भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

गीतावली ६० ऊपर अनूप बिलोकि खिलौना किलकत पुनि पुनि पानि पसारत । मनहुँ उभय अंभोज अरुन सोंबिधु-भय बिनय करत अति आरत ॥ ४ ॥ तुलसिदास बहु बास बिबस अलि गुंजत, सुछबि न जाति बखानी । मनहुँ सकल श्रुति ऋचा मधुप ह्वै बिसदसुजस बरनत बर बानी ॥ ५ ॥ माता कौसल्या पालनेमें रघुनाथजी को झुला रही हैं, और प्रेम- पूर्वक सुन्दर स्वरसे नाम ले-लेकर प्रभुकी सुन्दर कीर्ति गा रही हैं ॥ १ ॥ मयूरकण्ठकी कान्तिके समान देदीप्यमान श्याम शरीरपर रच-रचकर बालोचित विभूषण बनाये गये हैं। अलकावली घुँघराली है, भृकुटिपर ललित लटकन लटक रहा है तथा दोनों नेत्र नील कमलके समान शोभायमान हैं ॥ २ ॥ जिस समय बाल स्वभावसे अपने सुन्दर करकमलोंसे पादपल्लवोंको पकड़कर मुखके पास लाते हैं उस समय ऐसा जान पड़ता है, मानो दो सुन्दर सर्प आनन्दपूर्वक कमलोंमें भरकर चन्द्रमासे अमृत लेते हुए शोभा पा रहे हैं ॥ ३ ॥ ऊपर अनुपम खिलौना टँगा देखकर किलकारी मारते हैं और बारम्बार अपने पाणिपल्लव पसारते हैं, मानो दो कमल चन्द्रमासे भय मानकर अति दीनभावसे सूर्यदेवसे प्रार्थना कर रहे हैं [कि आप अस्त न हों] ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं—तीव्र सुगन्धके कारण भौंरे गूँज रहे हैं । उस छविका वर्णन नहीं हो सकता । ऐसा जान पड़ता है मानो वेदकी सारी ऋचाएँ भ्रमर बनकर निर्मल वाणीसे भगवान्‌का विशद यश वर्णन कर रही हैं ॥ ५ ॥ राग बिलावल [ २४ ] झूलत राम पालने सोहैं । भूरि-भाग जननीजन जोहैं ॥ १ ॥ तन मृदु मंजुल मेचकताई । झलकति बाल बिभूषन झाँई ॥ २ ॥