाडिले रघुवीर ! सो जाओ ॥१॥ जैसे बिम्बके ही अनुरूप उसकी झाँई पड़ती है उसी प्रकार हँसनेसे तुम हँसने लगते हो और उदास होनेसे उदास हो जाते हो । तुम तो सभीके जीवनके जीवन और सब प्रकारके मङ्गल देनेवाले हो ॥२॥ [अहा ! इस समय रात्रिकी कैसी अपूर्व शोभा है ?] मूल नक्षत्र जिसका मूल है, आकाशगङ्गा बेल है, अन्धकारराशि पत्र-समूह है तथा नक्षत्रगण पुष्पावली है । आकाश-

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक) · पृष्ठ 58, कुल 454 में से · BharatKosha