भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

गीतावली ६६ बसी मानहु चरन-कमलनि अरुनता तजि तरनि। रुचिर नूपुर किंकिनी मन हरति रुनझुनु करनि॥ २॥ मंजु मेचक मृदुल तनु अनुहरति भूषन भरनि। जनु सुभग सिंगारसिसु तरु फरचौ है अद्भुत फरनि॥ ३॥ भुजनि भुजग, सरोज नयननि, बदन बिधु जित्यो लरनि॥ रहे कुहरनि, सलिस, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि॥ ४॥ लसत कर-प्रतिबिम्ब मनि-आँगन घुटुरुवनि चरनि। जनु जलज-संपुट सुछबि भरि भरि धरति उर धरनि॥ ५॥ पुन्यफल अनुभवति सुतहि बिलोकि दसरथ-घरनि। बसति तुलसी-हृदय प्रभु-किलकनि ललित लरखरनि॥ ६॥ रघुनाथजीकी बालछविका न वर्ण करके कहता हूँ, वह सकल सुखकी सीमा और करोड़ों कामदेवोंकी शोभाका हरण करनेवाली है॥ १॥ अरुणता मानो सूर्यको त्यागकर उनके चरणकमलोंमें ही आ बसी है। मनोहर नूपुर और किङ्किणीका रुनझुन शब्द मनको हरे लेता है॥ २॥ अति मनोहर और मृदुल श्याम शरीरपर आभूषणों- की सजावट ऐसी जान पड़ती है मानो अति सुन्दर शृङ्गाररसका नन्हा-सा पौधा अद्भुत फलोंसे सम्पन्न हुआ हो॥ ३॥ [सौन्दर्यकी] लड़ाईमें प्रभुकी भुजाओंने सर्पोंको, नेत्रोंने कमलोंको तथा मुखने चन्द्रमाको जीत लिया है। इसीसे वे क्रमशः बिल, जल तथा आकाश- में जा बसे हैं। [यह देखकर] अन्य उपमाएँ (उपमान) भी डरकर दूर भाग गयी हैं॥ ४॥ मणिमय आँगनमें घुटनोंके बल चलते समय जो हाथोंका प्रतिबिम्ब पड़ता है वह ऐसा जान पड़ता है मानो धरणी छबिको कमलके सम्पुटमें भर-भरकर अपने हृदयमें धारण कर रही