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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

गीतावली ५२ लिये बुद्धिरूप मृगनयनी बुलाऊँ' ॥२॥ तुलसीदासजी कहते हैं- उस मनोहर मालाको कविंतारूप कमनीय कामिनीके कण्ठमें पहनाकर मैं प्रफुल्लित होऊँ और हे रघुश्रेष्ठ ! मैं उस (कविता-कामिनी) के साथ मिलकर तुम्हारे ही पवित्र चरित्र गाकर तुम्हारे ही चरणोंमें चित्त लगाऊँ ॥३॥ [ १९ ] सोइये लाल लाडिले रघुराई । मगन मोद लिये गोद सुमित्रा बार बार बलि जाई ॥ १ ॥ हँसे हँसत, अनरसे अनरसत प्रतिबिंबनि ज्यों झाँई । तुम सबके जीवनके जीवन, सकल सुमंगलदाई ॥ २ ॥ मूल मूल सुरबीथि-बेलि, तम-तोम सुदल अधिकाई । नखत-सुमन, नभ-बिटप बौंडिमानो छपा छिटकि छवि छाई ॥ ३ ॥ हौ जँभात, अलसात, तात ! तेरी बानि जानि मैं पाई । गाइ गाइ हलराइ बोलिहौं सुख नींदरी सुहाई ॥ ४ ॥ बछरु, छबीलो छगनमगन मेरे, कहति मलहाइ मलहाई । सानुज हिय हुलसति तुलसीके प्रभुकी ललित लरिकाई ॥ ५ ॥ सुमित्रा आनन्दमग्न होकर गोदमें ले बार-बार बलिहारी जाती हैं और—'हे लाल ! हे लाडिले रघुवीर ! सो जाओ ॥१॥ जैसे बिम्बके ही अनुरूप उसकी झाँई पड़ती है उसी प्रकार हँसनेसे तुम हँसने लगते हो और उदास होनेसे उदास हो जाते हो । तुम तो सभीके जीवनके जीवन और सब प्रकारके मङ्गल देनेवाले हो ॥२॥ [अहा ! इस समय रात्रिकी कैसी अपूर्व शोभा है ?] मूल नक्षत्र जिसका मूल है, आकाशगङ्गा बेल है, अन्धकारराशि पत्र-समूह है तथा नक्षत्रगण पुष्पावली है । आकाश-

५३ बालकाण्ड रूप - वृक्षमें फैलकर मानों रात्रि अपनी छबि छिटका रही है ॥३॥ हे तात ! अब तुम्हें जमुहाई आ रही है और तुम अलसा रहे हो । मैं तुम्हारी आदत अच्छी तरह जान गयी हूँ । अच्छा, मैं गा-गाकर और हिला डुलाकर सुखमयी निद्राको बुलाती हूँ' ॥४॥ फिर सुमित्रा मैया मग्नमनसे पुचकार-पुचकारकर 'मेरे बछरा ! मेरे छबीले छौना !' आदि कहने लगीं । तुलसीदासजी कहते हैं— उस समयका भाइयोंके सहित प्रभुका वह ललित बालभाव मेरे हृदयमें उमंगें मारता है ॥५॥ [ २० ] ललन लोने लेरुआ, बलि मैया । सुख सोइए नींद-बेरिया भई, चारु-चरित चारौ भैया ॥ १ ॥ कहति मल्हाई, लाइ उर छिन-छिन, ‘छगन छबीले छोटे छैया । मोद-कंद कुल-कुमुद-चंद्र मेरे रामचंद्र रघुरैया' ॥ २ ॥ रघुबर बालकेलि संतनकी सुभग सुभद सुरगैया । तुलसी दुहि पीवत सुख जीवत पय सप्रेम घनी घैया ॥ ३ ॥ हे ललन ! हे लोने वत्स ! माता बलि जाती है । लाल ! अब नींदका समय हो गया है; अतः मनोहर चरितवाले चारों भाई ! सुखपूर्वक सो जाओ ॥१॥ बालकोंको छातीसे चिपटाकर माता पुचकार-पुचकारकर कहती है, 'हे मेरे छोटे छबीले छौना, हे मेरे आनन्दकन्द, हे कुलरूप कुमुदवनके लिये चन्द्रमा, हे मेरे रघुकुल- भूषण राम !' आदि ॥२॥ रघुनाथजीकी बाललीला सन्तजनोंके लिये अति सुन्दर और शुभप्रद कामधेनु ही है । तुलसीदास उसका प्रेमरूप दूध दुहते हुए उसकी घैया (थनसे निकलती हुई दूधकी

गीतावली ५४ धार) प्रेमसहित पान करते हैं और आनन्दपूर्वक जीवन-यापन करते हैं ॥३॥ [ २१ ] सुखनींद कहति आलि आइहौं। राम, लखन, रिपुदवन, भरत सिसु करि सब सुमुख सोआइहौं ॥ १ ॥ रोवनि, धोवनि, अनखानि, अनरसनि, डिठि-मुठि निठुर नसाइहौं। हँसनि, खेलनि, किलकनि, आनंदनि भूपति-भवन बसाइहौं ॥ २ ॥ गोद बिनोद-मोदमय मूरति हरषि हरषि हलराइहौं। तनु तिल तिल करि, वारि रामपर लेहौं रोग बलाइहौं ॥ ३ ॥ रानी-राउ सहित सुत-परिजन निरखि नयन-फल पाइहौं। चारु चरित रघुबंस-तिलकके तहँ तुलसी मिलि गाइहौं ॥ ४ ॥ आनन्दनिद्रा कहती है—आली ! मैं आऊँगी और बालक राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको प्रसन्न करके सुलाऊँगी ॥१॥ मैं रोना-धोना, अनखाना, मचलाना और कड़ी नजर तथा टोनेको नष्ट कर दूँगी और हँसने, खेलने, किलकने तथा आनन्दित होनेकी क्रियाको महाराजके महलमें बसाऊँगी ॥२॥ रामकी विनोद और आनन्दमयी मूर्तिको गोदमें लेकर प्रसन्न मनसे हिलाऊँगी और अपने शरीरको रामललापर तिल-तिल निछावर कर उनके सारे रोग

५५ बालकाण्ड और दुःख अपने ऊपर ले लूंगी ॥३॥ राजा और रानीको अपने पुत्र तथा कुटुम्बियोंके सहित देखकर मैं नेत्रोंका फल पाऊँगी और वहाँ—तुलसीदास कहते हैं कि उन सबके साथ मिलकर रघुवंश- तिलक भगवान् रामके पवित्र चरित्र गाऊँगी ॥४॥ राग आसावरी [ २२ ] कनक-रतनमय पालनो रच्यो मनहुँ मार-सुतहार । बिबिध खेलौना, किंकिनी, लागे मंजुल मुकुताहार ॥ रघुकुल-मंडन राम लला ॥ १ ॥ जननि उबटि, अन्हवाइकै, मनिभूषन सजि, लिये गोद । पौढ़ाए पटु पालने, सिसु निरखि मगन मन मोद ॥ दसरथनंदन राम लला ॥ २ ॥ मदन, मौरकै चंदकी अलकनि, निदरति तनु-जोति । नील कमल, मनि, जलदकी उपमा कहे लघु मति होति ॥ मातु-सुकृत फल राम लला ॥ ३ ॥ लघु, लघु लोहित ललित हैं पद, पानि अधर, एक रंग । को कबि जो छबि कहि सकै नखसिख सुंदर सब अंग ॥ परिजन-रंजन राम लला ॥ ४ ॥ पग नूपुर, कटि किंकिनी, कर-कंजनि पहुँची मंजु । हिय हरि नख अदभुत बन्यो मानो मनसिज मनि-गन-गंजु ॥ पुरजन-सिरमनि राम लला ॥ ५ ॥ लोचन नील सराजसे, ऊपर मसिबिंदु बिराज । जनु बिधु-मुख-छबि-अमियको रच्छक राखे रसराज ॥ सोभासागर राम लला ॥ ६ ॥

गीतावली ५६ गधुँआरी अलकावली लसैं, लटकन ललित ललाट । जनु उडुगन बिधु मिलनको चले तम बिदारि करि बांट ॥ सहज सोहावनो राम लला ॥ ७ ॥ देखि खिलौना किलकहीं, पद पानि बिलोचन लोल । बिचित्र बिहँग अलि-जलज ज्यों सुखमा-सर करत कलोल ॥ भगत-कलपतरु राम लला ॥ ८ ॥ बाल-बोल बिनु अरथके सुनि देव पदारथ चारि । जनु इन्ह बचनन्हितें भए सुरतरु तापस त्रिपुरारि ॥ नाम-कामधुक राम लला ॥ ६ ॥ सखी सुमित्रा वारहीं मनि भूषन बसन बिभाग । मधुर झुलाइ मल्हावहीं गवैं उमँगि उमँगि अनुराग ॥ हैं जग-मंगल राम लला ॥ १० ॥ मोती जायो सीपमें श्ररु अदिति जन्यो जग-भानु । रघुपति जायो कौसिला गुन-मंगल-रूप-निधानु ॥ भुवन-विभूषन राम लला ॥ ११ ॥ राम प्रगट जबतें भए सकल श्रमंगल-मूल । मीत मुदित, हित उदित हैं, नित बैरिनके चित सूल ॥ भव-भय-भंजन राम लला ॥ १२ ॥ श्रनुज-सखा-सिसु संग लै खेलन जैहैं चौगान । लंका खरभर परैंगी, सुरपुर बाजिहैं निसान ॥ रिपुगन-गंजन राम लला ॥ १३ ॥ राम अहेरे चलहिये जब गज रथ बाजि सँवारि । दसकंधर उर धकधकी श्रब जनि धावै धनु धारि ॥ श्ररि-करि-केहरि राम लला ॥ १४ ॥

५७ बालकाण्ड गीत सुमित्रा सखिन्हकै सुनि सुनि सुर मुनि अनुकूल । दै असीस जय जय कहैं हरषैं बरषैं फूल ॥ सुर-सुखदायक राम लला ॥ १५ ॥ बालचरितमय चंद्रमा यह सोरह-कला-निधान । चित-चकोर तुलसी कियो कर प्रेम-अमिय-रसपान ॥ तुलसीको जीवन राम लला ॥ १६ ॥ सुवर्ण और मणियोंसे जड़ा हुआ मनोहर पालना है, जिसे मानो कामदेवरूप बढ़ईने बनाया है। उसमें तरह-तरहके खिलौने, घुंघरू और मनोहर मोतीकी मालाएँ लगी हुई हैं। उसीमें रघुकुल- भूषण रामलला विराजमान हैं ॥१॥ माताने दशरथनन्दन रामललाको उबटन लगा, स्नान करा और मणिमय आभूषणोंसे सुसज्जित कर गोदमें लिया और फिर उस सुन्दर पालनेमें सुला दिया। बालक रामको देखकर माताका मन आनन्दमग्न हो रहा है ॥२॥ रामके श्याम शरीरकी कान्ति कामदेव ओर मोरपङ्खकी चन्द्रिकाकी आभाका भी निरादर करती है। यदि उसकी उपमा नील कमल, नील मणि अथवा नील मेघसे दी जाय तो बुद्धिकी लघुता प्रकट होती है। रामलला तो माताके पुण्यपुञ्जका फल ही हैं ॥३॥ रामके नन्हें-नन्हें पाँव, हाथ और अधर एक ही रंगके, अति सुन्दर और अरुणवर्ण हैं। नखसे शिखतक उनके सभी अङ्ग सुन्दर हैं। ऐसा कौन कवि है जो इनकी छविका वर्णन कर सके ? रामलला अपने सभी कुटुम्बियोंको आनन्दित करनेवाले हैं ॥४॥ रामके चरणोंमें नूपुर, कटिप्रदेशमें किंकिणी, करकमलोंमें मनोहरपहुँची और हृदयमें अतिअद्भुत बघनहा शोभायमान है, जो मानो कामदेवकी मणियोंका ढेर हो। रामलला

गीतावली ५८ पुरवासियोंके चूडामणि हैं ॥५॥ रामके नेत्र नील कमलके समान हैं, भृकुटीपर काजलकी बिन्दी शोभायमान है । मानो मुखचन्द्रके छविरूप अमृतकी चौकसीके लिये शृङ्गाररसने रक्षक नियुक्त किया हो । रामलला शोभाके समुद्र हैं ॥६॥ उनकी गभुआरी अलकावली सुशोभित है तथा मनोहर ललाट-प्रदेशपर लटकन लटक रहा है । मानो नक्षत्रगण अन्धकारको विदीर्ण करके मार्ग निकालकर चन्द्रमासे मिलनेको चले हों । रामलला स्वभावसे ही शोभायमान हैं ॥७॥ वे खिलौनोंको देखकर किलकारी मारते हैं और उनके चरण, हाथ और नेत्र चञ्चल हो जाते हैं; मानो सौन्दर्यके सरोवरमें कमल, चित्र-विचित्र पक्षी और भ्रमरगण किकोल कर रहे हों । रामलला भक्तोंके लिये कल्पवृक्षरूप हैं ॥८॥ बालक रामके अर्थहीन शब्द सुने जानेपर चारों फल प्रदान करते हैं । मानो इन शब्दोंसे सहमकर ही वृक्ष और त्रिपुरहर शङ्कर तपस्वी हो गये हैं । रामलला- का नाम ही साक्षात् कामधेनु है ॥ ९॥ सखियाँ तथा सुमित्रा महारानी मणि, भूषण और वस्त्रोंका विभागकर निछावर करती हैं । वे झुलातीऔरपुचकारतीहुई प्रेमसे उमँग-उमँगकर मधुर स्वरसे गाती हैं। रामलला जगन्मङ्गल रूप हैं ॥ १० ॥ जैसे सीपसे मोती प्रकट होता है और अदितिसे सूर्यका जन्म हुआ है, उसी प्रकार कौसल्याने गुण, मङ्गल और रूपके निधान रघुनन्दनको जन्म दिया है । रामलला त्रिभुवनको विभूषित करनेवाले हैं ॥ ११ ॥ जबसे रामका प्रादुर्भाव हुआ है, तबसे सारे अमङ्गलोंकी जड़ कट गयी है, मित्र- मण्डल आनन्दित है, हितैषियोंका अभ्युदय हो रहा है तथा वैरियोंके हृदयमें शूल होता है । रामलला संसारके भयको भङ्ग करनेवाले

हैं ॥ १२ ॥ जिस समय भगवान् राम अपने भाई और साथी बालकोंको सङ्ग लेकर गेंद खेलने जायँगे, उस समय लङ्कामें खलबली पड़ जायगी और स्वर्गमें बाजे बजने लगेंगे, क्योंकि रामलला शत्रुदल- का दमन करनेवाले हैं ॥ १३ ॥ जिस समय रामचन्द्रजी हाथी, घोड़े और रथ सँभालकर मृगमायाके लिये चलेंगे, उस समय रावणके हृदयमें धड़कन होने लगेगी कि कहीं धनुष लेकर मेरी ओर न दौड़ पड़ें; क्योंकि श्रीरामलला शत्रुरूप हाथीके लिये साक्षात् सिंह ही हैं ॥ १४ ॥ सुमित्रा और सखियोंके गीत सुन-सुनकर देवता और मुनिजन प्रसन्न होते हैं तथा आशीर्वाद देते हुए जय-जयकार कर हर्षित हो फूलोंकी वर्षा करते हैं। रामलला देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं ॥ १५ ॥ तुलसीदासने प्रेमामृतरसका पान कर चित्तरूप चकोरके लिये यह षोडशकलानिधान बालचरितरूप चन्द्रमा* रचा है। रामलला तो तुलसीदासके जीवन ही हैं ॥ १६ ॥ राग कान्हरा [ २३ ] पालने रघुपुति झुलावै । लै लै नाम सप्रेम सरस स्वर कौसल्या कल कीरति गावै ॥ १ ॥ केकिंकंठ दुति स्यामबरन बपु, बाल बिभूषन बिरचि बनाए । अलक कुटिल, ललित लटकनभ्रू, नील नलिन दोउ नयन सुहाए ॥ २ ॥ सिसु-सुभाय सोहत जब कर गहि बदन निकट पदपल्लव लाए । मनहुँ सुभग जुग भुजग जलज भरि लेत सुधा ससि सों सचु पाए ॥ ३ ॥


  • इन सोलह पदोंमें बालरूप रामकी रूप-माधुरीका वर्णन किया गया है। इनमें एक-एक पद चन्द्रमाकी उत्तरोत्तर बढ़ती हुई कलाओंका सूचक है। इस प्रकार इनमें षोडशकलानिधान चन्द्रमाकी उत्प्रेक्षा की है ।

गीतावली ६० ऊपर अनूप बिलोकि खिलौना किलकत पुनि पुनि पानि पसारत । मनहुँ उभय अंभोज अरुन सोंबिधु-भय बिनय करत अति आरत ॥ ४ ॥ तुलसिदास बहु बास बिबस अलि गुंजत, सुछबि न जाति बखानी । मनहुँ सकल श्रुति ऋचा मधुप ह्वै बिसदसुजस बरनत बर बानी ॥ ५ ॥ माता कौसल्या पालनेमें रघुनाथजी को झुला रही हैं, और प्रेम- पूर्वक सुन्दर स्वरसे नाम ले-लेकर प्रभुकी सुन्दर कीर्ति गा रही हैं ॥ १ ॥ मयूरकण्ठकी कान्तिके समान देदीप्यमान श्याम शरीरपर रच-रचकर बालोचित विभूषण बनाये गये हैं। अलकावली घुँघराली है, भृकुटिपर ललित लटकन लटक रहा है तथा दोनों नेत्र नील कमलके समान शोभायमान हैं ॥ २ ॥ जिस समय बाल स्वभावसे अपने सुन्दर करकमलोंसे पादपल्लवोंको पकड़कर मुखके पास लाते हैं उस समय ऐसा जान पड़ता है, मानो दो सुन्दर सर्प आनन्दपूर्वक कमलोंमें भरकर चन्द्रमासे अमृत लेते हुए शोभा पा रहे हैं ॥ ३ ॥ ऊपर अनुपम खिलौना टँगा देखकर किलकारी मारते हैं और बारम्बार अपने पाणिपल्लव पसारते हैं, मानो दो कमल चन्द्रमासे भय मानकर अति दीनभावसे सूर्यदेवसे प्रार्थना कर रहे हैं [कि आप अस्त न हों] ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं—तीव्र सुगन्धके कारण भौंरे गूँज रहे हैं । उस छविका वर्णन नहीं हो सकता । ऐसा जान पड़ता है मानो वेदकी सारी ऋचाएँ भ्रमर बनकर निर्मल वाणीसे भगवान्‌का विशद यश वर्णन कर रही हैं ॥ ५ ॥ राग बिलावल [ २४ ] झूलत राम पालने सोहैं । भूरि-भाग जननीजन जोहैं ॥ १ ॥ तन मृदु मंजुल मेचकताई । झलकति बाल बिभूषन झाँई ॥ २ ॥

बालकाण्ड ६१ अधर-पानि-पद लोहित लोने। सर-सिंगार-भव सारस सोने ॥ ३ ॥ किलकत निरखि बिलोल खिलौना। मनहुँ बिनोद लरत छबि छौना ॥ ४ ॥ रंजित-अंजन कंज-बिलोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन ॥ ५ ॥ लस मसिबिंदु बदन-बिधु नीको। चितवत चितचकोर तुलसीको ॥ ६ ॥ श्रीरामलला पालनेमें झूलते हुए शोभा पा रहे हैं और बड़भागिनी माताएँ उनकी ओर निहार रही हैं ॥ १ ॥ भगवान्‌के शरीरमें अति मृदुल और मञ्जुल श्यामता सुशोभित है, जिसपर बालोचित आभूषणों- की झाँईं झलक रही है ॥ २ ॥ प्रभुके अति सुन्दर अरुणवर्ण ओठ, हाथ और चरण ऐसे जान पड़ते हैं, मानो शृङ्गारसरोवरमें उत्पन्न सोनेका कमल हो ॥३॥ खिलौनेको हिलता हुआ देखकर किलकारी मारते हैं, मानो छविके छोटे-छोटे बालक खेल-खेलमें लड़ रहे हों ॥४॥ नयनकमलोंमें अञ्जन आँजा हुआ है तथा मस्तकपर गोरोचन- का तिलक सुशोभित है ॥ ५ ॥ मनोहर मुखचन्द्रपर अति सुन्दर काजलकी बिन्दी लगी हुई है। उस मुखमयङ्कको तुलसीका चित्तरूप चकोर निहार रहा है ॥ ६ ॥ राग कल्याण [ २५ ] राजत सिसुरूप राम सकल गुन-निकाय-धाम, कौतुकी कृपालु ब्रह्म जानु-पानि-चारी। नीलकंज-जलदपुंज-मरकतमनि-सरिस स्याम, काम कोटि सोभा अंग अंग उपर बारी ॥ १ ॥ हाटक-मनि-रत्न-खचित रचित इंद्र-मंदिराभ, इंदिरानिवास सदन बिधि रच्यो संवारी।

गीतावली ६२ बिहरत नृप-अजिर अनुज सहित बालकेलि-कुसल, नील-जलज-लोचन हरि मोचन भय भारी ॥ २ ॥ अरुन चरन अंकुस-धुज-कुलिस-चिन्ह रुचिर, भ्राजत अति नूपुर बर मधुर मुखरकारी। किंकिनी बिचित्र जाल, कंबुकंठ ललित माल, उर बिसाल केहरि-नख, कंकन करधारी ॥ ३ ॥ चारु चिबुक नासिका कपोल, भाल तिलक, भ्रुकुटि, श्रवन अधर सुंदर, द्विज-छबि अनूप न्यारी। मनहुँ अरुन कंज कोस मंजुल जुगपाँति प्रसव, कुंदकली जुगल जुग परम सुअवारी ॥ ४ ॥ चिकून चिकुरावली मनो षडंघ्रि-मंडली, बनी, बिसेषि गुंजत जनु बालक किलकारी। इकटक प्रतिबिंब निरखि पुलकत हरि हरषि हरषि, लै उछंग जननी रसभंग जिय बिचारी ॥ ५ ॥ जाकहँ सनकादि संभु नारदादि सुक मुनींद्र, करत बिबिध जोग काम क्रोध लोभ जारी। दसरथ गृह सोइ उदार, भंजन संसार-भार, लीला अवतार तुलसिदास-त्रासहारी ॥ ६ ॥ सम्पूर्ण गुणसमूहके आश्रय, अत्यन्त कौतुकी, कृपानिधान, हाथ एवं घुटनों के बल चलनेवाले बालरूप परब्रह्म भगवान् राम विराजमान हैं। वे नील कमल, मेघसमूह तथा मरकतमणि के समान श्याम-वर्ण हैं। उनके एक-एक अङ्गपर करोड़ों कामदेवोंकी शोभा निछावर है ॥ १ ॥ जो सुवर्ण और मणिरत्नोंसे जड़ा हुआ है, जो इन्द्रभवनसदृश निर्मित हुआ है तथा जिसे

६३ बालकाण्ड विधाताने मानो सँवारकर लक्ष्मीका निवासस्थान बनाया है, उस राजभवनमें नील कमलके समान नेत्रोंवाले, भारी भय दूर करनेवाले बालकेलिकुशल भगवान् राम भाइयों सहित विहार कर रहे हैं ॥२॥ भगवान्‌के अरुण चरणोंमें अंकुश, ध्वजा, कमल और वज्रके मनोहर चिह्न हैं तथा मनोहर ध्वनि करनेवाले नूपुर अत्यन्त शोभायमान हैं। (इसी प्रकार) वे कटिप्रदेशमें अति विचित्र किङ्किणीजाल, शङ्खसदृश ग्रीवामें मनोहर मालाएँ, विशाल वक्षःस्थलपर बघनहा तथा करकमलमें कङ्कण धारण किये हुए हैं ॥३॥ प्रभुकी ठोड़ी, नासिका, कपोल, ललाटपरका तिलक, भृकुटि एवं कर्ण अत्यन्त शोभायमान हैं तथा सुन्दर अधरपुटके बीच दन्तपंक्तिकी छवि भी बड़ी अनुपम है, मानो अरुण कमलके बीचमें अत्यन्त शुभ्रवर्ण कुन्दकलीकी दो- दो पंक्तियाँ हों ॥ ४ ॥ बालरूप रामकी चिकनी अलकावली मानो भ्रमरोंकी मण्डली है और उनकी किलकारी मानो भौंरोंकी विशेष गुञ्जार है। आप दर्पणमें अपने प्रतिबिम्बकी ओर टकटकी लगाकर देखते हुए प्रसन्न हो-होकर पुलकित होते हैं; अतः माताने हृदयमें रसभङ्गकी आशङ्का कर [अर्थात् यह सोचकर कि कहीं नजर न लग जाय] उन्हें गोदमें उठा लिया ॥ ५ ॥ जिसके लिये सनकादि, महादेवजी, नारदादि देवर्षि तथा शुक आदि मुनीश्वरगण काम, क्रोध और लोभको भस्म करके तरह-तरहकी योग-साधना करते हैं, उन्हीं परम उदार, प्रभुने दशरथजीके घर संसारका भार उतारनेके लिये लीलावतार धारण किया है। वे तुलसीदासका भय दूर करनेवाले हैं ॥ ६ ॥

गीतावली ६४ राग कान्हरा [ २६ ] आँगन फिरत घुटुरुवनि धाए। नील-जलद तनु-स्यामराम सिसुजननि निरखि मुख निकट बोलाए ॥१॥ बंधुक सुमन अरुन पदपंकज अंकुस प्रमुख चिन्ह बनि आए। नूपुर जनु मुनिबर-कलहंसनि रचे नीड़ दै बाँह बसाए ॥२॥ कटिमेखल, बर हार ग्रीव-दर, रुचिर बाँह भूषन पहिराए। उर श्रीवत्स मनोहर हरिनख हेम मध्य मनिगन बहु लाए ॥३॥ सुभाग चिबुक, द्विज, अधर, नासिका, श्रवन, कपोल मोहि अति भाए। भ्रूसुंदर करुणारस-पूरन, लोचन मनहुँ जुगल जलजाए ॥४॥ भाल बिसाल ललित लटकन बर, बालदसाके चिकुर सोहाए। मनु दोउ गुरु सनि कुज आगे करि ससिहि मलिन तमके गन आए ॥५॥ उपमा एक अद्भुत भई तब जब जननी पट पीत ओढ़ापए। नीलजलद पर उडुगन निरखत तजि सुभाव मनो तड़ित छुपाए ॥६॥ अंग-अंगपर मार-निकर मिलि छबि समूह लै लै जनु छाए। तुलसिदास रघुनाथ रूप-गुन तौ कहौं जो बिधि होहिं बनाए ॥७॥ राम आँगनमें घुटनोंके बल दौड़े फिर रहे हैं। नील मेघके समान श्यामशरीर बालक रामका मुख देखकर माताने उन्हें अपने पास बुलाया ॥ १ ॥ दुपहरियाके फूलके समान प्रभुके अरुण चरणकमलोंमें अंकुश आदि प्रमुख चिह्न सुशोभित हैं तथा उनमें जो नूपुर हैं, वे ऐसे जान पड़ते हैं, मानो भगवान्ने घोंसले रचकर उनमें मुनिजनरूप कलहंसोंको शरण देकर बसाया है ॥२॥ प्रभुके कटिप्रदेशमें मेखला,

६५ बालकाण्ड शङ्खसदृश ग्रीवामें सुन्दर हार और सुन्दर भुजाओंमें आभूषण पहनाये गये हैं तथा वक्षःस्थलमें मनोहर श्रीवत्सचिह्न, व्याघ्रनख और अनेक मणियोंसे जड़ा हुआ सुवर्णमय पदक सुशोभित है ॥ ३ ॥ प्रभुकी सुन्दर ठोड़ी, दन्तावली, अधरपुट, नासिका, कर्ण और कपोल मुझे बड़े ही प्रिय हैं। भगवान्‌की मनोहर भृगकुटियाँ करुणरसपूर्ण हैं तथा नेत्र मानो दो कमल ही हैं ॥ ४ ॥ विशाल भालपर अति सुन्दर श्रेष्ठ लट- कन लटके हुए हैं और बाल्यावस्थाका सुन्दर केशकलाप शोभायमान है। वे सब ऐसे जान पड़ते हैं मानो दोनो गुरुओं (बृहस्पति और शुक्र) तथा शनि एवं मङ्गलको आगेकर अन्धकारके समूह चन्द्रमासे मिलने आये हों। [यहाँ लटकनमें जो सुवर्ण है वह बृहस्पति है, हीरा शुक्र है, लाल मङ्गल है और नीलमणि शनि है। उन्हें आगेकर केशकलाप रूप अन्धकारसमूह मुखरूप चन्द्रमासे मिलने आया है] ॥५॥ जिस समय माताने पीताम्बर उढ़ाया उस समय तो अद्भुत उपमा (योग्य शोभा) हो गयी, मानो [श्यामशरीररूप] नील मेघपर [अनेक चमकीले आभूषणरूप] नक्षत्रगण को देदीप्यमान देख (पीताम्बररूप) चञ्चला चपलाने अपना स्वभाव छोड़कर उसे छिपा लिया ॥ ६ ॥ भगवान्‌के अङ्ग-अङ्गपर मानों कामके समूह अपने छविपुञ्जको लेकर छाये हुए हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीके रूप और गुण यदि विधाताके बनाये हुए हों तो कुछ कहे भी जा सकते हैं ॥ ७॥ राग केदारा [ २७ ] रघुबर बाल छबि कहौं बरनि । सकल सुखकी सींव, कोटि-मनोज-सोभाहरनि ॥ १ ॥ गी० ५—

गीतावली ६६ बसी मानहु चरन-कमलनि अरुनता तजि तरनि। रुचिर नूपुर किंकिनी मन हरति रुनझुनु करनि॥ २॥ मंजु मेचक मृदुल तनु अनुहरति भूषन भरनि। जनु सुभग सिंगारसिसु तरु फरचौ है अद्भुत फरनि॥ ३॥ भुजनि भुजग, सरोज नयननि, बदन बिधु जित्यो लरनि॥ रहे कुहरनि, सलिस, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि॥ ४॥ लसत कर-प्रतिबिम्ब मनि-आँगन घुटुरुवनि चरनि। जनु जलज-संपुट सुछबि भरि भरि धरति उर धरनि॥ ५॥ पुन्यफल अनुभवति सुतहि बिलोकि दसरथ-घरनि। बसति तुलसी-हृदय प्रभु-किलकनि ललित लरखरनि॥ ६॥ रघुनाथजीकी बालछविका न वर्ण करके कहता हूँ, वह सकल सुखकी सीमा और करोड़ों कामदेवोंकी शोभाका हरण करनेवाली है॥ १॥ अरुणता मानो सूर्यको त्यागकर उनके चरणकमलोंमें ही आ बसी है। मनोहर नूपुर और किङ्किणीका रुनझुन शब्द मनको हरे लेता है॥ २॥ अति मनोहर और मृदुल श्याम शरीरपर आभूषणों- की सजावट ऐसी जान पड़ती है मानो अति सुन्दर शृङ्गाररसका नन्हा-सा पौधा अद्भुत फलोंसे सम्पन्न हुआ हो॥ ३॥ [सौन्दर्यकी] लड़ाईमें प्रभुकी भुजाओंने सर्पोंको, नेत्रोंने कमलोंको तथा मुखने चन्द्रमाको जीत लिया है। इसीसे वे क्रमशः बिल, जल तथा आकाश- में जा बसे हैं। [यह देखकर] अन्य उपमाएँ (उपमान) भी डरकर दूर भाग गयी हैं॥ ४॥ मणिमय आँगनमें घुटनोंके बल चलते समय जो हाथोंका प्रतिबिम्ब पड़ता है वह ऐसा जान पड़ता है मानो धरणी छबिको कमलके सम्पुटमें भर-भरकर अपने हृदयमें धारण कर रही

६७ बालकाण्ड हो ॥ ५ ॥ उस समय महाराज दशरथकी गृह-लक्ष्मी कौसल्याजी अपने लालको देखकर अपने पुण्यफलका अनुभव कर रही थीं। तुलसीदासके हृदयमें भी प्रभुका वह किलकना और आनन्ददायक लड़खड़ाना बसा रहता है ॥ ३ ॥ [ २८ ] नेकु बिलोकि धौं रघुबरनि । चारु फल त्रिपुरारि तोको दिये कर नृप-घरनि ॥ १ ॥ बाल भूषन बसन, तन सुन्दर रुचिर रजभरनि । परसपर खेलनि अजिर, उठि चलनि, गिरि गिरि परनि ॥ २ ॥ झुकनि, झाँकनि, छाँह सों किलकनि, नटनि, हठि लरनि । तोतरी बोलनि, बिलोकनि, मोहनी मनहरनि ॥ ३ ॥ सखि-बचन सुनि कौसिला लखि सुढर पासे ढरनि । लेति भरि भरि अंक सँतति पैंत जनु दुहु करनि ॥ ४ ॥ चरित निरखत बिबुध तुलसी ओट दै जलधरनि । चहत सुर सुरपति भयो सुरपति भये चहै तरनि ॥ ५ ॥ [ किसी समय माता कोसल्याको अन्यमनस्का देखकर कोई सखी कहती है—] अरी राजरानी ! तू तनिक इन रघुवीरोंकी ओर देख तो सही। श्रीशङ्करने तेरे हाथमें चारों फल प्रदान किये हैं ॥ १॥ तू इनके बालोचित वस्त्र और आभूषण, सुन्दर शरीरकी दर्शनीय धूलि-धूसरता, आँगनमें आपसका खेल-कूद, उठ-उठकर चलना और फिर गिर-गिर पड़ना, झुकना, झाँकना, परछाई देखकर किलकना, नाचना, हठ करके लड़ना, तोतली बोली बोलना तथा मनको हरने- वाली मोहिनी चितवन तो देख ॥ २-३ ॥ सखीके ये वचन सुनकर कौसल्याजीने समझ लिया कि मेरे अच्छे पाँसे पड़े हैं ( मैं भाग्यवती

गीतावली ६८ हूँ)। इसलिये वे रामका बारम्बार आलिङ्गन करने लगीं, मानों दाँव जीतनेवाला अपने जीतके द्रव्यको दोनों हाथोंसे बड़ी लालसाके साथ समेटता हो ॥४॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस चरित्रको देवता लोग बादलोंकी ओटमें खड़े होकर देख रहे हैं और [इसे निरन्तर देखते रहनेकी इच्छासे] देवता तो इन्द्र (सहस्राक्ष) होना चाहते हैं और इन्द्र सूर्य (सहस्रकर) होनेके लिये उत्सुक हैं ॥ ५ ॥ राग जैतश्री [ २९ ] भूमितल भूपके बड़े भाग। राम लखन रिपुदमन भरत सिसु निरखत अति अनुराग ॥ १ ॥ बालविभूषन लसत पायँ मृदु मंजुल अंग-बिभाग । दसरथ-सुकृत मनोहर बिरवनि रूप-करह जनु लाग ॥ २ ॥ राजमराल बिराजत बिहरत जे हर-हृदय-तड़ाग । ते नृप-अजिर जानु कर धावत धरन चटक चल काग ॥ ३ ॥ सिद्ध सिहात, सराहत मुनिगन, कहैं सुर किंनर नाग । 'ह्वै बरु बिहँग बिलोकिय बालक बसि पुर उपबन बाग' ॥ ४ ॥ परिजन सहित राय रानिन्ह कियो मज्जन प्रेम-प्रयाग । तुलसी फल ताके चारचो मनि मरकत पंकजराग ॥ ५ ॥ इस पृथ्वीतलमें राजा दशरथके बड़े भाग्य हैं, क्योंकि वे बालक राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको अनुरागपूर्ण दृष्टिसे निहारते हैं॥१॥ बालकोंके चरणोंमें तथा अतिमृदुल और सुन्दर अङ्ग-प्रत्यङ्गमें जो यथास्थान विभाजित करके बालोचित आभूषण सजाये गये हैं वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो महाराज दशरथके मनोहर पुण्यरूपो पौधोंमें रूपका कल्ला

निकल आया हो॥ २॥ जो [भगवान् रामरूप] राजहंस श्रीशङ्करके हृदयसरोवरमें विहार करता है वही इस समय चञ्चल कौएको पकड़ने- के लिए महाराज दशरथके आँगनमें तेजीसे घुटनों और हाथोंके बल दौड़ रहा है॥३॥ यह देखकर सिद्धलोग मन-ही-मन सिहाते (प्रसन्न होते ) हैं और मुनिजन महाराज दशरथके भाग्यकी बड़ाई करते हैं और देवता, किन्नर तथा नाग यह कहते हैं—'अच्छा होगा कि हम पक्षी होकर महाराजके पुर, उपवन एवं बगीचोंमें रहते हुए इन बालकोंको निहारा करते'॥४॥ महाराज दशरथ और रानियोंने अपने कुटुम्बियोंके सहित प्रेमरूप प्रयागमें स्नान किया है। तुलसीदासजी कहते हैं कि ये मरकत और पद्मरागमणिकी-सी आभावाले चारों बालक इस पुण्यके ही फल हैं॥ ५॥

राग आसावरी [ ३० ]

छँगन मँगन अँँगना खेलत चारु चारचो भाई। सानुज भरत लाल लषन राम लोने लोने लरिका लखि मुदित मातुसमुदाई ॥ १ ॥ बाल बसन भूषन धरे, नख-सिख छबि छाई। नील पीत मनसिज-सरसिज मंजुल मालनि मानो है देहनितें दुति पाई ॥ २ ॥ ठुमुकु ठुमुकु पग धरनि, नटनि, लरखरनि सुहाई। भजनि, मिलनि, रूठनि, तूठनि, किलकनि, अवलोकनि, बोलनि बरनि न जाई ॥ ३ ॥ जननि सकल चहुँ ओर आलबाल मनि-अँगनाई। दसरथ-सुकृत बिबुध-बिरवा बिलसत बिलोकि जनु बिधि बर बारि बनाई ॥ ४ ॥

गीतावली ७० हरि बिरंचि हर हेरि राम प्रेम-परबसताई। सुख-समाज रघुराजके बरनत बिसुद्ध मन सुरनि सुमन झरि लाई ॥ ५ ॥ सुमिरत श्रीरघुबरनिकी लीला लरिकाई। तुलसिदास अनुराग अवध आनँद अनुभवत तब को सो अजहुँ अघाई ॥ ६ ॥ अति सुन्दर चारों भाई मगन होकर आँगनमें खेल रहे हैं। भाई शत्रुघ्नके सहित भरतलाल, लक्ष्मण तथा राम—इन सुन्दर बालकोंको देख-देखकर सब माताएँ अति आनन्दित होती हैं ॥१॥ चारों बालक बालोचित वस्त्र और आभूषण धारण किये हुए हैं, नखसे शिखतक शोभा छायी हुई है। कामदेवकी, नील और पीत कमलकी मनोहर मालाओंने मानों इनके शरीरोंसे ही शोभा पायी है ॥ २ ॥ इनके ठुमक-ठुमककर चरण रखने, नाचने, लड़खड़ाने, दौड़ने, मिलने, रूठने, प्रसन्न होने, किलकने, देखने तथा बोलनेकी सुन्दरताका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ३ ॥ राजभवनके मणि- मय आँगनरूप आलबालमें दशरथजीके पुण्य-कल्पतरुको बढ़ाता देख मानों विधाताने समस्त माताओंको सुन्दर बाड़ बनाकर उसे चारों ओरसे घेर दिया है ॥४॥ ब्रह्मा-विष्णु और महादेव भगवान् रामकी प्रेम-परवशता देख विशुद्ध मनसे रघुराज (दशरथजी) की सुखराशिका वर्णन करते हैं। देवताओंने फूलोंकी झड़ी लगा रखी है ॥ ५ ॥ उन रघुकुलश्रेष्ठ बालकोंकी बाललीलाओंका स्मरण कर तुलसीदासजी उस समयकी ही भाँति अब भी अयोध्यामें अघाकर उस अनुरागके आनन्दका अनुभव कर रहे हैं ॥ ६ ॥

७१ बालकाण्ड राग बिलावल [ ३१ ] आँगन खेलत आनँदकंद। रघुकुल-कुमुद-सुखद चारुचंद ॥ १ ॥ सानुज भरत लषन संग सोहैं। सिसु-भूषन भूषित मन मोहैं। तन-दुति मोरचंदजिनि झलकें। मनहु उमगि अँग-अँग छबि छलकें ॥ २ ॥ कटि किंकिनि पग पँजनि बाजैं। पंकज पानि पहुँचीआँ राजैं। कठुला कंठ बघनहा नीके। नयन-सरोज-मयन-सरसीके ॥ ३ ॥ लटकन लसत ललाट लटूरीं। दमकति द्वै द्वै दँतुरियाँ रूरीं ॥ मुनि-मन हरत मंजु मसि बुंदा। ललित बदन बलि बालमुकुंदा ॥ ४ ॥ कुलही चित्र बिचित्र झँगूलीं। निरखत मातु मुदित मन फूलीं ॥ गहि मनिखंभ डिंभ डगि डोलत। कलबल बचन तोतरे बोलत ॥ ५ ॥ किलकत, झुकि झाँकत प्रतिबिंबनि। देत परम सुख पितु अरु अँबनि ॥ सुमिरत सुखमा हिय हुलसी है। गावत प्रेम-पुलकि तुलसी है ॥ ६ ॥ रघुकुलरूप कुमुदको आनन्दित करनेवाले मनोहर मयंक आनन्दकन्द भगवान् राम आँगनमें खेल रहे हैं ॥ १ ॥ शत्रुघ्नसहित भरत और लक्ष्मणजी सङ्गमें सुशोभित हैं; चारों भाई बालोचित आभूषणोंसे भूषित हैं और मनको मोहे लेते हैं। शरीरकी कान्ति ऐसी है मानों मयूरपिच्छकी चन्द्रिकाएँ झलक रही हों तथा अङ्ग- अङ्गसे छवि मानों उमँग-उमँगकर छलकी पड़ती हो ॥ २ ॥ कमरमें करधनीकी और चरणोंमें नूपुरकी ध्वनि हो रही है, करकमलमें पहुँचियाँ शोभा दे रही हैं। कण्ठमें कठुला तथा व्याघ्रनख सुन्दर मालूम होते हैं तथा नयनकमल मानों कामसरोवरसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३ ॥ माथेपर छोटी-छोटी अलकें तथा [ सुवर्णमय ] लटकन